Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s7.6
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s7.6
- Language
- Hindi
c7.s7.6
गोणक—टीका में इसका अर्थ लंबेबाल वाले बकरे के बाल से बना हुआ आस्तरण है५९। यह शब्द भारतीय साहित्य में बहुत ही कम आया है और संभव है कि यह ईरानी भाषा से लिया गया हो। इस सम्बन्ध में मैं पाठकों का ध्यान सुमेर और अक्काद के प्राचीन निवासियों के पहरावे की ओर दिलाना चाहता हूं। यह एक तहबंदनुमा वस्त्र होता था जो घुटनों तक पहुंचता था और जिसे लोग कमर में लपेट लिया करते थे । यह तहबंद एक टुकड़े में होता था, इस पर उभरी हुई धारियां होती थीं और हर धारी के अंत में झालर। यूनानी लोग इस वस्त्र को कौनकेस (Kaunkes) कहते थे और अरिस्तोफानेज के समय में यह एकबातना में बुना जाता था६०। इस कौनकेस का व्यवहार दुंगी के समय में तिपाइयों के ढकने के लिये भी होता था६१। गोणक और कौनकेस एक ही शब्द मालूम पड़ते हैं। भारत में गोणक का व्यवहार आस्तरण रूप में ही होता था, कपड़े के रूप में नहीं। अब प्रश्न यह उठता है कि भारतवर्ष में यह शब्द कहां से और कैसे आया। इसका सर्वप्रथम उल्लेख जहां तक मुझे मालूम है ब्रह्मजाल सूत्र में हुआ है । लगता यह है कि लगभग ५०० ई० पू० में ईरानी भाषा से यह शब्द पालि में आया ।