भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s5.5
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s5.5
- Language
- Hindi
c31.s5.5
१५ पनंतारियसठिवससते राजमुरियकाले वोछिन्ने च चोयठअग्रसतिकतुरियं (पंडित भगवानलाल इंद्रजो संपादित 'दी हाथी गुफ़ा ऐंड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स'). डॉक्टर स्ट्रेन कॉनो ने ई. स. १९०५-६ की आर्किआलाजिकल सर्वे की रिपोर्ट में लिखा है कि 'इस वर्ष कलिंग के राजा खारवेल के प्रसिद्ध हाथी गुंफा के लेख की नकल (प्रतिकृति) तय्यार की गई... वह लेख मौर्य संवत १६५ का है' (पृ. १६६). उक्त पुस्तक की समालोचना करते हुए डॉक्टर फ्लीट ने उक्त लेख के संवत संबंधी अंश के विषय में लिखा कि 'उक्त लेख में कोई संवत् नहीं है किंतु वह यह बतलाता है कि खारवेल ने कुछ मूल पुस्तक और ६४ वें अध्याय अथवा [जैनों के] सात अंगों के किसी अन्य विभाग का पुनरुद्धार किया, जो मौर्य काल से उच्छिन्न हो रहा था' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१०, पृ. २४३-४४). डॉ. फ्लीट के इस कथनानुसार प्रो. लुडर (ऍ. इं; जि. १०, ब्राह्मी लेखों की सूची, पृ. १६१) और वी. ए. स्मिथ ने (स्मि; अ. हि. इं; पृ. २०७, टि. २) उक्त लेख में कोई संवत् न होना मान लिया है, परंतु थोड़े ही समय पूर्व पश्चिमी भारत के आर्किआलॉजिकल् विभाग के विद्वान् सुपरिंटेंडेंट राखाल-दास बैनर्जी ने उक्त लेख को फिर प्रसिद्ध करने के लिये उसकी प्रतिकृति तय्यार कर पढ़ा है. उनके कथन से पाया गया कि उसमें मौर्य संवत् १६५ होना निर्विवाद है. ऐसी दशा में डा. फ्लीट आदि का कथन ठीक नहीं कहा जा सकता.