Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s16: संस्कृत साहित्य में सिले और बेसिले कपड़े
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s16
- Language
- Hindi
संस्कृत साहित्य में सिले और बेसिले कपड़े
c13.s16.1
यह कहा जा चुका है कि अधिकतर भारतीय सिले कपड़े नहीं पहनते थे । पुरुष धोती और दुपट्टे पहिनते थे और स्त्रियां साड़ी । हमारे देश की जलवायु को देखते हुए जो वर्ष में अधिकतर गरम और खुश्क रहती है, धोती, दुपट्टा, चादर और साड़ी उपयुक्त और स्वास्थ्यकर पहरावे हैं । लेकिन इसके यह माने नहीं हैं कि भारतीयों को सिले कपड़े पहनने से कोई रुकावट थी । बिना खिले कपड़े सादे होते थे इसलिए धोती, दुपट्टा और चादर ऐसे कलात्मक ढंग से पहने जाते थे कि जिससे पंहनने वाले के सौंदर्य में अभिवृद्धि होती थी और कपड़े भी बड़े सुहावने लगते थे ।
c13.s16.2
अमरकोश में सिले और बेसिले कपड़ों के बारे में बहुत कम कहा गया है। इसमें धोती के लिए चार शब्द हैं यथा, अंतरीय, उपसंव्यान, परिधान और अधोंशुक, १०८ तथा दुपट्टे और चादर के लिए पांच यथा, प्रावार, उत्तरासंग, बृहतिका, संव्यान और उत्तरीय१०६।
c13.s16.3
१०६ वही, पृ० १२५
c13.s16.4
१०८ तमोनशचन्द्र दास, आसपेक्ट्स ऑफ़ बंगाली सोसाइटी फ्रोम बंगाली लिटरेचर, पृ० १८०-१८१, कलकत्ता, १६३५
c13.s16.5
१०८ अमरकोष, २, ६, ११७
c13.s16.6
१०६ वही, २, ६, ११७-११८
c13.s16.7
धोती और दुपट्टे के लिए भिन्न समानार्थक शब्दों में, उनके नाम और बनावट के अनुसार क्या क्या भेद थे, यह कहना कठिन है ।
Cites (1)
- Nāmaliṅgānuśāsana (Amarakośa) — Classical Tibetan