Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s7: वस्त्रों के लिए चमड़े का व्यवहार
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s7
- Language
- Hindi
वस्त्रों के लिए चमड़े का व्यवहार
c7.s7.1
जातकों में अजिन की वस्त्र की तरह उपयोग में लाने का उल्लेख है५६। ऐसा लगता है कि बहुत प्राचीन काल में सिंह, व्याघ्र, चीते, तेंदुए, गाय और हिरन के चमड़ों का उपयोग बिछावन और वस्त्रों के लिए होता था५७। दक्षिणापथ में भी बकरों, भेड़ों और हिरन की खालों का उपयोग आस्तरण और वस्त्र के लिए होता था५८। बौद्ध भिक्षुओं को चमड़े के वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं थी, पर दक्षिणापथ में वे इनका उपयोग कर सकते थे।
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५६ जा० ६, ५००
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५७ महावग्ग, ५।१०।५-७
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५८ वही, ५।१३।६
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ऊनी और सूती वस्त्रों का व्यवहार पहनने के सिवाय चांदनी, कालीन, पर्दों और मेजपोश इत्यादि के लिए भी होता था । सज्जा के लिए ऐसे कपड़ों के उल्लेख बौद्ध साहित्य में काफी आये हैं और इनकी तालिकाएं भी महावग्ग और ब्रह्मजाल सुत्त में दी हुई हैं जिनमें बिछाने ओढ़ने के निम्नलिखित वस्त्र हैं।
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गोणक—टीका में इसका अर्थ लंबेबाल वाले बकरे के बाल से बना हुआ आस्तरण है५९। यह शब्द भारतीय साहित्य में बहुत ही कम आया है और संभव है कि यह ईरानी भाषा से लिया गया हो। इस सम्बन्ध में मैं पाठकों का ध्यान सुमेर और अक्काद के प्राचीन निवासियों के पहरावे की ओर दिलाना चाहता हूं। यह एक तहबंदनुमा वस्त्र होता था जो घुटनों तक पहुंचता था और जिसे लोग कमर में लपेट लिया करते थे । यह तहबंद एक टुकड़े में होता था, इस पर उभरी हुई धारियां होती थीं और हर धारी के अंत में झालर। यूनानी लोग इस वस्त्र को कौनकेस (Kaunkes) कहते थे और अरिस्तोफानेज के समय में यह एकबातना में बुना जाता था६०। इस कौनकेस का व्यवहार दुंगी के समय में तिपाइयों के ढकने के लिये भी होता था६१। गोणक और कौनकेस एक ही शब्द मालूम पड़ते हैं। भारत में गोणक का व्यवहार आस्तरण रूप में ही होता था, कपड़े के रूप में नहीं। अब प्रश्न यह उठता है कि भारतवर्ष में यह शब्द कहां से और कैसे आया। इसका सर्वप्रथम उल्लेख जहां तक मुझे मालूम है ब्रह्मजाल सूत्र में हुआ है । लगता यह है कि लगभग ५०० ई० पू० में ईरानी भाषा से यह शब्द पालि में आया ।
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५९ ब्र० सू०, १५, डायलाग्स ऑफ बुद्ध, पृ० ११ इत्यादि
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६० एल० देलापोर्ते, मेसोपोटामिया, पृ० १६४, लंदन, १६२५
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६१ वही, पृ० १६६
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चित्तक६२—बिस्तर ढांकने के लिए अनेक वस्त्र खंडों से बनी रंग बिरंगी कालीन ।
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६२ ब्र० सू० १५; महावग्ग, ५।१०।३
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पलिका६३—सफेद ऊनी कालीन
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६३ वही, छन्नामयो सेतत्थरको, ब्र० जा० सूत्र पर टीका
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पटलिका६४—खूब पास बने हुए फूलों वाले कालीन ।
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६४ वही, शायद यह बाद के पटोले का सर्व प्रथम उल्लेख है ।
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तूलिका६५—रूई भरी रजाई ।
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६५ ७४, वही
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विकटिका६६—ऐसे आस्तरण जिन पर सिंह, व्याघ्र इत्यादि के चित्र कढ़े हों ।
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उद्दलोमी६७—दोनों ओर रोएं वाले कंबल । यह ऊदबिलाव की खाल भी हो सकती हैं ।
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एकंतलोमी६८—एक रुखा रोएंदार कंबल ।
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कट्ठिस६९—जवाहरातों से सजे आस्तरण ।
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कोसेय्य७०—रेशमी कालीन ।
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कुत्तक७१—इतना बड़ा ऊनी कालीन जिस पर सोलह नर्तकियां एक साथ नाच सकती थीं।
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हत्थत्थर और अस्सत्थर७२—हाथी, घोड़े और रथ पर बिछाये जाने वाले आस्तरण ।
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अजिनपवेणी७३—मृगचर्मों को जोड़ कर बनाया गया कंबल ।
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कदलीमृगपवरपच्चत्थरण७४—कदलीमृग के चमड़ों से बना हुआ कंबल । कदलीमृग कौन सा पशु था यह ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । सुमंगलविलासिनी के अनुसार यह केले के पेड़ों के झुरमुट में रहने वाला एक पशु था। लेकिन महाभारत७५ और अर्थशास्त्र७६ तो इसे पहाड़ों पर रहने वाला एक मृग मानते हैं, इसलिए कदलीमृग केले के पेड़ों के झुरमुट में रहने वाला पशु नहीं हो सकता ।
c7.s7.27
७५ महाभारत, २।४५।१६
c7.s7.28
७६ अर्थशास्त्र (गणपति शास्त्री), भा० १, पृ० १६१-१६२
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चिलिमिका७७—साफ सुथरे फर्श की शोभा की रक्षा के लिए एक विशेष प्रकार का कालीन ।
c7.s7.30
७७ महावग्ग, ६।२।६, परिकम्मकत्ताय भूमिया छविसंरक्खणत्थाय अत्थरणं वुच्चति ।
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बाहीतिक७८—यह एक सोलह हाथ लंबी और आठ हाथ चौड़ी एक ऊनी चादर होती थी। एक ऐसी ही चादर राजा अजातशत्रु ने प्रसेनजित् के पास उपहार में भेजी थी। प्रसेनजित् ने इसे आनंद को भेंट कर दी।
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७८ मज्झिम निकाय, २।४।८
c7.s7.33
नमतक७९—भेड़ों या पहाड़ी बकरों के रोएं से कूट कर जमाया हुआ नमदा। कश्मीर में आज दिन भी सादे या कामदार नमदे बहुतायत से बनते हैं।
c7.s7.34
७९ चुल्लवग्ग, १०।१०।४
c7.s7.35
कोजव८०—लंबे रोएं वाला कंबल । शायद यह आधुनिक थुलमे की तरह कोई कंबल या।
c7.s7.36
८० महावग्ग, ८।१।३६
Linked texts (5)
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