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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s8: दुकूल, क्षौम, पत्रोर्ण, कौशेय तथा सूती कपड़े

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s8

Language
Hindi

दुकूल, क्षौम, पत्रोर्ण, कौशेय तथा सूती कपड़े

c8.s8.1

दुकूल वस्त्र—दुकूल एकजगह वंग देश में पैदा हुई रुई के लिए व्यवहार में आया है४६ गो कि और जगह इसका अर्थ दुकूल वृक्ष की छालों के रेशे से बना वस्त्र है। अर्थशास्त्र से हमें दुकूल के बारे में निम्नलिखित बातों का पता चलता है४७ ।

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४१-४५ —ग० शा०, १, पृ० १६४

c8.s8.3

४६ —आचारांग सूत्र, १, ७, ५, १—टीकाकार कहता है गौडविषय विशिष्टकार्पासिक

c8.s8.4

४७ —ग० शा०, १, पृ० १६४ ४८—आधुनिक महास्थान से प्राचीन पौण्ड्रवर्धन की समानता मानी जाती है एपि० इंडि० २१, पृ० ८८ ४६—सुवर्णकुड्या की पहचान सिल्वां लेव' चीनी किन-लिन से करते हैं जो कंबुज में दो हजार ली दूरी पर एक खाड़ी पर स्थित था । इस तरह यह देश मलयद्व.प पुंज में पड़ता है, एतूद आशियातीक, भा० २, पृ० ३६ । ५०-५२—अ० शा०, १, पृ० १६५

c8.s8.5

दुकूल से कपड़ा बंगाल में बनता था (वाङ्गक॑) । यह वस्त्र सफेद और मुलायम होता था । पौण्ड्रदेश४८ में बने दुकूल वस्त्र नीले और चिकने होते थे और सुवर्णकुड्य। ४९ में बने दुकूल ललाई लिए होते थे । निम्नलिखित तरीकों से दुकूल बिना जाता था—

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१. मणिस्रिग्धोदकवान—पहले सूत में (साधनद्रव्यं) नमी देकर फिर उसपर घोंटे (?) से पालिश करते थे और इसके बाद बुनते थे ।

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२. चतुरस्रकवान—इसकी बुनावट बराबर होती और कपड़ा बिना किसी रंग के होता था ।

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३. व्यामिश्रवान—सूत और रेशम मिलाकर बुना दुकूल । इस शब्द की दूसरी व्याख्या के अनुसार यह कपड़ा रंग बिरंगे सूत से बुना जाता था (वर्णान्तरासंसृष्ट) ।

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बुनावट के अनुसार कपड़ों के निम्नलिखित भेद होते थे—

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(१) एकांशुक—गणपति शास्त्री के अनुसार इसके ताने बाने में एक तार लगता था ।

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(२) अध्यर्धाशुक—इसमें ताना एक तार का होता था और बाना दो तारों का । बिनावट उलटी भी जा सकती थी ।

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(३) द्वयंशुक—इसमें ताना बाना दो तार के होते थे (द्विगुणतन्यते द्विगुणमूयते) ।

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(४) त्र्यंशुक—ताने बाने में तीन तार लगते थे ।

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क्षोम५०—काशी और पुंडू क्षोम के लिए प्रसिद्ध थे। गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार दुकूल की तरह क्षौम की किस्में होती थीं पर टीकाकार की यह बात ठीक नहीं है कि क्षौम दुकूल का ही एक बहुत घटिया रूप था ।

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पत्रोर्ण५१—पत्रोर्ण से बने वस्त्रों के नाम भिन्न भिन्न देशों के नाम पर जहां वे बनते थे अवलंबित हैं। मगध में बना कपड़ा मागधिका पुंडु में बना पौंड्रर्क और सुवर्णकुड्या में बना सौवर्णकुड्यका कहलाता था । पत्रोर्ण नाग, लिकुच, बकुल और वट वृक्षों की छालों से निकले रेशे से बनता था । नाग वृक्ष से बने पत्रोर्ण का कपड़ा पीला होता था, लकुच का गेहुएं रंग का, बकुल का सफेद रंग का तथा दूसरे वृक्षों के रेशों से बना कपड़ा मक्खन के रंग का होता था। इन सब में सुवर्णकुड्या में बना पत्रोर्ण सब से अधिक अच्छा होता था ।

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रेशमी कपड़े५२—अर्थशास्त्र में दो तरह के रेशमी कपड़ों का वर्णन है यथा—

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१—कौशेय—टीका के अनुसार कोशकार देश में पैदा हुए रेशम से बना वस्त्र।

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२—चीनपट्ट—चीन देश में बना रेशमी कपड़ा। टीका के अनुसार रेशमी कपड़ों के रंग पत्रोर्ण से बने कपड़ों के रंग जैसे होते थे।

c8.s8.19

सूती वस्त्र५३—अर्थशास्त्र में निम्नलिखित प्रकार के सूती वस्त्रों का उल्लेख है। इन सूती कपड़ों के नाम भिन्न भिन्न देशों के नाम पर जहां वे बुने जाते थे पड़े।

c8.s8.20

५३ —वही

c8.s8.21

(१) माधुर—टीका का कहना है कि यह कपड़ा पांड्यों की राजधानी मधुरा (आधुनिक मदुरा) में बनता था।

c8.s8.22

(२) आपरांतक—आधुनिक कोंकण का बना कपड़ा।

c8.s8.23

(३) कलिंगक—कलिंग देश में बना कपड़ा। तामिल साहित्य से भी पता चलता है कि कलिंग के नाग बुनकर बहुत अच्छा कपड़ा बनाते थे ।

c8.s8.24

(४) काशिक—काशि जनपद में बना सूती कपड़ा। जातकों और बौद्ध साहित्य में काशिकवस्त्र के बहुत से उल्लेख आये हैं लेकिन प्रायः सब अनुवादकों ने इसे रेशमी वस्त्र माना है । अर्थशास्त्र से यह बात निश्चित हो जाती है कि काशी अपने क्षोम और सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थी न कि रेशमी वस्त्रों के लिए ।

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(५) वांगक—पूर्वी बंगाल में बना सूती कपड़ा। अर्थशास्त्र से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पूर्वी बंगाल में दुकूल और कपास दोनों से कपड़े बनते थे ।

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(६) वात्सक—वत्सदेश (इलाहाबाद के आसपास) का बना सूती कपड़ा।

c8.s8.27

(७) माहिषक५४—महिषदेश का बना सूती कपड़ा। टीकाकार के अनुसार माहिषक कुंतल देश की राजधानी थी ।

c8.s8.28

५४ —वही, नर्मदा के किनारे महेसर से माहिषक की पहचान की जाती है।

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