भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c10.25
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c10.25
- Language
- Hindi
c10.25
बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में देहली और अलाहाबाद के स्तंभों तथा खंडगिरि के चट्टान पर खुदे हुए लेखों की छापें आ गई थीं परंतु विल्फर्ड का यत्न निष्फल होने से कितने एक वर्षों तक उन लेखों के पढ़ने का उद्योग न हुआ. उन लेखों का आशय जानने की जिज्ञासा रहने के कारण जेम्स प्रिन्सेप ने ई. स. १८३४-३५ में अलाहाबाद, राधिया और मथिया के स्तंभों पर के लेखों की छापें मंगवाईं और उनको देहली के लेख से मिला कर यह जानना चाहा कि उनमें कोई शब्द एकसा है वा नहीं. इस प्रकार उन चारों लेखों को पास पास रख कर मिलाने से तुरंत ही यह पाया गया कि वे चारों लेख एक ही हैं. इस बात से प्रिन्सेप का उत्साह बढ़ा और उसे अपनी जिज्ञासा पूर्ण होने की दृढ़ आशा बंधी. फिर अलाहाबाद के स्तंभ के लेख से भिन्न भिन्न आकृति के अक्षरों को अलग अलग छांटने पर यह विदित हो गया कि गुप्ताक्षरों के समान उनमें भी कितने एक अक्षरों के साथ स्वरों की मात्राओं के पृथक् पृथक् पांच चिह्न लगे हुए हैं, जो एकत्रित कर प्रकट किये गये३. इससे कितने एक विद्वानों को उक्त अक्षरों के यूनानी होने का जो भ्रम४ था वह दूर हो गया. स्वरों के चिह्नों को पहिचानने के बाद मि. प्रिन्सेप ने अक्षरों के पहिचानने का उद्योग करना शुरू किया और उक्त लेख के प्रत्येक अक्षर को गुप्तलिपि से मिलाना और जो मिलता गया उसको वर्णमाला में क्रमवार रखना प्रारंभ किया. इस प्रकार बहुत से अक्षर पहिचान में आ गये.