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Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s9.1

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s9.1

Language
Hindi

c12.s9.1

जैसा हम देख आये हैं इस युग में दक्षिण भारत की वेश-भूषा का आनुषंगिक रूप से उल्लेख हम दक्षिण के संगम युग के साहित्य में पाते हैं। यह हमारा भाग्य है कि अमरावती नागार्जुनी कोंडा, ओर गोल्ली से मिले हुए अर्धचित्र तत्कालीन आचार विचार ओर वेश-भूषा को अक्षुण्ण बनाये रखते हैं । इन अर्धचित्रों से हम तत्कालीन वेश-भूषा का जीता जागता चित्र खींच सकते हैं । अर्धचित्रों में अंकित दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत के लोगों की तरह एड़ी के जरा ऊपर तक पहुंचती धोती पहनते हैं। एक चुना हुआ अंश नाभि के पास कमर में खोंस लिया जाता है ओर लांग पीछे खोंस ली जाती है (आ० २१८)[^१०५ ।] धोती पहिरने के दूसरे ढंग में धोती घुटनों तक पहुंचती है (आ० २१९)[^१०६ ।] तीसरी रीति में चुना हुआ धोती का अंश जांघों के बीच से होकर पीछे खोंस लिया जाता था(आ० २२०-२२१)[^१०७ ।] कमरबंद बांधने की अनेक कलात्मक रीतियां थीं। एक रीति में कमरबंद का एक फेंटा दोनों सिरों को छोड़ कर बांध लिया जाता था, दूसरा फेंटा मोड़ कर कमर पर खोंस लिया जाता था (आ० २२०) । एक दूसरी रीति में कमरबंद का एक फेंटा बांध लिया जाता था ओर छुट्टा हिस्सा मोड़ लिया जाता था, दूसरा हिस्सा पहले फेंटे से तीन फेरे निकाल कर लटका दिया जाता था (आ० २२२)[^१०८ ।] तीसरी रीति में कमरबंद एक फेंटे का होता है और इसके छूट्टे सिरे मोड़ कर कमर के अगल बगल खोंस लिये जाते हैं (आ० २१८) । चौथी रीति में कमरबंद के एक सिरे की दाहिनी ओर सकरमुद्धी बना ली जाती है इसका एक सिरा तो