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Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s26: पगड़ियां

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s26

Language
Hindi

पगड़ियां

c13.s26.1

अजंटा के भित्ति चित्रों में बहुत कम लोग पगड़ी पहने दिखलाये गए हैं लेकिन गुप्त सिक्कों पर अंकित मूर्तियों के सिरों पर तो अक्सर पगड़ियां देख पड़ती हैं। गुप्तकालीन साहित्य में बहुत जगह पगड़ी के उल्लेख हैं। हर्ष चरित में१३६ एक जगह पगड़ी बांधने के लिए मलमल की पट्टियों का उल्लेख है। एक दूसरी जगह पगड़ी के बीच के बड़े लट्टुओं का जिक्र है१४०। अजंटा के भित्ति चित्रों में पगड़ियों का कम आना किसी स्थानिक विशेषता का द्योतक है, अथवा शायद पगड़ियां चित्रकारों ने इसलिए नहीं बनायीं क्योंकि उन्हें स्त्री पुरुषों के सुन्दर केश रचना से दिखलाना था, पगड़ियां रख कर वे ऐसा नहीं कर सकते थे।

c13.s26.2

१३६ धातुरासारुणेन कर्पटेन कृतोत्तरासंग, हर्षचरित पृ० ८६।

c13.s26.3

१३६ अंशुकोष्णीष-पट्टिकाभिव, हर्षचरित, पृ० १४।

c13.s26.4

१४० उष्णीषपट्टकल्ललाट-मध्यघटित-विकट-स्वस्तिक-ग्रंथि, हर्षचरित, पृ० ६०-८१।

c13.s26.5

४

c13.s26.6

जैन छेद सूत्रों में जिनका अभी बहुत कम अध्ययन हुआ है भारतीय वेश भूषा और कपड़ों के इतिहास के लिए बहुत सामग्री सुरक्षित है। इनसे हमें जैन साधुओं और गुप्त युग के नागरिकों की वेश भूषा का पूरा पता चलता है। छेद सूत्रों का विषय साधुओं का आचार विचार है। कुल मिला कर छ छेद सूत्र हैं जिनमें बृहत् कल्पसूत्र भाष्य का बड़ा स्थान है। सूत्रों में तो वस्त्र संबंधी सामग्री कम है पर बाद के लिखे भाष्यों और टीकाओं में काफी सामग्री है।

c13.s26.7

बृहत् कल्पसूत्र भाष्य के, जो भारत के सामाजिक इतिहास के लिए एक अभूत पूर्व ग्रन्थ है, एक खंड में साधुओं के वस्त्र पर तथा अविहित वस्त्रों के पहनने से पाप और उसके दूर करने प्रायश्चित्त संबंधी नियम हैं। आनुषंगिक रूप से इस खंड में नागरिकों की वेश भूषा का भी वर्णन आ गया है। इस ग्रंथ का सूत्र भाग निश्चय ही बहुत प्राचीन है और इसके रचयिता भद्रबाहु चन्द्रगुप्त मौर्य के समकालीन माने जाते हैं। इसका भाष्य जिनदास ने शायद छठी सदी में लिखा। इसमें ईसा की आरंभिक शताब्दियों के सामाजिक इतिहास का मसाला है पर अधिकतर मसाला गुप्त युग का है।

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