Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s24: पदाति और अश्वारोहियों के पहरावे
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s24
- Language
- Hindi
पदाति और अश्वारोहियों के पहरावे
c13.s24.1
बाण भट्ट को तत्कालीन सिपाहियों के पहिरावे का अच्छा ज्ञान था । उस युग में पैदल सिपाही कृष्णागरुचर्चित कंचुक पहनते थे । उनके सिर रुमाल से ढंके रहते थे और कटार दोहरे कमरबंद के फेंटे में खुसी रहती थी१२७ । घुड़सवार कभी कभी वारवाण पहनते थे१२८ । सिपाही कभी कभी वार्षवंवरनुमा कपड़े से बने कंचुक और रंग बिरंगी पट्टियों से बनी पगड़ियां पहनते थे१२९ । युद्धक्षेत्र में जाने वाले योद्धाओं का निम्नलिखित वर्णन हर्षचरित में दिया है—"उनकी जंघाएं चित्रित और सुकुमार नेत्रपट से ढकी थीं । उनके ताम्र वर्ण पैर कीचड़ से सने वस्त्र से चित्रित थे और उनके पाजामे भौंरे से काले थे । उनके कंचुक लाजवर्दी रंग के थे । उनके ऊपर उन्होंने चीन-चोलक तथा तारमुक्ता वाले स्तवरक पहन रक्खे थे । उनके कूर्पासक रंग बिरंगे और उनकी चादरें हरी थी । उनकी पगड़ियों में कर्णोत्पल की नालें खुसी थीं । बहुधा उनके सिर केसरिया उत्तरीय से भी ढंके थे१३० ।
c13.s24.2
१२७ पिनद्ध-कृष्णागुरु-पङ्करुचकच्छुरण-कृष्ण-शवल-कषाय-कञ्चुकेन उत्तरीयकृतशिरोवेष्टनेन, द्विगुणपट्टपट्टिकागाढ़ग्रंथिग्रंथितासिधेनुना, वही, पृ० १६
c13.s24.3
१२८ धवलवारवाणधारिणं, धौतदुकूलपट्टिकापरिवेष्टितमौलिम, वही, पृ० १६
c13.s24.4
१२९ जरद्गवाधचर्म-शबल-वसन-कंचुकधारिभिः, अनेकादृष्टचीरकोद्बद्धमौलिभिः, कादंबरी, पृ० १६१।
c13.s24.5
१३० उच्चित्रनेत्र-सुकुमार-स्वस्थण-स्थगितजंघाकाण्डैश्च, कर्दमिक-पट-कल्मषितपिशंगपिगैः अलिनील मसृणसतुल-समुत्पादितकंचुकैः उपचितचीनचोलकैरच, तारमुक्तास्तबकित-स्तवरक-वारवाणैश्च उन्नीषि पट्टावस्तब्ध-कर्णोत्पलनालैश्च, कुंकुमराग-कोमलोत्तरीयान्तरितोत्तमांगैश्च, हर्षचरित, पृ० २०२।
c13.s24.6
ऊपर के वर्णन में बहुत से शब्द वस्त्र और वेश भूषा के संबंध में आए हैं जिनके विषय में कुछ कहना आवश्यक है ।
c13.s24.7
(१) नेत्र—इस रेशमी कपड़े के बारे में हम कुछ पहले ही कह आए हैं यहां नेत्र के वर्णन से पता लगता है कि वह कोमल नक्काशीदार रेशमी कपड़ा (उच्चित्रसुकुमार), रेशमी वस्त्र होता था । (२) कंचुक—अमरकोश के अनुसार१३१ कंचुक और वारवाण शरीर के बस्तर को कहते थे । लेकिन योद्धाओं के कंचुक को लगता है कुरतानुमा होते थे । एक जगह तो यह बुंदकीदार कपड़े का और दूसरी जगह यह नीले कपड़े का बना बतलाया गया है ।
c13.s24.8
१३१ —अ० को०, २, ८ ६४
c13.s24.9
(३) वारबाण—वारबाण वह स्तबरक कपड़े का बना होता था जिसके चमकीले मोती के गुच्छे टंके होते थे। स्तबरक शब्द संस्कृत का न हो कर पहलवी भाषा का है। कुरान शरीफ में भी इसका जन्नत के प्रकरण में उल्लेख है । ऐसा मालूम पड़ता है कि यह काफी कीमती कपड़ा होता था । स्तबरक के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि सासानी, ईरान और भारत से काफी व्यापारिक संबंध था१३२ । स्तवरक के उल्लेख से यह भी साफ हो जाता है कि वारबाण लोहे का बना जिरह बस्तर नहीं था। हो सकता है कि वारबाण मुगल कालीन चिल्ते की तरह एक भरा हुआ कोट हो जिसे तलवार के वार से शरीर को बचाने के लिए पहना जाता था ।
c13.s24.10
१३२ —रिचार्ड जेफरी, ए वोकाबुलरी आफ फारेन वर्ड्स इन् कुरान, गायकवाड ओरियंटल सीरीज १९३८, कुरान में इस्तब्रक, ८, ३०; ४४, ५३, ७६, २१ का व्यवहार रेशमी किखाब के अर्थ में हुआ है। अधिकतर टीकाकारों ने इसे फारसी से उधार लिया शब्द माना है । यह शब्द पहलवी स्तीर से निकला है जिसका अर्थ मोटा और सुन्दर कपड़ा होता है ।
c13.s24.11
(४) चीन चोलक—कावेल चीन चोलक को जिरह बस्तर का चहार आइना समझते हैं। इसके वर्णन से एक बात तो पक्की हो जाती है कि यह कंचुक के ऊपर पहना जाता था और इसलिए शायद वह किसी तरह का चहार-आईना रहा हो । यह रूई भरा हुआ पूरी बांह का लंबा कोट भी हो सकता है जो मध्य एशिया में सर्वत्र पहना जाता है। जो भी हो प्रायः यह तो निश्चय है कि मध्य एशिया से आया हुआ कोई बस्तरनुमा वस्त्र था जिसे सातवीं शताब्दी में भारतीय योद्धा पहनते थे ।
c13.s24.12
कूर्पासक—अमरकोश और ऋतु संहार में तो यह शब्द स्त्रियों की चोली के लिये आया है पर यहां तो उसे योद्धा पहनते थे । लगता है कूर्पासक आधे बांह वाली मिर्जई अथवा कोई गंजीनुमा वस्त्र रहा हो। अजंटा के भित्ति चित्रों में सिपाही ऐसा वस्त्र पहने बहुधा दिखलाए गए हैं।
Cites (3)
- Harṣacarita — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Nāmaliṅgānuśāsana (Amarakośa) — Classical Tibetan
- Kādambarī — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit