Pracin Bharatiya Veshabhusha c12.s9.86
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12.s9.86
- Language
- Hindi
c12.s9.86
इस युग में ठेठ दक्षिण भारत के उच्चवर्गों में कंचुक पहनने की प्रथा नहीं थी। राजे, बड़े राज कर्मचारी तथा सामंत कंचुक नहीं पहनते थे। सेवक, गायक, वादक तथा विदेशी गोल गले वाला तथा पूरी तथा कसी बाहों वाला कंचुक जो कमर तक पहुंचता है, पहनते थे। कंटोपा, धोती तथा रूमाल के साथ कंचुक पहनने की प्रथा थी (आ० २५०)। यह पगड़ी, दुपट्टा और धोती के साथ भी पहरा जाता था (आ० २३२)। शरीर के साथ यह कमरबंद से जकड़ा होता था (आ० २५०)। कभी कभी ढीले बाहों वाला घुटनों के जरा नीचे तक पहुंचता कंचुक टोपी और चूड़ीदार पाजामा पहना जाता था (आ० २५४)१४०। पालकी उठाने वाले आधी बाहों वाला कसर कंचुक कमरबंद के साथ पहनते हैं (आ० २५२)। एक ऐसा ही बिना बाहों वाला कंचुक पहने एक दूसरा वाहक दिखलाया गया है (आ० २५२) एक दूसरा आदमी जो विदेशी मालूम पड़ता है एक आधी जांघों तक पहुंचता पूरी बाहों वाला किसी धारीदार कपड़े से बना कंचुक पहने दिखलाया गया है (आ० २५३)। घोड़े की रास पकड़े हुए एक साईस एक विचित्र तरह का कोट पहने है जिसकी तुलना अंग्रेजी टेल कोट से की जा सकती है। कोट अघवंहियां है और उसका बायां पख (फ्लैप) दाहिने पख पर चढ़ता हुआ दिखलाया गया है। चार फेंटे वाले कमरबंद से यह कोट शरीर से जकड़ा है (आ० २५५)१४१। ग्वाले और इसी तरह के दूसरे व्यवसायी जांघिया पहनते हैं (आ० २५६)१४२। यह जांघिया सकरमुद्दीदार कमरबंद से बंधी रहती है।