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Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s10: ब्राह्मण और श्रमणों के वस्त्र

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s10

Language
Hindi

ब्राह्मण और श्रमणों के वस्त्र

c7.s10.1

सीहनाद सुत्त८४ में इनके वस्त्रों का पूरा पूरा वर्णन हुआ है। ये सन के बने वस्त्र (शाणानि), सन और दूसरी तरह के सूतों के मेल से बुने कपड़े, मृत शरीर से अलग किये

c7.s10.2

८४ कस्सप सीहनाद सुत्त, -१४, डायलॉग्स ऑफ़ बुद्ध, पृ० २३०-२३१, पाठ दीघनिकाय, पा० टे० पृ० १६६-१६७

c7.s10.3

हुए कपड़े (छवदुस्स), घूर पर फेंके हुये चीथड़ों से बने कपड़े (पांसुदुकूलानि), तिरीट की छाल से बने कपड़े (तिरीटानि), मृगचर्म (अजिनानि), कृष्णमृग के चर्म की पट्टियों से बने कपड़े (अजिनक्खिपं), कुशा के बने कपड़े (कुशचीरं), वल्कल के बने कपड़े (वाकचीरं), लकड़ी की फराटियों या टुकड़ों से बने कपड़े (फलकचीरं), मनुष्य के बालों से बने कंबल (केसकंबलं), घोड़े की दुम के बालों से बने कंबल (वालकंबलं) और उल्लू के पंखों से बने कंबल (उलूकपक्खं) पहनते थे। ब्राह्मणों और श्रमणों के वस्त्रों का वर्णन देखकर यह पता चलता है कि उनके भिन्न भिन्न वर्गों में भिन्न भिन्न तरह के कपड़े प्रचलित थे। सन, तिरीट, मृगचर्म और वल्कल के बने कपड़े तो ब्राह्मण पहनते थे। छवदुस्स एरंड नाम की घास की चटाई शव के लपेटने के लिए होती थी८५ और पांसुदुकूल लगता है कापालिक क्रिया साधने वाले पहनते थे। केसकंबल भी एक तरह के श्रमणों का वस्त्र था। बुद्ध के समकालीन एक आचार्य का नाम केसकंबली था। लगता है फलकचीर, बालकंबल और उलूकपक्ख पहनने वाले श्रमणों के वर्ग भी रहे होंगे।

c7.s10.4

८५ कस्सप सीहनाद सुत्त, १५, टीका

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