Pracin Bharatiya Veshabhusha c5.s3.9
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c5.s3.9
- Language
- Hindi
c5.s3.9
गया हो क्योंकि सांची में इस शिरोवस्त्र का रूप ऐसा ही बनाया गया है। जब यह शिरोवस्त्र दोनों तरफ दियलीदार न होकर सादा होता था तो इस पर कुछ अलंकार होते थे। कभी कभी इसके दोनों ओर वृत्ताकार अलंकार होते थे और कभी मनके की लड़ों और एक चों गानुभा अलंकार से इसकी सजावट होती थी (आ० ९-१०) १४। कहीं कहीं शिरोवस्त्र सीधा सिर पर रक्खा हुआ देख पड़ता है और कहीं कहीं वह पीठ पर गिरती चोटी से लगा हुआ और सिर से एक फीते से बंधा मालूम पड़ता है१५। दियलीदार शिरोवस्त्र तो शायद देवी माता ही पहिनती थीं। पेशानी पर बंधे एक फीते के सहारे ये शिरोवस्त्र टिके रहते थे। शिरोवस्त्र में लगी दियलियों में काजल ऐसे कुछ धब्बे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि शायद इनमें किसी समय दीपक जलाये जाते थे१६। इससे यह भी सिद्ध होता है कि हाथ में या सिर पर दीप धारण किये हुए मध्यकालीन और आधुनिक दीपलक्ष्मी की मूर्तियों का स्रोत प्रागैतिहासिक काल में है।