Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s3: गंधार की मूर्ति कला में पगड़ियां
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s3
- Language
- Hindi
गंधार की मूर्ति कला में पगड़ियां
c12.s3.1
१—चक्करदार लट्टू वाली पगड़ी (आ० १३७)१९। २—हलकी पगड़ी जिनके दोनों छोर सिर पर आड़े बल होते हुए पीछे खोंस दिये गए हैं (आ० १३८)२०।
c12.s3.2
१३ फूशे, वही, भा० २, आ० ३२०, ३६८, ४१५
c12.s3.3
१९ ए० एस० आ० इ०, एन० रि०, १६१२-१३, प्ले० ६ ए
c12.s3.4
२० वही, १६१५-१६, प्ले० २० ई०
c12.s3.5
१३२
c12.s3.6
१३३
c12.s3.7
१३४
c12.s3.8
१३५
c12.s3.9
१३६
c12.s3.10
१३७
c12.s3.11
१३८
c12.s3.12
१३९
c12.s3.13
१४०
c12.s3.14
१४१
c12.s3.15
१४२
c12.s3.16
३—एक हल्की पगड़ी जिस पर एक तिकोना अलंकार लगा है (आ० १३९)२१ ४—एक हल्की मोटे फेंटों वाली पगड़ी जिसका सिर के ऊपर वाला सिरा पंखाकार है (आ० १४०)२२ ५—शीर्षपट्ट के साथ एक भारी पगड़ी जिसके लट्टू स एक एक मोती की लड़ दोनों ओर बंधी है (आ० १४१)२३।
c12.s3.17
२१ वही, प्ले० जे
c12.s3.18
२२ वही, १६११-१२, प्ले० ४२, १७
c12.s3.19
२३ वही, प्ले० ४०, १२
c12.s3.20
गंधार की मूर्तिकला में सेठ दाताओं को धोती, दुपट्टा और चादर पहने दिखाया गया है (आ० १४२)२४। यही पोशाक व्यापारियों२५ और गृहपतियों की भी थी२६। सरदी में वे कंचुक पहनते थे जिसके दाहिने२७ या बायें ओर२८ घुटनों के ऊपर एक कटाव होता था। एक चुस्त बाहों वाले लंबे कोट में गले से ले कर छाती के मध्य तक अथवा नाभि तक एक खड़ी पट्टी का मतलब शायद तुकमा-धुंडी की कतार से है२९। सहरी बहलोल से मिली एक दाता की मूर्ति एक चुस्त बाहों वाला कंचुक पहने है। चादर का एक कोना दाहिने कांख से निकाल कर बायें कंधे पर डाल दिया गया है जिससे छाती ढंक जाती है। वह एक चपकी टोपी भी पहने है (आ० १४३)३०। पुरुष शलवार भी पहनते थे जो इत्सिंग के अनुसार ईरान, तिब्बत, काशगर और तमाम तुर्किस्तान के पहरावे का एक अंग था। समूरी अस्तर वाला चोगा कभी कभी कंचुक के ऊपर पहन लिया जाता था (आ० १४४)३१
c12.s3.21
२४ फूर्शे, वही, आ० ३५०
c12.s3.22
२५ फूर्शे, वही, आ० ४४०
c12.s3.23
२६ फूर्शे, वही, आ० ३४५, ३४६
c12.s3.24
२७ फूर्शे, वही, आ० ३४६
c12.s3.25
२८ फूर्शे, वही, आ० ३५१, ३५३
c12.s3.26
२९ वही, भा० २, आ० ३७०
c12.s3.27
३० ए० एस० ई०, एन० रि०, १६११-१२, प्ले० ४१, १४
c12.s3.28
३१ फूर्शे, वही, आ० ३५२