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Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s43.1

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s43.1

Language
Hindi

c13.s43.1

कश्मीर से ले कर मंगोल प्रदेशों तक जिनमें सूली (रूसी तुर्किस्तान), तिब्बती और तुर्की नस्ल की जातियां आ जाती थीं लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे । सूती वस्त्रों का व्यवहार तो यहां के लोग यदा कदा ही करते थे। शीत की वजह से लोग कमीज और पाजामे पहनते थे । भिक्षु और साधारण जन लि-प नाम का एक विशेष वस्त्र पहिनते थे२२६। यह लि-प शायद संस्कृत रेफ से निकला है और इसके बनाने का निम्नलिखित तरीका दिया गया है—रेफ बनाने के लिए कपड़ा इस तरह काटा जाता था कि उसमें पीछा न पड़े और एक कंधा भी न ढंके । इसमें बांहें भी नहीं होती थीं और बायां कंधा ढंकने वाला भाग सकरा होता था । ठंडी हवा से बचने के लिए इसे दाहिनी बगल में बांध लिया जाता था । मोटा और गरम बनाने के लिए इस वस्त्र में रूई भर दी जाती थी । कभी कभी यह वस्त्र दाहिनी ओर सिला होता था और उसके सिरे पर बंद जोड़ दिये जाते थे । इत्सिंग ने पश्चिमी भारत में उत्तरापथ से आये भिक्षुओं को रेफ पहने देखा था। बिहार की गरम जलवायु की वजह से नालंदा में यह वस्त्र नहीं पहना जाता था। कुछ लोग कमीज भी पहनते थे, गो कि भिक्षुओं के लिए यह वस्त्र अविहित था२३०