Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.s3.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.s3.1
- Language
- Hindi
c11.s3.1
भारतीय मलमल की रोम साम्राज्य में बड़ी कीमत होती थी पेरिप्लस के अनुसार सबसे अच्छी मलमल को 'मोनाचे' और कुछ घटिया रुई के बने कपड़े को जिसका व्यवहार खोल बनाने के लिए होता था 'सगमतोगेने' कहा जाता था । ये कपड़े गुजरात में बनते थे और भड़ोच से एक घटिया बैंगनी रंग के 'मोलोचीन' नामक कपड़े के साथ पूर्वी अफ्रीका के बंदरों में भेजे जाते थे७ । इसी तरह के कपड़े भड़ोच होकर अरब, मिस्र और सोकोतरा भी भेजे जाते थे । भड़ोच की बंदरगाह में ये कपड़े उज्जैन और तगर (आधुनिक तेर) से आते थे८ । त्रिचनापल्ली और तंजोर में आर्गारितिक९ नाम की मलमल बनती थी जिसका यूनानी नाम चोलों की राजधानी उरैयूर (आधुनिक त्रिचनापल्ली का एक भाग) में बनने से पड़ा । मसालिया (आधुनिक मसुलीपतन) में भी काफी मलमल बनती थी१० । पर सब से अच्छी मलमल का नाम 'गेंजेटिक' था और वह शाफ के अनुसार ढाका के आस-पास बनती थी११ । काशी भी उस युग में कीमती मलमल बनाने का एक बड़ा केन्द्र था और हो सकता है कि गेंजेटिक से यहां काशी की मलमल का उद्देश्य रहा हो । रोम में भारत के सादे और रंगीन वस्त्रों की इतनी अधिक मांग थी कि दूसरे देशों के कपड़ों की मांग काफी गिर गयी । इस देश की सब से अच्छी मलमल का नाम रोमनों ने 'वेंटस टेक्सटाइलिस' (हवा की तरह कपड़े) और 'नेबुला' रक्खा । एरियन के अनुसार भारत में बने सूती कपड़े दूसरे देशों में बने कपड़ों से अधिक सफेद और चमकीले होते थे तथा लूशियन के अनुसार भारतीय कपड़े यूनानी कपड़ों से भी हलके और मुलायम होते थे१२ । संस्कृत बौद्धसाहित्य में मलमल के लिए विरली शब्द आया है । बिंदुसार द्वारा एक कीमती विरली अंबपाली को भेंट दी गयी (वही, ३, २, पृ० २०) जामदानी के काम को चित्रा विरली कहते थे (वही, पृ० २३)
Cites (1)
- Mūlasarvāstivāda-vinaya — Sanskrit