Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s2.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s2.1
- Language
- Hindi
c13.s2.1
विदेश से क्रीत दासियों के लाने की प्रथा इस देश में गुप्तकाल के बहुत पहले से थी। 'पेरिप्लस आफ दी एरीथ्रियनसी'२ में (पहली शताब्दी ई०) इस बात का उल्लेख है कि भरोच के बन्दरगाह में उतरने वाली बहुमूल्य वस्तुओं में जो राजा के व्यवहार के लिए होती थीं कीमती चांदी के बर्तन, गायक लड़के और अन्तःपुर के लिए सुन्दर दासियां होती थीं। विदेशों से दासियां लाने की प्रथा का जैन साहित्य में भी जो गुप्तकालीन अथवा उसके कुछ पहले का है वर्णन है। 'अंतगडदसाओं'३ में विदेशी दासियों की एक तालिका दी हुई है। कथा में इस बात का उल्लेख है कि बचपन में राजकुमार गौतम की सेवा अनेक जातियों की विदेशी दासियां करती थीं। बब्बर४ (बर्बर), पोसय (बौसी)५, यूनानी (जोणिय, यवनी), पल्हविय (पहलवी), इषिणय (इषिणी),६ घोणगिणिणि, लासिय, लूसिय, दामिली (तामिल), सिंहली, आरबी (अरब), पुलिंद, पक्कणी,७ बहली (बलख देश की), मुरुंडी (मुरुंडी)८ शबर और पारसी, (पारसीही) इन दासियों में मुख्य होती थीं। इन विदेशी दासियों के वस्त्र उनके देशों के अनुरूप होते थे (विदेस परिमण्डियाहि) और इनके कपड़ों