History of Dharmashastra (Ancient and Mediaeval Religious and Civil Law in India) v7.c95.76
History of Dharmaśāstra (Ancient and Mediaeval Religious and Civil Law in India) v7.c95.76
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- English
v7.c95.76
²⁴⁶⁰ जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति। छा उप I. 11. 3; स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्मा। (बृह. IV 4 25), न जायते म्रियते वा विपश्चित् .. अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे। कठ 2. 18, तत्सृष्ट्वा तदेवानु-प्राविशत्। तै उप II. 6, अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि। छा उप. VI. 3. 2, स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यः। बृह I 4. 7; तत्त्वमसि (छा उप VI 8.7), अहं ब्रह्मास्मि (बृ उप. I. 4. 10); अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः। बृह उप II 5-19.
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