Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s13.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s13.1
- Language
- Hindi
c6.s13.1
वैदिक युग में कपड़ों पर बहुधा कसीदे का काम बना होता था। मरुत् कारचोबी के काम वाले कपड़े पहनते थे६० (हिरण्यान् प्रति अतकान्)। कपड़ों में किनारे और झालरें भी होती थीं। सिच्६१ शब्द से कसीदा किये हुए किनारे या झालर का बोध होता है। दो ऊपर नीचे के और दो बगल के किनारों का उल्लेख आया है६२। वैदिक आरोकाः६३ से शायद कपड़े पर बने अलंकारों से मतलब है। डा० सरकार का विचार है६४ कि आरोकाः की व्युत्पत्ति तामिल अरुकणि से है जिसके अर्थ होते हैं कपड़ों के अलंकृत किनारे। यज्ञ के अवसर पर कोरे कपड़े६५ पहने जाते थे पर अन्य अवसरों पर धुले कपड़े (स्वित्यञ्चः)६६। सुनहले काम वाले रंगीन कपड़े ऊषा की श्रेणी वाली रंगीली स्त्रियां पहनती थीं६७। व्रात्य गृहस्थ किनारेदार नीले कपड़े पहनने के शौकीन थे६८।