A History of the Canonical Literature of the Jainas c5.67
A History of the Canonical Literature of the Jainas c5.67
- Language
- English
c5.67
आदिज्जसादीण उसभस्स पओप्पर गरवतीणं। सगरसुयाण सुबुद्धी इणमो संखं परिकेइ ॥१॥
चोदस लक्खा भिद्वा णिवडंगं य होति सव्वट्ठे। एवेक्केके ठाणे पुरिसगुणा होंतडसंखेज्जा ॥२॥
पुणरवि चोदस लक्खा भिद्वा णिवदीण दोण्णि सव्वट्ठे। जगठाणे वि असंखया पुरिसजुगा होंति णाियव्वा ॥३॥
जावय लक्खा चोदस भिद्वा पण्णाम होंति सव्वट्ठे। पण्णासठाणे वि य पुरिसजुगा होंतिडसंखेज्जा ॥४॥