Pramāṇa · Search · About · API

भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c11.100

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.100

Language
Hindi

c11.100

१० डॉ. बूलर ने इस चिह्न [Figure:] को ‘ई’ माना है (बू; इं. पे; पृ. ३४) और कोई कोई युरोपियन् विद्वान् इसे बूलर के कथनानुसार ही पढ़ते हैं (ऍ. इं; जि. ८, पृ. ६०) परंतु वास्तव में यह ‘इं’ ही है. ‘इ’ की तीन बिंदियों के साथ अनुस्वार की चौथी बिंदी लगने ही ऐसा रूप बनता है और चार बिंदी होने से ही उनको समान रेखा में लिखा है. अब तक केवल निम्न लिखित ५ लेखों में ही यह चिह्न मिला है जहां सर्वत्र ‘इं’ पढ़ना ही युक्त है— नानाघाट के लेख में—‘नमो इंदस’ (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, पंक्ति पहिली). बुद्धगया के २ लेखों में—‘इंदागिनिमित्रास’ (क; भ. बो; प्लेट १०, संख्या ६-१०). मथुरा के लेख में—‘गोतिपुत्रस इंद्रपा[ल...’] (ऍ. इं; जि. २, पृ. २०१ के पास का प्लेट, लेख संख्या ६). नासिक के लेख में—‘धंमदेवपुतस इंद्रअग्निदतस’ (ऍ. इं; जि. ८, पृ. १०). इन पांचों लेखों में यह चिह्न ‘इंद्र’ शब्द के प्राकृत रूप ‘इंद’ में प्रयुक्त हुआ है जहां ‘ईद’ पढ़ना ठीक नहीं हो सकता. नानाघाट के लेख का कर्ता जहां प्राकृत में अनुस्वार की आवश्यकता नहीं थी वहां भी अनुस्वार लगाता है (नमो संकंसन-बासुदेवानं......चतुनं चं लोकपालानं) तो वह ‘इंद्र’ के प्राकृत रूप को ‘इद’ न लिख कर ‘ईद’ लिखे यह संभव ही नहीं.

Linked texts (3)