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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c10: ४-प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c10

Language
Hindi

४-प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना

c10.1

भारतवर्ष के विद्वान् ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पहिले ही अपने देश की प्राचीन लिपि ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई ई. स. की छठी शताब्दी तक की लिपियों का पढ़ना भूल गये थे, परंतु पिछली अर्थात् ७ वीं शताब्दी से इधर की लिपियां, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान, जिनको प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों के पढ़ने का अभ्यास था, यत्न करने से पढ़ सकते थे. ई. स. १३५६ में देहली के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने बड़े उत्साह के साथ टोपरा२ तथा मेरठ से अशोक के लेखों वाले दो विशाल स्तंभ उठवा कर असाधारण श्रम२ से देहली में लाकर एक (सवालक स्तंभ) को फ़ीरोज़शाह के कोटले में और दूसरे को 'कुश्क शिकार' (शिकार का महल) के पास३ खड़ा करवाया. उस ने उन स्तंभों पर के लेखों का आशय जानने के लिये बहुत से विद्वानों को एकत्र किया परंतु किसी से वे पढ़े न गये४. यह भी प्रसिद्धि है कि बादशाह अकबर को भी उक्त लेखों का आशय जानने की बहुत कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जिज्ञासा पूर्ण कर सकता.

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२ टोपरा का (सवालक) स्तंभ किस प्रकार महान परिश्रम तथा उत्साह के साथ देहली में लाया गया इसका वृत्तान्त समकालीन लेखक शम्स-इ-शीराज़ ने तारीख-इ-फ़ीरोज़शाही में किया है (इ; हि. इं; जि. ३, पृ. ३५०-५३).

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३ यह स्तंभ देहली में 'रिज' नामक पहाड़ी पर ग़दर की यादगार के स्थान के पास है.

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हिंदुस्तान में अंगरेज़ों का राज्य होने पर फिर विद्या के सूर्य का उदय हुआ और प्राचीन वस्तुओं का मान होने लगा. तारीख १५ जनवरी सन् १७८४ ई. को सर विलियम जोन्स की प्रेरणा से एशिया खंड के प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, इतिहास, भूगोल, भिन्न भिन्न शास्त्र, रीत रवाज़, शिल्प आदि विद्या से संबंध रखने वाले सभी विषयों का शोध करने के निमित्त 'एशियाटिक सोसा- इटी' नामक एक समाज भारतवर्ष की उस समय की राजधानी कलकत्ता नगर में स्थापन हुआ, और बहुत से यूरोपियन तथा देशी विद्वान् अपनी अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों में उक्त समाज का उद्देश्य सफल करने को प्रवृत्त हुए. कितने एक विद्वानों ने ऐतिहासिक विषयों के शोध में लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्के तथा ऐतिहासिक पुस्तकों का टटोलना प्रारंभ किया. इस प्रकार भारतवर्ष की प्राचीन लिपियों पर प्रथम ही प्रथम विद्वानों की दृष्टि पड़ी.

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१ पंजाब के ज़िले अंबाला में (सवालक में).

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४ क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३.

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ई. स. १७८५ में चार्ल्स विल्किन्स ने दीनाजपुर ज़िले के बदाल नामक स्थान के पास मिला हुआ एक स्तंभ पर का लेख१ पढ़ा, जो बंगाल के राजा नारायणपाल के समय का था२. उसी वर्ष में पंडित राधाकांतशर्मा ने टोपरावाले देहली के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए अजमेर के चौहान राजा आह्नल्लदेव (आना) के पुत्र वीसलदेव (विग्रहराज-चौथे) के तीन३ लेख पढ़े जिनमें से एक [विक्रम] 'सं. १२२० वैशाख शुति १५' का है. इन सब की लिपि बहुत पुरानी न होने से ये आसानी के साथ पढ़े गये, परंतु उसी वर्ष में जे. ऐच. हॅरिंग्टन् ने बुद्धगया के पास वाली 'नागार्जुनी' और 'बराबर' की गुफाओं में उपर्युक्त लेखों से अधिक पुराने, मौखरी वंश के राजा अनंतवर्मन् के तीन लेख पाये, जिनकी लिपि गुप्तों के समय के लेखों की लिपि से मिलती हुई होने के कारण उनका पढ़ना कठिन प्रतीत हुआ, परंतु चार्ल्स विल्किन्स ने ई. स. १७८५ से ८६ तक श्रम कर के उन तीनों लेखों४ को पढ़ लिया जिससे गुप्तलिपि५ की अनुमान आधी वर्णमाला का ज्ञान हो गया.

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ई. स. १८१८ से १८२३ तक कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूताना के इतिहास की खोज में लग कर राजपूताना तथा काठियावाड़ में कई प्राचीन लेखों का पता लगाया जिनमें से ई. स. की ७ वीं शताब्दी से लगा कर १५ वीं शताब्दी तक के कई लेख उक्त विद्वान् इतिहासलेखक के गुरु यति ज्ञानचंद्र ने पढ़े और जिनका अनुवाद या सारांश कर्नल टॉड के 'राजस्थान' नामक पुस्तक में कई जगह छुपा है.

c10.9

५ गुप्तवंशी राजाओं के समय की प्राचीन लिपि को गुप्तलिपि कहते हैं.

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बी. जी. बॅबिंग्टन् ने मामल्लपुर के कितने एक संस्कृत और तमिळ भाषा के प्राचीन लेखों को पढ़ कर ई. स. १८२८ में उनकी वर्णमालाएं तय्यार कीं६. इसी तरह वॉल्टर इलियट ने प्राचीन कनड़ी अक्षरों को पहिचाना और ई. स. १८३३ में उनकी वर्णमालाओं को विस्तृत रूप से प्रकट किया७.

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२ ई. सं. १७८६ में चार्ल्स विल्किन्स ने मुंगेर से मिला हुआ बंगाल के राजा देवपाल का एक दानपत्र पढ़ा था, परंतु वह भी ई. स. १७८८ में छपा (ए. रि; जि. १, पृ. १२३). यह ताम्रपत्र दूसरी बार शुद्धता के साथ छप चुका है (इं. पँ; जि. २१, पृ. २५४-५७).

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६ ट्रॅन्ज़ॅक्शन्स ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (जि. २, पृ. २६४-६६; प्लेट १३, १४, १७ और १८).

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ई. स. १८३४ में कप्तान ट्रायर ने इसी उद्योग में लग कर इलाहाबाद (प्रयाग) के अशोक के लेख वाले स्तंभ पर खुदे हुए गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के लेख का कुछ अंश८ पढ़ा और उसी वर्ष में डॉ. मिल् ने उसे पूरा पढ़९ कर ई. स. १८३७ में भिटारी के स्तंभ पर का स्कंदगुप्त का लेख१० भी पढ़ लिया.

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१ ए. रि; जि. १, पृ. १३१. यह लेख फिर भी छप चुका है (ए. इं; जि. २, पृ. १६१-६४).

c10.15

३ ए. रि; जि. १, पृ. ३७६-८२. को; भि. ए; जि. २, पृ. २३२-३७. इं. पँ; जि. १६, पृ. २१८.

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४ बराबर का लेख—ए. रि; जि. २, पृ. १६७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. ६७४; प्लेट ३६, सं १४, १६, १७. इं. पँ; जि. १३, पृ ४२८. फ्ली; गु. इं; पृ. २२२-२३. नागार्जुनी गुफा के २ लेख—ए. रि; जि. २, पृ. १६८. ज. ए. सो. बंगा; जि. १६, पृ. ४०१; प्लेट १०. फ्ली; गु. इं; पृ. २२४-२७.

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७ ब. ज्ञा. स. वे. इं; जि. ३, पृ. ७३.

c10.18

८ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ११८.

c10.19

९ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३३६. फ्ली; गु. इं; पृ. ६-१०.

c10.20

१० ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. १. फ्ली; गु. इं; पृ. ५३-५४.

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ई. स. १८३५ में डब्ल्यू. ऍच. वॉथन ने वल्लभी के कितने एक दानपत्र पढ़े१.

c10.22

ई. स. १८३७-३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने देहली, कहाऊं और एरण के स्तंभों तथा सांची और अमरावती के स्तूपों और गिरनार के चट्टान पर के गुप्तलिपि के लेख पढ़े२. कप्तान ट्रायर, डॉ. मिल्ल तथा जेम्स प्रिन्सेप के श्रम से चार्ल्स विल्किन्सन् की गुप्तलिपि की अधूरी वर्णमाला पूर्ण हो गई और गुप्तवंशी राजाओं के समय के शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्कों के पढ़ने में सुगमता हो गई.

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२ ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. २१८, ४५५; जि. ७, पृ. ३६, ३३७, ६२६, ६३३.

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ब्राह्मी लिपि गुप्तलिपि से पुरानी होने के कारण उसका पढ़ना बड़ा दुस्तर था. ई. स. १७६५ में सर चार्ल्स मैलेट ने इलोरा की गुफाओं के कितने एक छोटे छोटे लेखों की छापें तय्यार कर सर विलियम्स जोन्स के पास भेजीं. फिर ये छापें विल्फर्ड के पास पढ़ने को भेजी गईं परंतु जब वे पढ़ी न गईं तो एक पंडित ने कितनी एक प्राचीन लिपियों की वर्णमालाओं का पुस्तक विल्फर्ड को बतला कर उन लेखों को अपनी इच्छा के अनुसार कुछ का कुछ पढ़ा दिया. विल्फर्ड ने इस तरह पढ़े हुए वे लेख अंग्रेज़ी अनुवाद सहित सर विलियम्स जोन्स के पास भेज दिये. बहुत बरसों तक उन लेखों के शुद्ध पढ़े जाने में किसी को शंका न हुई परंतु पीछे से उनका पढ़ना और अनुवाद कपोल कल्पित सिद्ध हुए.

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बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में देहली और अलाहाबाद के स्तंभों तथा खंडगिरि के चट्टान पर खुदे हुए लेखों की छापें आ गई थीं परंतु विल्फर्ड का यत्न निष्फल होने से कितने एक वर्षों तक उन लेखों के पढ़ने का उद्योग न हुआ. उन लेखों का आशय जानने की जिज्ञासा रहने के कारण जेम्स प्रिन्सेप ने ई. स. १८३४-३५ में अलाहाबाद, राधिया और मथिया के स्तंभों पर के लेखों की छापें मंगवाईं और उनको देहली के लेख से मिला कर यह जानना चाहा कि उनमें कोई शब्द एकसा है वा नहीं. इस प्रकार उन चारों लेखों को पास पास रख कर मिलाने से तुरंत ही यह पाया गया कि वे चारों लेख एक ही हैं. इस बात से प्रिन्सेप का उत्साह बढ़ा और उसे अपनी जिज्ञासा पूर्ण होने की दृढ़ आशा बंधी. फिर अलाहाबाद के स्तंभ के लेख से भिन्न भिन्न आकृति के अक्षरों को अलग अलग छांटने पर यह विदित हो गया कि गुप्ताक्षरों के समान उनमें भी कितने एक अक्षरों के साथ स्वरों की मात्राओं के पृथक् पृथक् पांच चिह्न लगे हुए हैं, जो एकत्रित कर प्रकट किये गये३. इससे कितने एक विद्वानों को उक्त अक्षरों के यूनानी होने का जो भ्रम४ था वह दूर हो गया. स्वरों के चिह्नों को पहिचानने के बाद मि. प्रिन्सेप ने अक्षरों के पहिचानने का उद्योग करना शुरू किया और उक्त लेख के प्रत्येक अक्षर को गुप्तलिपि से मिलाना और जो मिलता गया उसको वर्णमाला में क्रमवार रखना प्रारंभ किया. इस प्रकार बहुत से अक्षर पहिचान में आ गये.

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१ ज. ए. सो. बंगा; जि ४, पृ. ४७७.

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३ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ७, प्लेट ५.

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४ अशोक के लेखों की लिपि मामूली देखने वाले को अंग्रेज़ी या ग्रीक लिपि का भ्रम उत्पन्न करा दे ऐसी है. टॉम कोरिअट् नामक मुसाफिर ने अशोक के देहली के स्तंभ के लेख को देख कर ऍल. हिटकर को एक पत्र में लिखा कि 'मैं इस देश (हिंदुस्तान) के देली (देहली) नामक शहर में आया जहां पर 'अलेकज़ेंडर दी ग्रेट' (सिकंदर) ने हिंदुस्तान के राजा पोरस को हराया और अपनी विजय की यादगार में उसने एक बृहत् स्तंभ खड़ा करवाया जो अब तक वहां विद्यमान है' (केल्स वॉयेजिज़ ऐंड ट्रैवेल्स, जि. ६, पृ. ४२३; क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३). इस तरह जब टॉम कोरिअट् ने अशोक के लेखवाले स्तंभ को बादशाह सिकंदर का खड़ा करवाया हुआ मान लिया तो उस पर के लेख के पढ़े न जाने तक दूसरे यूरोपियन यात्री आदि का उसकी लिपि को ग्रीक मान लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. पादरी एडवर्ड टेरी ने लिखा है कि टॉम कोरिअट ने मुझ से कहा कि मैंने देली (देहली) में ग्रीक लेख वाला एक बहुत बड़ा पाषाण का स्तंभ देखा जो 'अलेक्ज़ेंडर दी ग्रेट' ने उस प्रसिद्ध विजय की यादगार के निमित्त उस समय वहां पर खड़ा करवाया था' (क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३-६४). इसी तरह दूसरे लेखकों ने उस लेख को ग्रीक लेख मान लिया था.

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पादरी जेम्स स्टिवन्सन ने भी प्रिन्सेप की नांई इसी शोध में लग कर ‘क,’ ‘ज,’ ‘प’ और ‘व’ अक्षरों१ को पहिचाना और इन अक्षरों की सहायता से लेखों को पढ़ कर उनका अनुवाद करने का उद्योग किया गया परंतु कुछ तो अक्षरों के पहिचानने में भूल हो जाने, कुछ वर्णमाला पूरी ज्ञात न होने२ और कुछ उन लेखों की भाषा को संस्कृत मान कर उसी भाषा के नियमानुसार पढ़ने से वह उद्योग निष्फल हुआ. इससे भी प्रिन्सेप को निराशा न हुई. ई. स. १८३६ में प्रसिद्ध विद्वान् लासन ने एक बाक्‌ट्रियन ग्रीक सिक्के पर इन्हीं अक्षरों में अँगॅथॉक्लीस का नाम पढ़ा. ई. स. १८३७ में मि. प्रिन्सेप ने सांची के स्तूपों से संबंध रखने वाले स्तंभों आदि पर खुदे हुए कई एक छोटे छोटे लेखों की छापें एकत्र कर उन्हें देखा तो उनके अंत के दो अक्षर एकसे दिखाई दिये और उनके पहिले प्राय: ‘स’ अक्षर पाया गया जिसको प्राकृत भाषा के संबंध कारक के एक वचन का प्रत्यय (संस्कृत ‘स्य’ से) मान कर यह अनुमान किया कि ये सब लेख अलग अलग पुरुषों के दान प्रकट करते होंगे और अंत के दोनों अक्षर, जो पढ़े नहीं जाते और जिनमें से पहिले के साथ ‘आ’ की मात्रा और दूसरे के साथ अनुस्वार लगा है उनमें से पहिला अक्षर ‘दा’ और दूसरा ‘नं’ (दानं) ही होगा. इस अनुमान के अनुसार ‘द’ और ‘न’ के पहिचाने जाने पर वर्णमाला संपूर्ण हो गई और देहली, अलाहाबाद, सांची, मथिया, राधिया, गिरनार, धौली आदि के लेख सुगमता पूर्वक पढ़ लिये गये. इससे यह भी निश्चय हो गया कि उनकी भाषा जो पहिले संस्कृत मान ली गई थी वह अनुमान ठीक न था, वरन उनकी भाषा उक्त स्थानों की प्रचलित देशी (प्राकृत) भाषा थी. इस प्रकार प्रिन्सेप् आदि विद्वानों के उद्योग से ब्राह्मी अक्षरों के पढ़े जाने से पिछले समय के सब लेखों का पढ़ना सुगम हो गया क्योंकि भारतवर्ष की समस्त प्राचीन लिपियों का मूल यही ब्राह्मी लिपि है.

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कर्नल जेम्स टॉड ने एक बड़ा संग्रह बाक्‌ट्रियन ग्रीक, शक, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के प्राचीन सिक्कों का किया था जिनकी एक ओर प्राचीन ग्रीक और दूसरी ओर खरोष्ठी अक्षरों के लेख थे. जनरल वॅंतुरा ने ई. स. १८३० में मानिकिआल के स्तूप को खुदवाया तो उसमें से कई एक सिक्के और दो लेख खरोष्ठी लिपि के३ मिले. इनके अतिरिक्त सर अलेकझाँडर बर्न्स आदि प्राचीन शोधकों ने भी बहुत से प्राचीन सिक्के एकत्र किये जिनके एक ओर के प्राचीन ग्रीक अक्षर तो पढ़े जाते थे परंतु दूसरी ओर के खरोष्ठी अक्षरों के पढ़ने के लिये कोई साधन न था. इन अक्षरों के लिये भिन्न भिन्न कल्पनाएं होने लगीं. ई. स. १८२४ में कर्नल जेम्स टॉड ने कड्फिसेस् के सिक्के पर के इन अक्षरों को ‘ससेनिअन’ प्रकट किया४. ई. स. १८३३ में ऍपॉलोडॉटस के सिक्के पर के इन्हीं अक्षरों को प्रिन्सेप ने पहलवी५ माना और एक दूसरे सिक्के पर की इसी लिपि६ को तथा मानिकिआल के लेख की लिपि को भी पाली७ (ब्राह्मी) बतलाया और उनकी आकृति टेढ़ी होने से यह अनुमान किया कि छापे और महाजनी लिपि के नागरी अक्षरों में जैसा अंतर८ है वैसा ही देहली आदि के अशोक के लेखों की पाली (ब्राह्मी) लिपि और इनकी लिपि में है, परंतु पीछे से स्वयं प्रिन्सेप को अपना अनुमान अयुक्त जंचने लगा.

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१ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ४८४.

c10.32

२ ‘न’ को ‘र’ पढ़ लिया था और ‘द’ को पहिचाना न था.

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३ प्रिं; रें; जि १, पृ. ६३-६६.

c10.34

४ ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३.

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५ ऍ. ए. रि; जि. १८, पृ. ५७८.

c10.36

६ ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३, ३१६.

c10.37

७ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१६.

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८ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१६.

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ई. स. १८३४ में कसान कोर्ट को एक स्तूप में से इसी लिपि का एक लेख मिला जिसको देख कर प्रिन्सेप ने फिर इन अक्षरों को पहलवी माना१. अफ़ग़ानिस्तान में प्राचीन शोध के कार्य में लगे हुए मि. मेसन को जब यह मालूम हो गया कि एक ओर ग्रीक लिपि में जो नाम है ठीक वही नाम दूसरी ओर की लिपि में है, तब उसने मिनॅन्डर, ऍपॉलॉडॉटस, हर्मिअस, बॉसिलेअस (राजा) और सॉटेरस (त्रातर) शब्दों के खरोष्ठी चिह्न पहिचान लिये और वे प्रिन्सेप को लिख भेजे. मि. प्रिन्सेप ने उन चिह्नों के अनुसार सिक्कों को पढ़ कर देखा तो उन चिह्नों को ठीक पाया और ग्रीक लेखों की सहायता से उन (खरोष्ठी) अक्षरों को पढ़ने का उद्योग करने पर १२ राजाओं के नाम तथा ६ ख़िताब पढ़ लिये गये. इस तरह खरोष्ठी लिपि के बहुत से अक्षरों का बोध होकर यह भी ज्ञात हो गया कि यह लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर को पढ़ी जाती है. इससे यह भी पूर्ण विश्वास हो गया कि यह लिपि सेमिटिक् वर्ग की है परंतु इसके साथ ही उसकी भाषा को, जो वास्तव में प्राकृत थी, पहलवी मान लिया. इस प्रकार ग्रीक लेखों के सहारे से खरोष्ठी लिपि के कितने एक अक्षर मालूम हो गये किंतु पहलवी भाषा के नियमों पर दृष्टि रख कर पढ़ने का उद्योग करने से अक्षरों के पहिचानने में अशुद्धता हो गई जिससे यह शोध आगे न बढ़ सका. ई. स. १८३८ में दो बाक्द्रियन् ग्रीक राजाओं के सिक्कों पर पाली (प्राकृत) लेख देखते ही सिक्कों पर के खरोष्ठी लिपि के लेखों की भाषा को पाली (प्राकृत) मान उसके नियमानुसार पढ़ने से प्रिन्सेप का शोध आगे बढ़ सका और १७ अक्षर पहिचान में आ गये. प्रिन्सेप की नांईं मि. नॉरिस ने इस शोध में लग कर इस लिपि के ६ अक्षर पहिचान लिये और जनरल कनिंगहाम ने बाकी के अक्षरों को पहिचान कर खरोष्ठी की वर्णमाला पूर्ण कर दी और संयुक्ताक्षर भी पहिचान लिये.

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