भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s34.7
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s34.7
- Language
- Hindi
c31.s34.7
१ जुलिअस् सीज़र का स्थिर किया हुआ ३६५ ¼ दिन का सौर वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से ११ मिनिट और १४ सैकंड बड़ा था जिससे करीब १२८ वर्ष में १ दिन का अंतर पड़ने लगा. इस अंतर के बढ़ते बढ़ते ई. स. ३२५ में मेष का सूर्य, जो जुलिअस् सीज़र के समय २५ मार्च को आया था, ता० २१ मार्च को आ गया और ई. स. १५८२ में ११ मार्च को आ गया. पोप ग्रेगरी (१३ वें) ने सूर्य के चार में इतना अंतर पड़ा हुआ देख कर ता० २२ फरवरी ई. स. १५८२ को यह आज्ञा दी कि इस वर्ष के अक्टोबर मास की चौथी तारीख के बाद का दिन १५ अक्टोबर माना जावे. इससे लौकिक सौर वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से मिल गया. फिर आगे के लिये ४०० वर्ष में ३ दिन का अंतर पड़ता देख कर उसको मिटाने के लिये पूरी शताब्दियों के वर्षों (१६००, १७०० आदि) में से जिनमें ४०० का भाग पूरा लग जावे उन्हींमें फेब्रुअरी के २६ दिन मानने की व्यवस्था की. इस व्यवस्था के बाद अंतर इतना सूक्ष्म रहा है कि करीब ३३२० वर्ष के बाद फिर १ दिन का अंतर पड़ेगा. पोप ग्रेगरी की आज्ञा के अनुसार रोमन कैथोलिक संप्रदाय के अनुयायी देशों अर्थात् इटली, स्पेन, पोर्चुगाल आदि में तो ता० ५ ऑक्टूबर के स्थान में १५ ऑक्टोबर मान ली गई परंतु प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के अनुयायी देशवालों ने प्रारंभ में इसका विरोध किया तो भी अंत में उनको भी लाचार इसे स्वीकार करना पड़ा. जर्मनीवालों ने ई. स. १६६६ के अंत के १० दिन छोड़ कर १७०० के प्रारंभ से इस गणना का अनुकरण किया. इंग्लैंड में ई. स. १७५२ में इसका प्रचार हुआ परंतु उस समय तक एक दिन का और अंतर पड़ गया था इस लिये ता० २ सेप्टेंबर के बाद की तारीख (३) को १४ सप्टेंबर मानना पड़ा. रशिया, ग्रीस आदि ग्रीक चर्च संप्रदाय के अनुयायी देशों में केवल अभी अभी इस शैली का अनुकरण हुआ है. उनके यहां के दस्तावेज़ आदि में पहिले दोनों तरह अर्थात् जुलिअस् एवं ग्रेगरी की शैली से तारीखें लिखते रहे जैसे कि २० एप्रिल तथा ३ मे आदि.