Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s10.3
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s10.3
- Language
- Hindi
c7.s10.3
हुए कपड़े (छवदुस्स), घूर पर फेंके हुये चीथड़ों से बने कपड़े (पांसुदुकूलानि), तिरीट की छाल से बने कपड़े (तिरीटानि), मृगचर्म (अजिनानि), कृष्णमृग के चर्म की पट्टियों से बने कपड़े (अजिनक्खिपं), कुशा के बने कपड़े (कुशचीरं), वल्कल के बने कपड़े (वाकचीरं), लकड़ी की फराटियों या टुकड़ों से बने कपड़े (फलकचीरं), मनुष्य के बालों से बने कंबल (केसकंबलं), घोड़े की दुम के बालों से बने कंबल (वालकंबलं) और उल्लू के पंखों से बने कंबल (उलूकपक्खं) पहनते थे। ब्राह्मणों और श्रमणों के वस्त्रों का वर्णन देखकर यह पता चलता है कि उनके भिन्न भिन्न वर्गों में भिन्न भिन्न तरह के कपड़े प्रचलित थे। सन, तिरीट, मृगचर्म और वल्कल के बने कपड़े तो ब्राह्मण पहनते थे। छवदुस्स एरंड नाम की घास की चटाई शव के लपेटने के लिए होती थी८५ और पांसुदुकूल लगता है कापालिक क्रिया साधने वाले पहनते थे। केसकंबल भी एक तरह के श्रमणों का वस्त्र था। बुद्ध के समकालीन एक आचार्य का नाम केसकंबली था। लगता है फलकचीर, बालकंबल और उलूकपक्ख पहनने वाले श्रमणों के वर्ग भी रहे होंगे।