Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s46.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s46.1
- Language
- Hindi
c13.s46.1
गुप्त-युग में प्रचलित जूतों पर भी चीनी साहित्य से कुछ प्रकाश पड़ता है। फान-यू-त्सा-मिंग में चीनी शब्द हियू का जिसके माने बूट होते हैं पर्यायवाची शब्द कवाश दिया है पर यह शब्द संस्कृत साहित्य में नहीं आता। पेलियो के अनुसार यह शब्द जूते के लिए फारसी कफ्स से बहुत कुछ मिलता है जो मध्य एशिया की तुर्की भाषाओं में काफारिश तथा किपिश शब्दों में जिनके माने जूते होते हैं बच गया है। इस शब्द की तुलना तिब्बती कव-श, जिसके माने धनी तिब्बतियों का भारतीय ढंग का जूता होता है, की जा सकती है। ले-फान-तांग्-सियाओ-सी (ब्रम्ह-चीन-वतंग्रह) में जो इत्सिंग के चीनी कोश का एक उपोद्घात है, दो चीनी शब्द हियू और हिआइ जिनके अर्थ बूट और जूते होते हैं पर्यायवाची संस्कृत शब्द शवनस और पूल दिये गये हैं। महाव्युत्पत्ति में बूट और जूतों के लिए उपानह, पादुका, पादवेष्टनिका पूल और मंडपूल (मुंडपूल) शब्द आए हैं। ले-फान-तांग-सियाओ-सी और महाव्युत्पत्ति के पूल एक ही है पर शकनस और पूल की व्युत्पत्तियों का ठीक ठीक पता नहीं चलता२३५। लगता है कि जूतों के लिए ऊपर आये शब्द या तो मध्य एशिया में बनाये गये या देशी भाषा से लिये गये। हमें पूल का तो पता नहीं लगता लेकिन महाव्युत्पत्ति के मुंडपूल का संबंध उत्तर भारत के मुंडे जूते से हो सकता है, जिसमें अलंकारिक चोटियां नहीं होतीं। पूर्वी युक्त प्रदेश में अब भी मुंडा जूता पहना जाता है। फान-युत्सा-मिंग के कवशि का प्राकृत रूपान्तर हमें बृहत् कल्पसूत्र भाष्य२३६ के घुटने तक पहुंचने वाले खपुसा नाम के जूते में मिलता है। इस बात की काफी संभावना है कि खपुसा या कवशि ईरानी बूट थे जिन्हें शक और कुषाण इस देश में लाये।
Cites (1)
- Mahāvyutpatti — Sanskrit