Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s8.t2.49
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s8.t2.49
- Language
- Hindi
c12.s8.t2.49
मथुरा की मूर्तिकला में स्त्रियां प्रायः एड़ी तक पहुंचती साड़ियां जिनके ऊपर स्थान-च्युत होने से बचाने के लिए अनेक लड़ों वाली करधनियां होती हैं, और तहदार दोनों कंधों को ढकते हुए नीचे लटकने वाले दुपट्टे पहिनती थीं (आ० २०१-०४)६३। लेकिन अक्सर दुपट्टा नहीं भी पहना जाता था। उसे उमेठे हुए कमरबंद से कमर के दोनों ओर फंदे पड़ते हुए बांधा जाता था। साड़ी की खूबसूरती इससे बढ़ जाती थी (आ० २०५)६४। कभी कभी कमरबंद का लंबा सिरा कमर से बांध लिया जाता था और झब्बेदार छोटा सिरा सामने लटकता हुआ छोड़ दिया जाता (आ० २०६)६५ था। कभी कभी कमरबंद दोहरा कर के उसका निचला भाग कमर में नाभि के पास खोंस लिया जाता था और उसमें दोनों सिरे खाली छोड़ दिए जाते थे (आ० २०७)६६। दूसरी जगहों में कमरबंद के झब्बेदार सिरे मोड़ कर दायीं ओर खोंस लिए जाते थे और तब कमरबंद के कुछ भाग को मोड़ कर नाभि के पास साड़ी में खोंस लिया जाता था। कमरबंद का छुट्टा सिरा बायें हाथ में जान बूझ कर पकड़ लिया जाता था (आ०२०८)६७। पटका पहनने की भी बहुत सी रीतियां थीं (आ० २०९-२१२)६८।