Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s6.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s6.1
- Language
- Hindi
c7.s6.1
पालि साहित्य में काशी के बने वस्त्रों के अनेक उल्लेख आये हैं। इन्हें काशीकुत्तम३७ और कहीं कहीं कासीय३८ कहते थे। बनारस का बना कपड़ा इतना प्रसिद्ध था कि महापरिनिर्वाण सूत्र३९ का टीकाकार विहितकण्पास पर टीका करते हुए कहता है कि बुद्ध का मृत शरीर बनारस के बने कपड़े से लपेटा गया था और वह इतना महीन और गंठ कर बुना गया था कि तेल तक नहीं सोख सकता था। बनारसी वस्त्र का उसी सूत्र में एक दूसरी जगह वर्णन करते हुए कहा गया है४० कि वह कपड़ा हर तरफ से नीली झलक मारता था। इसके सिवाय वह पीला, लाल और सफेद भी हो गया था४१। बनारसी कपड़े (वाराणसेय्यक)४२ के बारीक पोत का उल्लेख मज्झिमनिकाय में भी आया है। टीकाकार इसलिए बनारसी कपड़े की प्रशंसा करता है कि उसके अनुसार बनारस में अच्छी कपास होती थी, वहां की कात्तिनें और बुनकर होशियार होते थे, और वहां का नरम पानी धुलाई के लिये बहुत अच्छा पड़ता था। बनारसी कपड़े ऊपर नीचे दोनों ओर से मुलायम और चिकने होते थे। बनारस में सूती कपड़े के सिवाय रेशमी कपड़े क्षोम और शायद ऊनी कपड़े भी बनते थे। बनारस के रेशमी वस्त्र का एक जगह उल्लेख है४३। बनारस में क्षौम मिश्रित कंबल भी बनते थे। जीवक कुमारभृत्य को एक ऐसा ही कंबल काशिराज से उपहार में मिला था४४। महावग्ग में एक दूसरी जगह कहा गया है४५ कि एक समय काशी के राजा ने जीवक की सेवाओं से प्रसन्न होकर उसे अड्ढकासिक कंबल उपहार में भेजा। श्री राइस डेविड ने इसका अनुवाद आधे बनारसी कपड़े से बना हुआ ऊनी वस्त्र किया है लेकिन उनके कथनानुसार भी यह माने अटकल से लगाया गया है। बुद्धघोस ने अड्ढकासीय में कासी का अर्थ एक हज़ार कार्षापण किया है, और अड्ढकासीय का पांच सौ और इस तरह अड्ढकासीय का अर्थ पांच