Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.s5.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.s5.1
- Language
- Hindi
c11.s5.1
ऊनी कपड़े का साधारण बोधक शब्द कंबल था२१। इस युग में ऊनी कपड़ों के लिए शायद दूष्य (आधुनिक धुस्सा) शब्द का भी व्यवहार होता था२२। दिव्यावदान में कहा गया है कि उत्तर कुरु देश में कल्पदूष्य नामक वृक्ष से तुंडिचेल नाम के कपड़ों के थान पैदा होते थे, जिनसे नीले, पीले, लाल और सफेद रंग के कल्पदूष्य के छोटे बड़े टुकड़े बनते थे२३। यह भी कहा गया है कि मातंग स्त्रियां बिना कुंदी किया हुआ दूष्य (अनाहत दूष्य) पहनती थीं२४। कभी कभी ऊन और दुकूल के रेशों को मिलाकर बहुत अच्छे कपड़े बिने जाते थे (ऊर्णा दुकूलमयशोभनवस्त्राणि)२५। एशिया के ऊनों में कश्मीर, भूटान, तिब्बत और उत्तरी हिमालय में बकरों के रोयें का ऊन जिसे पश्म कहते हैं अपने चिकने पोत के लिए प्रसिद्ध है। रोम के बादशाह ऑरेलियन को ईरान के बादशाह द्वारा एक लाल रंग के पश्मीने के रुमाल के भेजने का उल्लेख है। वामिंगटन का कहना है कि यह रुमाल भारतवर्ष का बना था२६। रोमन कानून के संग्रह (३९।५।७) में मारोकोकोरम लाना भारत के उत्तरी-पश्चिमी बंदरगाहों से लाया गया पश्म था जो मिस्र देश में बुना जाता था। वामिंगटन का अनुमान है२७ कि मारोकोकोरम शब्द शायद काराकोरम का अपभ्रंश है। इसमें संदेह नहीं कि आज दिन भी सब से अच्छा पश्म पामीर से आता है। रंगीन पश्म भारत से बाहर नहीं जाता था और इसलिए अर्रेलियन और उसके परवर्ती राजाओं को लाल पश्मीना देखकर विस्मय होता था२८। प्राचीन काल में पश्म का बहुत दाम होता था। इस बात का उल्लेख है कि ससानी बादशाह हुरमुज द्वितीय (ई० ३०२-३१०) ने काबुल के राजा की कन्या से जब विवाह किया तब उसके दहेज में काश्मीर के अच्छे से अच्छे पश्मीने के बने शाल दुशाले आये, जिनकी कारीगरी देखकर सब लोग चकित हो गये२९।
Cites (1)
- Mahābhārata — Vyāsa, Sanskrit