Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s10.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s10.1
- Language
- Hindi
c6.s10.1
जैसा हम पहले अध्याय में कह आये हैं सिंधु सभ्यता के युग में कपास से बने कपड़े पहने जाते थे। आश्चर्य की बात है कि वैदिक संहिताओं और ब्राह्मणों में कार्पास का कहीं भी उल्लेख नहीं है। सब से पहले कपास का उल्लेख आश्वलायन और लाट्यायन श्रौत सूत्रों३८ में आया है । इन उल्लेखों के अनुसार सोमयज्ञ के पोतृ को कपास का कपड़ा (कार्पास संवास:) दक्षिणा के रूप में दिया जाता था । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या कारण था कि वैदिक आर्य कपास से इतने काल तक अनभिज्ञ थे ? उत्तर कई हो सकते हैं यथा (१) वैदिक आर्यों से और सिंधु सभ्यता से कोई सरोकार नहीं था और वे भारत में उस काल में आये जब सिंधु सभ्यता पूर्णतः नष्ट हो गयी थी और इसलिए उस सभ्यता के एक प्रतीक कपास की कताई बुनाई का उन्हें ज्ञान नहीं हुआ। यह ज्ञान उन्हें तब हुआ जब वे पूर्व भारत में पहुंचे जहां कपास के व्यवहार से, जैसा हमें पालि साहित्य बतलाता है, लोग भली भांति परिचित थे। (२) यह भी संभव है कि आर्यों को कपास का ज्ञान रहा हो लेकिन एक अनार्य वस्तु होने से उसके व्यवहार से वे हिचकिचाते रहे हों, गोकि इसकी संभावना कम है।