Vada in Theory and Practice: Studies in Debates, Dialogues and Discussions in Indian Intellectual Discourses c11.s18.104
Vāda in Theory and Practice: Studies in Debates, Dialogues and Discussions in Indian Intellectual Discourses c11.s18.104
- Language
- English
c11.s18.104
⁸⁶ मेरा इस ग्रन्थ को बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य — सत्य अर्थ का प्रकाश करना है, अर्थात् जो सत्य है, उसको सत्य और जो मिथ्या है, उसको मिथ्या ही प्रतिपादित करना है। वह सत्य नहीं कहाता, जो सत्य के स्थान में असत्य और असत्य के स्थान में सत्य का प्रकाश किया जाए। किन्तु जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा ही कहकर लिखना और मानना सत्य कहाता है। जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत वाले सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है, इसलिए वह सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता। इसीलिए विद्वान् आप्तों का यही मुख्य काम है कि उपदेश व लेख द्वारा सब मनुष्यों के सामने सत्यासत्य का स्वरूप समर्पित कर दें, पश्चात् वे अपना हिताहित समझकर सत्यार्थ का ग्रहण और मिथ्यार्थ का परित्याग कर के सदा आनंद में रहें। — *Satyārthaprakāśa*, Preface, p. 2, vs 2050, Sarvadeshik Arya Pratinidhi Sabha, New Delhi