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Viyahapannatti 9.31: Uddeśaka 31: aśoccā

Viyāhapannatti: Hindi translation (Dīparatnasāgara, 2019) 9.31

Language
Hindi

Uddeśaka 31: aśoccā

9.31.445

राजगृह नगर में यावत् (गौतमस्वामी ने) इस प्रकार पूछा – भगवन् ! केवली, केवली के श्रावक, केवली की श्राविका, केवली के उपासक, केवली की उपासिका, केवलिपाक्षिक, केवलि – पाक्षिक के श्रावक, केवलि – पाक्षिक की श्राविका, केवलि – पाक्षिक के उपासक, केवलि – पाक्षिक की उपासिका, (इनमें से किसी) से बिना सुने ही किसी जीव को केवलिप्ररूपित धर्मश्रवण का लाभ होता हे ? गौतम ! किसी जीव को केलिप्ररूपत धर्म श्रवण का लाभ होता हे और किसी जीव को नहीं भी होता। भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहा है ? गौतम ! जिस जीव ने ज्ञानावरणीयकर्म का क्षयोपशम किया हुआ है, उसको केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका में से किसी से सुने बिना ही केवलि – प्ररूपित धर्मश्रवण का लाभ होता है और जिस जीव ने ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम नहीं किया हुआ है, उसे केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से सुने बिना केवलि – प्ररूपित धर्म – श्रवण का लाभ नहीं होता। हे गौतम ! इसी कारण ऐसा कहा गया कि यावत् किसी को धर्म – श्रवण का लाभ होता है और किसी को नहीं होता।
भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से सुने बिना ही क्या कोई जीव शुद्धबोधि प्राप्त कर लेता है ? गौतम ! कई जीव शुद्धबोधि प्राप्त कर लेते हैं और कई जीव प्राप्त नहीं कर पाते हैं। भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहा है ? हे गौतम ! जिस जीव ने दर्शनावरणीय कर्म का क्षयोपसम किया है, वह जीव केवली यावत् केवलि – पाक्षिक उपासिका से सुने विना ही शुद्धबोधि प्राप्त कर लेता है, किन्तु जिस जीव ने दर्शनावरणीय कर्मों का क्षयोपशम नहीं किया है, उस जीव को केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से सुने बिना शुद्धबोधि का लाभ नहीं होता। इसी कारण हे गौतम ! ऐसा कहा है।
भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक – उपासिका से सुने बिना ही क्या कोई जीव केवल मुण्डित होकर अगारवास त्याग कर अनगारधर्म में प्रव्रजित हो सकता है ? गौतम ! कोई जीव मुण्डित होकर अगारवास छोड़कर शुद्ध या सम्पूर्ण अनगारिता में प्रव्रजित हो पाता है और कोई प्रव्रजित नहीं हो पाता है। भगवन् ! किस कारण से यावत् कोई जीव प्रव्रजित नहीं हो पाता ? गौतम ! जिस जीव के धर्मान्तरायिक कर्मों का क्षयोपशम किया हुआ है, वह जीव केवली आदि से सुने बिना ही मुण्डित होकर अगारवास से अनागारधर्म में प्रव्राजित हो जाता है, किन्तु जिस जीव के धर्मान्तरायिक कर्मों का क्षयोपशम नहीं हुआ है, वह मुण्डित होकर अगारवास से अनगारधर्म में प्रव्रजित नहीं हो पाता। इसी कारण से हे गौतम ! यह कहा है।
भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिकासे सुने विना ही क्या कोई जीव शुद्ध ब्रह्मचर्यवास धारण कर पाता है ? गौतम ! कोई जीव शुद्ध ब्रह्मचर्यवास को धारण लेता है और कोई नहीं कर पाता। भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि यावत् कोई जीव धारण नहीं कर पाता ? गौतम ! जिस जीव ने चारित्रावरणीयकर्म का क्षयोपशम किया है, वह केवली आदि से सुने बिना ही शुद्ध ब्रह्मचर्यवास को धारण कर लेता है किन्तु जिस जीव ने चारित्रावरणीयकर्म का क्षयोपशम नहीं किया है, वह जीव यावत् शुद्ध ब्रह्मचर्यवास को धारण नहीं कर पाता। इस कारण से ऐसा कहा है।
भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से सुने बिना ही क्या कोइ जीव शुद्ध संयम द्वारा संयम – करता है ? हे गौतम ! कोई जीव करता है और कोई जीव नहीं करता है। भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि यावत् कोई जीव शुद्ध संयम द्वारा संयम – करता है और कोई जीव नहीं करता है ? गौतम ! जिस जीव ने यतनावरणीयकर्म का क्षयोपशम किया हुआ है, वह केवली यावत् केवलि – पाक्षिक – उपासिका से सुने बिना ही शुद्ध संयम द्वारा संयम – यतना करता है, किन्तु जिसने यतनावरणीयकर्म का क्षयोपशम नहीं किया है, वह केवली आदि से सुने बिना यावत् शुद्ध संयम द्वारा संयम – यतना नहीं करता।
भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से धर्म – श्रवण किये बिना ही क्या कोई जीव शुद्ध संवर द्वारा संवृत होता है ? गौतम कोई जीव शुद्ध संवर से संवृत होता है और कोई जीव शुद्ध संवर से संवृत नहीं होता है। भगवन् ! किस कारण से यावत् नहीं होता ? गौतम ! जिस जीव ने अध्यवसानावरणीय कर्मों का क्षयोपशम किया है, वह केवली आदि से सुने बिना ही, याव्त शुद्ध संवर से संवृत हो जाता है, किन्तु जिसने अध्यवसानावरणीय कर्मों का क्षयोपशम नहीं किया है, वह जीव केवली आदि से सुने बिना यावत् शुद्ध संवर से संवृत नहीं होता। इसी कारण से हे गौतम ! ऐसा कहा जाता है।
भगवन् ! केवली आदि से सुने बिना ही क्या कोई जीव शुद्ध आभिनिबोधिकज्ञान उपार्जन कर लेता है ? गौतम कोई जीव प्राप्त करता है और कोई नहीं प्राप्त करता। भगवन् ! किस कारण से यावत् नहीं प्राप्त करता ? गौतम ! जिस जीव ने आभिनिबोधिक – ज्ञानावरणीय कर्मों का क्षयोपशम किया है, वह केवली आदि से सुने बिना ही शुद्ध आभिनिबोधिकज्ञान उपार्जन कर लेता है, किन्तु जिसने आभिनिबोधिक – ज्ञानावरणीय कर्मों का क्षयोपसम नहीं किया है, वह केवली आदि से सुने विना शुद्ध आभिनिबोधिकज्ञान का उपार्जन नहीं कर पाता। भगवन् ! केवली आदि से सुने बिना ही क्या कोई जीव श्रुतज्ञान उपार्जन कर लेता है ? (गौतम !) आभिनिबोधिकज्ञान के समान शुद्ध श्रुतज्ञान में भी कहना। विशेष इतना कि यहाँ श्रुतज्ञानवरणीयकर्मों का क्षयोपशम कहना। इसी प्रकार शुद्ध अवधि ज्ञान उपार्जनके विषयमें कहना। विशेष यह कि यहाँ अवधिज्ञानावरणीयकर्म का क्षयोपशम कहना। इसी प्रकार शुद्ध मनःपर्ययज्ञान के उत्पन्न होने के विषय में कहना। विशेष इतना कि मनःपर्ययज्ञानावरणकर्म के क्षयोपशम का कथन करना। भगवन् ! केवली यावत् केवलिपाक्षिक की उपासिका से सुने बिना ही क्या कोई जीव केवलज्ञान उपार्जन कर लेता है ? पूर्ववत् यहाँ भी कहना। विशेष इतना कि यहाँ केवलज्ञानावरणीय कर्मों का क्षय कहना। शेष पूर्ववत्।
भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक – उपासिका के पास से धर्मश्रवण किये बिना ही क्या कोई जीव केवलि – प्ररूपित धर्म – श्रवण – लाभ करता है ? शुद्ध बोधि प्राप्त करता है ? मुण्डित होकर अगारवास से शुद्ध अनगारिता को स्वीकार करता है ? शुद्ध ब्रह्मचार्यवास धारण करता है ? शुद्ध संयम द्वारा संयम – यतना करता है ? शुद्ध ब्रह्मचार्यवास धारण करता है ? शुद्ध संयम द्वार संयम – यतना करता है ? शुद्ध संवर से संवृत होता है ? शुद्ध आभिनिबोधिकज्ञान उत्पन्न करता है, यावत् शुद्ध मनःपर्यवज्ञान तथा केवलज्ञान उत्पन्न करता हे ? गौतम ! कोई जीव केवलि – प्ररूपित धर्म – श्रवण का लाभ पाता है, कोई जीव नहीं पाता है। कोई जीव शुद्ध बोधिलाभ प्राप्त करता है, कोई नहीं प्राप्त करता है। कोई जीव मुण्डित हो कर अगारवास से शुद्ध अनगारधर्म में प्रव्रजित होता है और कोई प्रव्रजित नहीं होता है। कोई जीव शुद्ध ब्रह्मचर्यवास को धारण करता है और कोई धारण नहीं करता है। कोई जीव शुद्ध संयम से संयम – यतना करता है और कोई नहीं करता है। कोई जीव शुद्ध संवर से संवृत होता है और कोई जीव संवृत नहीं होता है। इसी प्रकार कोई जीव आभिनिबोधिकज्ञान का उपार्जन करता है ओर कोई उपार्जन नहीं करता है। कोई जीव यावत् मनः पर्यवज्ञान का उपार्जन करता है और कोई नहीं करता है। कोई जीव केवलज्ञान का उपार्जन करता है और कोई नहीं करता है। भगवन् ! इस कथन का क्या कारण है कि कोई जीव केवलिप्ररूपित धर्मश्रवण – लाभ करता है, यावत् केवलज्ञान का नहीं करता है ? गौतम ! जिस जीव ने – ज्ञानावरणीयकर्म का क्षयोपशम नहीं किया, दर्शनावरणीय कर्म का क्षयोपशम नहीं किया, धर्मान्तरायिककर्मका, चारित्रावरणीयकर्मका, यतनावरणीयकर्मका, अध्यवसानावरणीयकर्मका, आभिनिबोधिकज्ञानावरणीयकर्मका, श्रुतज्ञानावरणीय, अवधि – ज्ञानावरणीय और मनःपर्यवज्ञानावरणीयकर्मका क्षयोपसम नहीं किया तथा केवल ज्ञानावरणीयकर्म का क्षय नहीं किया, वे जीव केवली आदि से धर्मश्रवण किये विना धर्म – श्रवणलाभ नहीं पाते, शुद्धबोधिकलाभ का अनुभव नहीं करते, यावत् केवलज्ञान को उत्पन्न नहीं कर पाते। किन्तु जिस जीव ने ज्ञानावरणीयकर्मों का, दर्शनावरणीयकर्मों का, धर्मान्तरायिककर्मों का यावत् केवलज्ञानावरणीयकर्मों का क्षय किया है, वह केवली आदि से धर्मश्रवण किये विना ही केवलिप्ररूपति धर्म – श्रवण लाभ प्राप्त करता है, शुद्ध बोधिलाभ का अनुभव करता है, यावत् केवलज्ञान को उपार्जित कर लेता है।

9.31.446

निरन्तर छठ – छठ का तपःकर्म करते हुए सूर्य के सम्मुख बाहें ऊंची करके आतापनाभूमि में आतापना लेते हुए उस जीव की प्रकृति – भद्रता से, प्रकृति की उपशान्तता से स्वाभाविक रूप से ही क्रोध, मान, माया और लाभ की अत्यन्त मन्दता होने से, अत्यन्त मृदुत्वसम्पन्नता से, कामभोगों में अनासक्ति से, भद्रता और विनीतता से तथा किसी समय शुभ अध्यवसाय, शुभ परिणाम, विशुद्ध लेश्या एवं तदावरणीय कर्मों के क्षयोपशम से ईहा, अपोह, मार्गणा और गवेषणा करते हुए ‘विभंग’ नामक अज्ञान उत्पन्न होता है। फिर वह उस उत्पन्न हुए विभंगज्ञान द्वारा जघन्य अंगुल के असख्यातवें भाग और उत्कृष्ट असंख्यात हजार योजन तक जानता और देखता है, वह जीवों को भी जानता है और अजीवों को भी जानता है। वह पाषण्डस्थ, सारम्भी, सपरिग्रह और संक्लेश पाते हुए जीवों को भी जानता है और विशुद्ध होते हुए जीवों को भी जानता है। (तत्पश्चात्) वह सर्वप्रथम सम्यक्त्व प्राप्त करता है, फिर श्रमणधर्म पर रुचि करता है, फिर चारित्र अंगीकार करता है। फिर लिंग स्वीकार करता है। तब उस के मिथ्यात्व के पर्याय क्रमशः क्षीण होते – होते और सम्यग्दर्शन के पर्याय क्रमशः बढ़ते – बढ़ते वह ‘विभंग’ नामक अज्ञान, सम्यक्त्व – युक्त होता है और शीघ्र ही अवधि (ज्ञान) के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

9.31.447

भगवन् ! वह अवधिज्ञानी कितनी लेश्याओं में होता है ? गौतम ! वह तीन विशुद्धलेश्याओं में होता है, यथा – तेजोलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या। भगवन् ! वह अवधिज्ञानी कितने ज्ञानों में होता है ? गौतम ! वह आभिनिबोधिकज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान, इन तीन ज्ञानों में होता है।
भगवन् ! वह सयोगी होता है, या अयोगी ? गौतम ! वह सयोगी होता है, अयोगी नहीं होता। भगवन् ! यदि वह सयोगी होता है, तो क्या मनोयोगी होता है, वचनयोगी होता है या काययोगी होता है ? गौतम ! तीनो होते है।
भगवन् ! वह साकारोपयोग – युक्त होता है, अथवा अनाकारपयोग – युक्त होता है ? गौतम ! वह साकारोपयोग – युक्त भी होता हे और अनाकारोपयोग – युक्त भी होता है।
भगवन् ! वह किस संहनन में होता है ? गौतम ! वह वज्रऋषभनाराचसंहनन वाला होता है। भगवन् ! वह किस संस्थान में होता है ? गौतम ! वह छह संस्थानों मे से किसी भी संस्थान में होता है।
भगवन् ! वह कितनी ऊंचाई वाला होता है ? गौतम ! वह जघन्य सात हाथ और उत्कृष्ट पाँच सौ धनुष ऊंचाई वाला होता है। भगवन् ! कितनी आयुष्य वाला होता है ? गौतम ! वह जघन्य साधिक आठ वर्ष और उत्कृष्ट पूर्वकोटि आयुष्यवाला होता है। भगवन् ! वह सवेदी होता है या अवेदी ? गौतम ! वह सवेदी होता है, अवेदी नहीं। भगवन् ! यदि वह सवेदी होता है तो क्या स्त्रीवेदी होता है, पुरुषवेदी होता है, नपुंसकवेदी होता है, या पुरुष – नपुंसक वेदी होता है? गौतम! वह स्त्रीवेदी नहीं होता, पुरुषवेदी होता है, नपुंसकवेदी नहीं होता, किन्तु पुरुष – नपुंसकवेदी होता है।
भगवन् ! क्या वह सकषायी होता है, या अकषायी ? गौतम ! वह सकषायी होता है, अकषायी नहीं। भगवन्! यदि वह सकषायी है, तो वह कितने कषायोंवाला है ? गौतम ! वह संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभः, से युक्त होता है। भगवन् ! उसके कितने अध्यवसाय कहे हैं गौतम ! उसके असंख्यात अध्यवसाय कहे हैं। भगवन् ! उसके वे अध्यवसाय प्रशस्त होते हैं या अप्रशस्त होते हैं ? गौतम ! वे प्रशस्त होते हैं, अप्रशस्त नहीं होते हैं।
वह अवधिज्ञानी बढ़ते हुए प्रशस्त अध्यवसायों से अनन्त नैरयिकभव – ग्रहणों से, अनन्त तिर्यञ्चयोनिक भवों से, अनन्त मनुष्यभव – ग्रहणों से और अनन्त देवभवों से अपनी आत्मा को वियुक्त कर लेता है। जो ये नरकगति, तिर्यञ्चगति, मनुष्यगति और देवगति नामक चार उत्तर प्रकृतियाँ हैं, उन प्रकृतियों के आधारभूत अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ को क्षय करके अप्रत्याख्यान – क्रोध – मान – माया – लोभ का क्षय करता है, फिर प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ का क्षय करता है; फिर संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ का क्षय करता है। फिर पंचविध ज्ञानावरणीयकर्म, नवविध दर्शनावरणीयकर्म, पंचविध अन्तरायकर्म को तथा मोहनीयकर्म को कटे हुए ताड़वृक्ष के समान बना कर, कर्मरज को बिखेरने वाले अपूर्वकरण में प्रविष्ट उस जीव के अनन्त, अनुत्तर, व्याघातरहित, आवरणरहित, सम्पूर्ण, प्रतिपूर्ण एवं श्रेष्ठ केवलज्ञान और केवलदर्शन उत्पन्न होता है।

9.31.448

भगवन् ! वे असोच्चा केवली केवलिप्ररूपित धर्म कहते हैं, बतलाते हैं अथवा प्ररूपणा करते हैं ? गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है। वे एक उदाहरण के अथवा एक प्रश्न के उत्तर के सिवाय अन्य उपदेश नहीं करते। भगवन् ! वे (किसी को) प्रव्रजित या मुण्डित करते हैं ? गौतम ! वह अर्थ समर्थ नहीं। किन्तु उपदेश करते हैं। भगवन् ! वे सिद्ध होते हैं, यावत् समस्त दुःखों का अन्त करते हैं ? हाँ, गौतम ! करते हैं।

9.31.449

भगवन् ! वे असोच्चा कवली ऊर्ध्वलोक में होते है, अधोलोक में होते हैं या तिर्यक्लोक में होते हैं ? गौतम ! वे तीनो लोक में भी होते हैं। यदि ऊर्ध्वलोक में होते हैं तो शब्दापाती, विकटापाती, गन्धापाती और माल्यवन्त नामक वृत (वैताढ्य) पर्वतों में होते हैं तथा संहरण की अपेक्षा सौमनसवन में अथवा पाण्डुकवन में होते हैं। यदि अधोलोक में होते हैं तो गर्त्ता में अथवा गुफ़ा में होते है तथा संहरण की अपेक्षा पातालकलशों में अथवा भवनवासी देवों के भवनों में होते हैं। यदि तिर्यग्लोक में होते हैं तो पन्द्रह कर्मभूमि में होते हैं तथा संहरण की अपेक्षा अढाई द्वीप और समुद्रों के एक भाग में होते हैं।
भगवन् ! वे असोच्चा केवली एक समय में कितने होते हैं ? गौतम ! वे जघन्य एक, दो अथवा तीन और उत्कृष्ट दस होते हैं। इसलिए हे गौतम ! मैं एसा कहता हुँ कि केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से धर्मश्रवण किये बिना ही किसी जीव को केवलिप्ररूपित धर्म – श्रवण प्राप्त होता है और किसी को नहीं होता; यावत् कोई जीव केवलज्ञान उत्पन्न कर लेता है और कोई जीव केवलज्ञान उत्पन्न नहीं कर पाता।

9.31.450

भगवन् ! केवली यावत् केवलि – पाक्षिक की उपासिका से श्रवण कर क्या कोई जीव केवलिप्ररूपित धर्म – बोध प्राप्त करता है ? गौतम ! कोई जीव प्राप्त करता है और कोई जीव प्राप्त नहीं करता। इस विषय में असोच्चा के समान ‘सोच्चा’ की वक्तव्यता कहना। विशेष यह कि सर्वत्र ‘सोच्चा’ ऐसा पाठ कहना। शेष पूर्ववत् यावत् जिसने मनःपर्यवज्ञानावरणीय कर्मों का क्षयोपशम किया है तथा जिसने केवलज्ञानावरणीय कर्मों का क्षय किया है, वह यावत् धर्मवचन सुनकर केवलिप्ररूपित धर्म – बोध प्राप्त करता है, शुद्ध बोधि का अनुभव करता है, यावत् केवलज्ञान प्राप्त करता है।
निरन्तर तेले – तेले तपःकर्म से अपनी आत्मा को भावित करते हुए प्रकृतिभद्रता आदि गुणों से यावत् ईहा, अपोह, मार्गण एवं ग्वेषण करते हुए अवधिज्ञान समुत्पन्न होता है। वह उस उत्पन्न अवधिज्ञान के प्रभाव से जघन्य अंगुल के असंख्याततवें भाग और उत्कृष्ट अलोक में भी लोकप्रमाण असंख्य खण्डों को जानता और देखता है।
भगवन् ! वह (अवधिज्ञानी जीव)कितनी लेश्याओं में होता है ? गौतम ! वह छहों लेश्याओं में होता हे यथा – कृष्णलेश्या यावत् शुक्ललेश्या। भंते ! वह कितने ज्ञानों भें होता है गौतम ! तीन या चार ज्ञानों में। यदि तीन ज्ञानों में होता है, तो आभिनिबोधिकज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान में होता हे। यद चार ज्ञान में होता है तो आभिनिबीधकज्ञान, यावत् मनःपर्यवज्ञान में होता है। भगवन् ! वह सयोगी होता है अथवा अयोगी ? गौतम जैसे ‘असोच्चा’ के योग, उपयोग, संहनन, संस्थान, ऊंचाइ और आयुष्य के विषय में कहा, उसी प्रकार यहाँ भी योगादि के विषय में कहना।
भगवन् ! वह अवधिज्ञानी सवेदी होता है अथवा अवेदी ? गौतम ! वह सवेदी भी होता है अवेदी भी होता है। भगवन् ! यदि वह अवेदी होता है तो क्या उपशान्तवेदी होता है अथवा क्षीणवेदी होता है ? गौतम ! वह उपशान्तवेदी नहीं होता, क्षीणवेदी होता है। भगवन् ! यदि वह सवेदी होता है तो क्या स्त्रीवेदी होता है इत्यादि पृच्छा गौतम ! वह स्त्रीवेदी भी होता है, पुरुषवेदी भी होता है अथवा पुरुष – नपुंसकवेदी होता है।
भगवन् ! वह अवधिज्ञानी सकषायी होता है अथवा अकषायी ? गौतम ! वह सकषायी भी होता है , अकषायी भी होता है। भगवन् ! यदि वह अकषायी होता है तो क्या उपशान्तकषायी होता है या क्षीणकषायी ? गौतम ! वह उपशान्तकषायी होता हे या क्षीणकषायी ? गौतम ! वह उपशान्तकषायी नहीं होता, किन्तु क्षीणकषायी होता है। भगवन् ! यदि वह सकषायी होता है। यदि वह चार कषायों में होता है, तो संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ में होता है। यदि तीन कषायों में होता है तो संज्वलन मान, माया और लोभ में, यदि दो कषायों में होता है तो संज्वलन माया और लोभ में और यदि एक कषाय में होता है तो एक संज्वलन लोभ में होता है।
भंते ! उस अवधिज्ञानी के कितने अध्यवसाय बताए गए हैं ? गौतम ! उसके असंख्यात अध्यवसाय होते हैं। असोच्चा कवली कि तरह ‘सोच्चा कवली’ के लिए उसे केवलज्ञान – केवलदर्शन उत्पन्न होता है, तक कहना चाहिए। भंते ! वह ‘सोच्चा केवली’ केवलि – प्ररूपित धर्म कहते है, बतलाते है या प्ररूपित करते हैं ? हाँ, गौतम ! करते हैं।
भगवन् ! वे सोच्चा केवली किसी को प्रव्रजित करते हैं या मुण्डित करते हैं ? हाँ, गौतम ! करते हैं। भगवन् ! उन सोच्चा केवली के शिष्य किसी को प्रव्रजित करते हैं या मुण्डित करते हैं ? हाँ गौतम ! उनके शिष्य भी करते हैं। भगवन् ! क्या उन सोच्चा केवली के प्रशिष्य भी किसी को प्रव्रजित और मुण्डित करते हैं ? हाँ गौतम ! वे भी करते हैं।
भगवन् ! वे सोच्चा केवली सिद्ध होते है, बुद्ध होते हैं, यावत् सर्वदुःखों का अन्त करते हैं ? हाँ गौतम ! वे सिद्ध होते हैं, यावत् सर्वदुःखों का अन्त करते हैं। भंते ! क्या उन सोच्चा केवली के शिष्य भी, यावत् सर्वदुःखों का अन्त करते हैं ? हाँ, गौतम ! करते हैं। भगवन् ! क्या उनके प्रशिष्य भी, यावत् सर्वदुःखों का अन्त करते हैं ? हाँ, करते हैं।
भंते ! वे सोच्चा केवली ऊर्ध्वलोक में होते हैं, इत्यादि प्रश्न। हे गौतम ! असोच्चाकेवली के समान यहाँ भी अढाई द्वीप – समुद्र के एक भाग में होते हैं, तक कहना।
भगवन् ! वे सोच्चा कवली एक सयम में कितने होते हैं ? गौतम ! वे एक समय में जघन्य एक, दो या तीन और उत्कृष्ट एक सौ आठ होते हैं ? इसलिए हे गौतम ! ऐसा कहा गया है कि केवली – पाक्षिक की उपासिका से यावत् कोई जीव केवलज्ञान – केवलदर्शन प्राप्त करता है और कोई नहीं करता। हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है।

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