Pramāṇa · Search · About · API

Vastu-shastra (Vol. I: Hindu Science of Architecture; Vol. II: Hindu Canons of Iconography and Painting) v1.c67.3

Vāstu-śāstra (Vol. I: Hindu Science of Architecture; Vol. II: Hindu Canons of Iconography and Painting) v1.c67.3

Language
English

v1.c67.3

| लोक-व्यवहारः | देवादीनां नराणां च येषु रम्यतया चिरम्। |
| शिल्प० १६-१ | मनांसि च प्रसीदन्ति प्रासादास्तेन कीर्तिताः॥ |
| शास्त्रीयार्थश्च | प्रासादं यच्छिवशक्त्यात्मकं तच्छक्त्यन्तैः। |
| ईशा० ३.१२-१६ | स्याद्वसुधायैस्तु तत्त्वैः॥ |
| | शैवीः मूर्तिः खलु देवालयाख्ये— |
| | त्यस्माद् ध्येया प्रथमं चाभिपूज्या॥ |
| प्रासाद-प्रयोजनम् | कृत्वा प्रभूतं सलिलमारामान्विनिवेश्य च। |
| बृ० सं० | देवायतनं कुर्याद्यशोधर्माभिवृद्धये॥ |
| | इष्टापूर्तेन लभ्यन्ते ये लोकास्तान् बुभूषता। |
| | देवानामालयः कार्यो द्वयमप्यत्र दृश्यते॥ |

Cites (3)