Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s10: कपड़े बनाने की प्रक्रिया
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s10
- Language
- Hindi
कपड़े बनाने की प्रक्रिया
c13.s10.1
अमरकोश में कपड़े बिनने में करघे पर से लेकर माड़ी देने और कुंदी करने तक की क्रियाओं का वर्णन है । करघे पर से तुरन्त कपड़े को अनाहत (बिना कुंदी किया हुआ), निष्प्रवाणि (तुरन्त करघे से उतरा) या तंत्रक (करघे पर बुना) कहते थे९० ।
c13.s10.2
९० अ० को०, २, ६, ११२
c13.s10.3
कपड़ों के नाम—कपड़े के छोरों को दशा या बसति, लंबाई को दैर्घ्य, आयाम और आरोह और चौड़ाई को परिणाह या विशालता कहते थे९१ ।
c13.s10.4
९१ अ० को०, २, ६, ११४
c13.s10.5
कपड़ों के भिन्न भिन्न नाम और दाम—कपड़ों के छ पर्यांयवाची यथा वस्त्र, आच्छादन, वास, चेल, वसन और अंशुक थे९२ । कीमती वस्त्रों के लिए सुचेलक और पट शब्द आए हैं और मामूली कपड़ों के लिए वरासि और स्थूल शाटक९३ । यहाँ यह बात गौर करने की है कि हल्के और नकली कलाबत्तू की बनी साड़ी को आज दिन भी बनारस में रासी माल कहते हैं जो संस्कृत वरासि का का रूपांतर मात्र है । लेकिन वैदिक साहित्य में वरासि के अर्थ वरस की छाल के रेशे से बना एक घटिया कपड़ा होता है९४ ।
c13.s10.6
९२ अ० को०, २, ६, ११५
c13.s10.7
९३ अ० को०, २, ६, ११५
c13.s10.8
९४ भारतीय विद्या, १, १, पृ० ३४
c13.s10.9
चादरें—अमरकोश में ओढ़ने बिछाने की चादरोंके भी कई नाम कहे गए हैं। ओढ़ने की चादर को निचोल और प्रच्छदपट और कालीन के लिए रल्लक और कंबल शब्द आए हैं९५।
c13.s10.10
९५ अ० को०, २।६।११६
c13.s10.11
कपड़े की धुलाई—नायाधम्म९६ के अनुसार कपड़े पहले सज्जी के घोल में डाल दिये जाते थे। फिर इन्हें उबाल लिया जाता था और बाद में साफ पानी से धो लिया जाता था। आज दिन भी धोबी अक्सर कपड़े इसी तरह धोते हैं।
c13.s10.12
९६ नायधम्म, ३, ६०
c13.s10.13
कपड़े बनाने के प्रसिद्ध स्थान
c13.s10.14
मधुरा की डोरिया—युवान च्वांड् का कहना है कि उसके समय में मधुरा की डोरिया प्रसिद्ध थी९७। इस संबंध में यह ध्यान देने योग्य बात है कि अजंटा के भित्तिचित्रों में स्त्री-पुरुष दोनों धारीदार कपड़े पहनते हैं।
c13.s10.15
९७ वाटर्स, वही, भा० १, पृ० ३०१
c13.s10.16
मंदसोर के रेशमी बुनकर—कुमारगुप्त के काल के मंदसोर से मिले एक शिलालेख से पता चलता है कि लाट अर्थात् गुजरात से कुछ रेशमी कपड़े बुनने वाले मंदसोर में आ कर बस गए थे। इनमें से कुछ तो दूसरे व्यवसायों में लग गए पर बाकी ने एक अपनी अलग श्रेणी बना ली। इस श्रेणी ने स० ४३७-३८ में एक सूर्य का मन्दिर बनवाया जिसकी मरम्मत ४७३-७४ ई० में हुई और इसी अवसर पर उपरोक्त शिलालेख प्रस्तुत किया गया९८। इस लेख में कारीगरों ने अपने व्यवसाय और कारीगरी के प्रति अपना स्वाभाविक अभिमान प्रकट किया है। वे कहते हैं कि तारुण्य और कांति से युक्त होने पर भी, सुवर्णहार तांबूल और फूलों से सजे होने पर भी तब तक स्त्रियां प्रिय नहीं बनतीं जब तक वे रेशमी वस्त्र न पहनें। ये वस्त्र छूने में कोमल (स्पर्शवता) तथा वर्णान्तर विभाग से अलंकृत होते थे९९।
c13.s10.17
९८ इंडि० एंटि०, १५, पृ० १७६
c13.s10.18
९९ वही, पृ० १७७
c13.s10.19
ऊपर के वर्णन से पता चलता है कि गुप्तयुग में मंदसोर के बने रेशमी जोड़े स्त्रियों को बहुत प्रिय थे। ये वस्त्र छूने में कोमल होते थे और इनमें रंगों का अपूर्व समतुलन होता था। वर्णन से ऐसा मालूम पड़ता है कि यहां पटोले से प्रयोजन है।
c13.s10.20
आसाम के रेशमी कपड़े
c13.s10.21
आसाम की अंडी और मूंगा आज दिन भी अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध हैं। गुप्त-युग में आसाम में नकाशीदार रेशमी कपड़े बनते थे। आसाम के राजा ने श्री हर्ष के पास जो उपायन भेजे१०० उनमें भोजपत्र जैसी कोमल जातीपट्टिका और कोमल चित्रपट के टुकड़े
c13.s10.22
१०० हर्षचरित, पृ० २१४, (कावेल का अनुवाद)
c13.s10.23
भी थे। कावेल ने जाती पट्टिका का अर्थ यहां धोती अथवा साड़ी किया है पर यह ठीक नहीं है। वास्तव में इसके शाब्दिक अर्थ के अनुसार इसका अर्थ होता है रेशमी वस्त्र के लंबे थान जिनमें चमेली के फूलों की नकाशी बनी हो (जाती = चमेली, पट्टिका = पट्टियां)। भोजपत्र से इसकी तुलना से पता लगता है की जातीपट्ट किसी तरह का मूंगा था क्योंकि आज दिन भी इसका रंग भोजपत्र जैसा ही होता है। चित्रपट में लगता है भरी नकाशी होती थी।
Cites (4)
- Nāyādhammakahāo — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
- Harṣacarita — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Nāmaliṅgānuśāsana (Amarakośa) — Classical Tibetan
- Mudiyanūr copper plates (EC 10 Mb 157) — Sanskrit