Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s7: पाजामा, चादर गद्दे इत्यादि
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s7
- Language
- Hindi
पाजामा, चादर गद्दे इत्यादि
c8.s7.1
(१) संपुटिका४०—गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इसके अर्थ होते हैं:—संपुटि-का जंघत्राणं सुत्थणाभिधानमिति क्वचिट्टीकादर्शं लिखितं, सन्थनमित्यन्यत्र लिखितं दृश्यते—'संपुटक जंघों की रक्षा के लिए एक वस्त्र विशेष होता था, कोई कोई टीकाकार इसे सुथना या संथन मानते हैं।' यह ध्यान देने योग्य बात है कि पाजामे के लिए आज दिन भी सुथना (संस्कृत, सूत्रनद्ध) शब्द का प्रयोग होता है।
c8.s7.2
४० —ग० शा०, १, पृ० १६४
c8.s7.3
(२) चतुरशिका४१—गणपति शास्त्री की टीका इसका अर्थ देती है—चतुरश्रिका दशारहिता नवांगुलचिह्नित कोणा—बिना किनारे वाली चादर जिसमें नौ अंगुल नाप के कोनों पर काम किया होता था।
c8.s7.4
(३) लंबरा४२—एक विशेष प्रकार की चादर (प्रच्छदपट विशेष:) ।
c8.s7.5
(४) कटवानक४३—गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इसकी व्याख्या है—कट-वानकं स एवं स्थूलसूत्रो भाव्यक तद्देशीयानां प्रसिद्ध इति स्वामी—कटवानक मोटे सूत से बनी एक चादर है जिसे देशी भाषा में भाव्यक कहते हैं, ऐसा स्वामी नाम के टीकाकार का कथन है'।
c8.s7.6
(५) प्रावरक४४—गणपति शास्त्री की टीका में इस शब्द की व्याख्या है—पूर्वोक्त एवान्यतरतो दशो रोमातंकइति तद्देश प्रसिद्ध इति स्वामी, 'पूर्वोक्त तरह की शायद किनारे वाली चादर, 'स्वामी का कथन है कि देशी में इसे रोमावर्तक कहते थे।'
c8.s7.7
(६) सत्तलिका४५—शामा शास्त्री इसका अर्थ कालीन करते हैं। गणपति शास्त्री के अनुसार इसका अर्थ—तूलिकाख्य आस्तरण विशेषश्च—अर्थात् रूईदार गद्दा है।