भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c11: ५—ब्राह्मी लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11
- Language
- Hindi
५—ब्राह्मी लिपि
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ई. स. पूर्व ५०० के आसपास से लगा कर ई. स. ३५० के आसपास तक (लिबिपत्र १—१५).
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ब्राह्मी लिपि भारतवर्ष की प्राचीन लिपि है. पहिले इस लिपि के लेख अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी तक के ही मिले थे, परंतु कुछ बरस हुए इस लिपि के दो छोटे छोटे लेख२, जिनमें से एक पिप्रावा के स्तूप से और दूसरा बर्ली गांव से, मिले हैं जो ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के हैं. इन लेखों की और अशोक के लेखों की लिपि में कोई स्पष्ट अंतर३ नहीं है, जैसा कि ई. स. की १४ वीं शताब्दी से लगा कर अब तक की नागरी लिपि में नहीं पाया जाता; परंतु दक्षिण से मिलने वाले भट्टिप्रोलु के स्तूप के लेखों की लिपि में, जो अशोक के समय से बहुत पीछे की नहीं है, पििप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से बहुत कुछ भिन्नता पाई जाती है जिससे अनुमान होता है कि भद्दप्रोलु के लेखों की लिपि अशोक के लेखों की लिपि से नहीं निकली किंतु उस प्राचीन ब्राह्मी से निकली होगी जिससे पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि निकली है. यह भी संभव है कि भद्दप्रोलु के स्तूप की लिपि ललितविस्तर की ‘द्राविड लिपि’ हो क्योंकि वे लेख द्रविड देश के कृष्णा जिले में ही मिले हैं.
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१ ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ५५७, ५६३.
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२ देखो ऊपर पृ. २.
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३ पिप्रावा के लेख में दीर्घ स्वरों की मात्राओं का अभाव है और बर्ली के लेख में ‘ई’ की मात्रा का जो चिह्न है वह अशोक और उसके पिछले किसी लेख में नहीं मिलता (देखो ऊपर पृ. २-३, और पृ. ३ का टिप्पण २).
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अशोक से पूर्व के जैन ‘समवायांग सूत्र’ में तथा पिछले बने हुए ‘ललितविस्तर’ में ब्राह्मी के अतिरिक्त और बहुतसी लिपियों के नाम मिलते हैं, परंतु उनका कोई लेख अब तक नहीं मिला जिसका कारण शायद यह हो कि प्राचीन काल में ही वे सब अस्त हो गई हों और उनका स्थान अशोक के समय की ब्राह्मी ने ले लिया हो जैसा कि इस समय संस्कृत ग्रंथों के लिखने तथा छपने में भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों की भिन्न भिन्न लिपियों का स्थान बहुधा नागरी ने ले लिया है. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दि से पहिले की ब्राह्मी का कोई लेख अबतक नहीं मिला; अतएव इस पुस्तक की ब्राह्मी लिपि का प्रारंभ ई. स. पूर्व ५०० के आस पास से ही होता है.
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हस्तलिखित लिपियों में सर्वत्र ही समय के साथ और लेखकों की लेखन रुचि के अनुसार परिवर्तन हुआ ही करता है. ब्राह्मी लिपि भी इस नियम से बाहर नहीं जा सकती. उसमें भी समय के साथ बहुत कुछ परिवर्तन हुआ और उससे कई एक लिपियां निकलीं जिनके अक्षर मूल अक्षरों से इतने बदल गये कि जिनको प्राचीन लिपियों का परिचय नहीं है वे सहसा यह स्वीकार न करेंगे कि हमारे देश की नागरी, शारदा (कश्मीरी), गुरुमुखी (पंजाबी), बंगला, उड़िया, तेलुगु, कनडी, ग्रन्थ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान लिपियां एक ही मूल लिपि ब्राह्मी से निकली हैं. ब्राह्मी लिपि के परिवर्तनों के अनुसार हमने अपने सुभीते के लिये उसके विभाग इस तरह किये हैं—
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ई. स. पूर्व ५०० के आस पास से लगा कर ई. स. ३५० के आस पास तक की समस्त भारतवर्ष की लिपियों की संज्ञा ब्राह्मी मानी है. इसके पीछे उसका लेखन प्रवाह दो स्रोतों में विभक्त होता है जिनको उत्तरी और दक्षिणी शैली कहेंगे. उत्तरी शैली का प्रचार विंध्य पर्वत से उत्तर के तथा दक्षिणी का दक्षिण के देशों में बहुधा रहा तो भी विंध्य से उत्तर में दक्षिणी, और विंध्य से दक्षिण में उत्तरी शैली के लेख कहीं कहीं मिल ही आते हैं.
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उत्तरी शैली की लिपियां ये हैं—
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१. गुप्तलिपि—गुप्तवंशी राजाओं के समय के लेखों में सारे उत्तरी हिंदुस्तान में इस लिपि का प्रचार होने से इसका नाम ‘गुप्तलिपि’ कल्पित किया गया है. इसका प्रचार ई. स. की चौथी और पांचवीं शताब्दि में रहा.
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२. कुटिललिपि—इसके अक्षरों तथा विशेष कर स्वरों की मात्राओं की कुटिल आकृतियों के कारण इसका नाम कुटिल रक्खा गया. यह गुप्तलिपि से निकली और इसका प्रचार ई. स. की छठी शताब्दि से नवीं तक रहा, और इसीसे नागरी और शारदा लिपियां निकलीं.
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३. नागरी—उत्तर में इसका प्रचार ई. स. की ६ वीं शताब्दि के अंत के आस पास से मिलता है परंतु दक्षिण में इसका प्रचार ई. स. की आठवीं शताब्दि से होना पाया जाता है क्योंकि दक्षिण के राष्ट्रकूट (राठौड़) वंशी राजा दंतिदुर्ग के सामनगढ़ (कोल्हापुर राज्य में) से मिले हुए शक संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) के दानपत्र१ की लिपि नागरी ही है और दक्षिण के पिछले कई राजवंशों
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१ इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११० से ११५ के सामने के प्लेट.
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के लेखों में इसका प्रचार ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक किसी प्रकार मिल आता है. दक्षिण में इसको 'नंदिनागरी' कहते हैं. प्राचीन नागरी की पूर्वी शाखा से बंगला लिपि निकली, और नागरी से ही कैथी, महाजनी, राजस्थानी (राजपूताने की) और गुजराती लिपियां निकली हैं.
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४. शारदा—इस का प्रचार भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों अर्थात् कश्मीर और पंजाब में रहा. ई. स. की ८ वीं शताब्दी के राजा मेरुवर्मा के लेखों से (देखो लिपिपत्र २२ वां) पाया जाता है कि उस समय तक तो पंजाब में भी कुटिल लिपि का प्रचार था, जिसके पीछे उसी लिपि से शारदा लिपि बनी. उसके जितने लेख अब तक मिले हैं उनमें सब से पुराना लेख सराहां (चंबा राज्य में) की प्रशस्ति है, जो ई. स. की दसवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है. इसी लिपि से वर्तमान कश्मीरी और टाकरी लिपियां निकली हैं और पंजाबी अर्थात् गुरुमुखी के अधिकतर अक्षर भी इसीसे निकले हैं.
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५. बंगला—यह लिपि नागरी की पूर्वी शाखा से ई. स. की १० वीं शताब्दी के आस पास निकली है. बदाल के स्तंभ पर खुदे हुए नारायणपाल के समय के लेख में, जो ई. स. की १० वीं शताब्दी का है, बंगला का झुकाव दिखाई देता है. इसीसे नेपाल की ११ वीं शताब्दी के बाद की लिपि, तथा वर्तमान बंगला, मैथिल और उड़िया लिपियां निकली हैं.
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दक्षिणी शैली की लिपियां प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उस परिवर्तित रूप से निकली हैं जो क्षत्रप और आंध्रवंशी राजाओं के समय के लेखों में, तथा उनसे कुछ पीछे के दक्षिण की नासिक, कार्ली आदि गुफाओं के लेखों में पाया जाता है.
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दक्षिणी शैली की लिपियां नीचे लिखी हुई हैं—
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१. पश्चिमी—यह लिपि काठियावाड़, गुजरात, नासिक, खानदेश और सतारा ज़िलों में, हैदराबाद राज्य के कुछ अंशों में, कोंकण में तथा कुछ कुछ मासोर राज्य में, ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस पास से नवीं शताब्दी के आस पास तक मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस पास इसका कुछ कुछ प्रचार राजपूताना तथा मध्य भारत में भी पाया जाता है. इसपर उत्तरी लिपि का बहुत कुछ प्रभाव पड़ा है. भारतवर्ष के पश्चिमी विभाग में इसका अधिकतर प्रचार होने के कारण इसका 'पश्चिमी' यह नाम कल्पित किया गया है.
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२. मध्यदेशी—यह लिपि मध्यप्रदेश, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग, तथा बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं शताब्दी से लगा कर आठवीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है. इस लिपि के अक्षरों के सिर चौखूंटे या संदूक की सी आकृति के होते हैं जो भीतर से बहुधा खाली, परंतु कभी कभी भरे हुए भी, होते हैं. अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली होती है, अर्थात् उनके बनाने में आड़ी और खड़ी रेखाएं काम में लाई गई हैं, न कि गोलाईदार. इस लिपि के ताम्रपत्र ही विशेष मिले हैं, शिलालेख बहुत कम.
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३. तेलुगु-कनडी—यह लिपि बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग अर्थात् दक्षिणी मराठा प्रदेश, शोलापुर, बीजापुर, बेलगांव, धारवाड़ और कारवाड़ ज़िलों में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों में, मासोर राज्य में, एवं मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग अर्थात् विज़गापट्टम, गोदावरी, कृष्णा, कर्नूल, बिलारी, अनंतपुर, कड्डप्पा, और नेल्लोर ज़िलों में मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी से १४ वीं शताब्दी तक इसके कई रूपांतर होते होते इसीसे वर्तमान तेलुगु और कनडी लिपियां बनीं. इसीसे इसका नाम तेलुगु-कनडी रक्खा गया है.
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४. ग्रंथलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्केट, सलेम्, ट्रिचिनापली, मदुरा और तिन्नेवेल्लि ज़िलों में मिलती है. ई. स. की सातवीं शताब्दी से १५ वीं शताब्दी तक इसके कई रूपांतर होते होते इससे वर्तमान ग्रंथलिपि बनी और उससे वर्तमान मलयालम् और तुलु लिपियां
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निकलीं. मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्णों की अपूर्णता के कारण संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे इसका नाम 'ग्रंथलिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो ऐसा अनुमान होता है.
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५. **कलिंग लिपि**—यह लिपि मद्रास इहाते में चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में वहां के गंगवंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है. इसका सब से पहिला दानपत्र [गांगेय]संवत् ८७ का मिला है जो गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् का है. उसकी लिपि मध्यदेशी लिपि से मिलती हुई है. अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और अक्षर बहुधा समकोणवाले हैं (लिपिपत्र ५७ में दी हुई राजा देवेंद्रवर्मन् के दानपत्र की लिपि को लिपिपत्र ४१ से मिला कर देखो); परंतु पिछले ताम्रपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं, किंतु गोलाई लिये हुए हैं और उनमें नागरी, तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथलिपि का मिश्रण होता गया है.
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६. **तामिळलिपि**—यह लिपि मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथलिपि प्रचलित थी वहां के, तथा उक्त इहाते के पश्चिमी तट अर्थात् मलबार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में ई. स. की सातवीं शताब्दी से बराबर मिलती चली आती है. इस लिपि के अधिकतर अक्षर ग्रंथलिपि से मिलते हुए हैं (लिपिपत्र ६० में दी हुई लिपि को लिपिपत्र ५२ और ५३ में दी हुई लिपियों से मिला कर देखो); परंतु ‘क’, ‘र’ आदि कुछ अक्षर उत्तर की ब्राह्मी लिपि से लिये हुए हैं. इसका रूपांतर होते होते वर्तमान तामिळलिपि बनी इस वास्ते इसका नाम तामिळ रक्खा गया है.
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**वट्टेऴुत्तु**—यह तामिळ लिपि का ही भेद है और इसे त्वरा से (घसीट) लिखी जाने वाली तामिळ लिपि कह सकते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी विभाग के ई. स. की ७ वीं से १४ वीं शताब्दी तक के लेखों तथा दानपत्रों में मिलता है परंतु कुछ समय से इसका प्रचार नहीं रहा.
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वैदिक काल में ब्राह्मी लिपि के ध्वनिसूचक संकेत या अक्षर नीचे लिखे अनुसार माने जाते थे—
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| स्वर. | ह्रस्व. | अ | इ | उ | ऋ१ | ऌ२ |
| | दीर्घ. | आ | ई | ऊ | ॠ | [ॡ?] |
| | प्लुत३. | आ३ | ई३ | ऊ३ | ॠ३ | [ॡ३?] |
| | संध्यक्षर. | ए | ऐ | ओ | औ | |
| | इनके प्लुत. | ए३ | ऐ३ | ओ३ | औ३ | |
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१ आज कल ‘ऋ’ और ‘ऌ’ का उच्चारण बहुधा सब लोग ‘रि’ और ‘लि’ के सदृश करते हैं. दक्षिण के कुछ लोग ‘रु’ और ‘लु’ के से विलक्षण उच्चारण करते हैं और उत्तर-भारत के कितने एक वैदिक ‘र्’ और ‘लृ’ के से उच्चारण करते हैं; परंतु वास्तव में ये तीनों उच्चारण कल्पित ही हैं. ‘ऋ’ और ‘ऌ’, ‘र’ और ‘ल’ दो स्वरमय उच्चारण थे जो बिना किसी और स्वर की सहायता के होते थे, परंतु बहुत काल से वे लुप्त हो गये हैं. अब तो केवल उनके अक्षरसंकेत रह गये हैं.
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२ ‘ऌ’ स्वर वेद में केवल ‘क्लृप्’ धातु में मिलता है और संस्कृत साहित्य भर में उक्त धातु को छोड़ कर कहीं उसका प्रयोग नहीं मिलता. वैयाकरणों ने तोतले बोलने वाले बच्चों के ‘ऋ’ के अशुद्ध उच्चारण के अनुकरण में इसे माना है, तो भी इसके प्लुत का प्रयोग मानने को वे तय्यार नहीं हैं, क्योंकि इसका व्यवहार ही नहीं है. शुक्ल यजुर्वेद के प्रातिशाख्य में अन्य स्वरों से समानता करने के लिये ‘ऌ’ के दीर्घ और प्लुत रूप माने हैं परंतु उनका प्रयोग कहीं नहीं मिलता. ह्रस्व लृकार वाले शब्द के कल्पित संबोधन में प्लुत ‘ॡ ३’ का होना वैयाकरण और कुछ शिक्षाकार मानते हैं, तो भी वास्तव में ‘ऌ’ केवल ह्रस्व ही है.
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३ आज कल त्रिमात्रिक स्वर अर्थात् प्लुत के लिये दीर्घ स्वर के आगे ३ का अंक लगाते हैं परंतु यह रीति प्राचीन नहीं जान पड़ती. दीर्घ स्वरों के लिये जैसे ह्रस्व के आगे २ का अंक नहीं लगाया जाता परंतु ब्राह्मी और वर्तमान नागरी में
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अयोगवाह. अनुस्वार.१ • ध७ (ग्वम् या गुं) विसर्ग. ः जिह्वामूलीय.२ ≍क ≍ख उपध्मानीय.२ ≍प ≍फ
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व्यंजन. स्पर्श. क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण ळ३ ळ्ह३ त थ द ध न प फ ब भ म
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उनके लिये स्वतंत्र संकेत और मात्रायें मिलती हैं वैसे ही प्राचीन काल में प्लुत स्वरों के लिये भी कोई विशेष चिह्न रहे होंगे जिनका अब पता नहीं चलता. जैसे वर्तमान नागरी में ‘ओ’ और ‘औ’ के, और गुजराती तथा मोडी (मराठी) में ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’ और ‘औ’ के मूल संकेत न रहने से ‘अ’ पर ही मात्रा लगा कर काम चलाया जाता है (ॲ, ॲे, ओ, औ-गुजराती) वैसे ही प्लुत के प्राचीन चिह्नों के लुप्त होने पर दीर्घ के आगे ३ का अंक लगाया जाने लगा हो. वस्तुतः संस्कृत साहित्य में भी प्लुत का प्रयोग क्रमशः बिलकुल उठ गया. संबोधन, वाक्यारंभ, यज्ञकर्म, मंत्रों के अंत, यज्ञ की आज्ञाएं, प्रत्युत्तर, किसी के कहे हुए वाक्य को दोहराने, विचारणीय विषय, प्रशंसा, आशीर्वाद, कोप, फटकारने, सदाचार के उल्लंघन आदि अवसरों पर वैदिक साहित्य और प्राचीन संस्कृत में प्लुत का प्रयोग होता था (पाणिनि, ८. २. ८२-१०८), परंतु पीछे से केवल संबोधन और प्रणाम के प्रत्युत्तर में ही इसका व्यवहार रह गया. पतंजलि ने व्याकरण न पढ़नेवालों को एक पुरानी गाथा उद्धृत करके डराया है कि यदि तुम अभिवादन के उत्तर में प्लुत करना न जानोगे तो तुम्हें स्त्रियों की तरह सादा प्रणाम किया जायगा. इस से यह तो स्पष्ट है कि स्त्रियों की बोलचाल से तो उस समय प्लुत उठ गया था परंतु पीछे से पुरुषों के व्यवहार से भी वह जाता रहा. केवल कहीं कहीं वेदों के पारायण में और प्रातिशाख्यों तथा व्याकरणों के नियमों में उसकी कथा मात्र बची है. ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’ और ‘औ’ के प्लुत, कहीं पूरे संध्यक्षर का प्लुत करने से, और कहीं ‘इ’ और ‘उ’ को छोड़ कर केवल ‘अ’ के प्लुत करने से बनते थे, जैसे अग्ने३ या अग्ना३इ.
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१ अनुस्वार नकार (अनुनासिक) का स्वरमय उच्चारण दिखाता है. वेदों में जब अनुस्वार ‘र’, ‘श’, ‘ष’ और ‘ह’ के पहिले आता है तब उसका उच्चारण ‘ग’ से मिश्रित ‘गुं’ या ‘ग्वं’ सा होता है जिसके लिये वेदों में ध[^७] चिह्न है. यह यजुर्वेद में ही मिलता है. शुक्लयजुर्वेद के प्रातिशाख्य में इसके ह्रस्व, दीर्घ और गुरु तीन भेद माने गये हैं जिनके न्यारे न्यारे चिह्नों की कल्पना की गई है. प्राचीन शिलालेखों में कभी कभी ‘वंश’ की जगह ‘वंᳵश’ और ‘सिंह’ के स्थान में ‘सिᳵह’ खुदा मिलता है. अनुस्वार का ‘श’ के पहिले ऐसा उच्चारण आर्यकंठों में अब भी कुछ कुछ पाया जाता है और कई बंगाली अपने नामों के हिमांशु, सुधांशु आदि को अंगरेजी में Himangshu, Sudhangshu (हिमांग्शु, सुधांग्शु) आदि लिख कर ध[^७] के उच्चारण की स्मृति को जीवित रखते हैं.
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२ ‘क’ और ‘ख’ के पूर्व विसर्ग का उच्चारण विलक्षण होता था और जिह्वामूलीय कहलाता था. इसी तरह ‘प’ और ‘फ’ के पहिले विसर्ग का उच्चारण भी भिन्न था और उपध्मानीय कहलाता था. जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के न्यारे न्यारे चिह्न थे, जो कभी कभी प्राचीन पुस्तकों, शिलालेखों और ताम्रपत्रों में मिल आते हैं, जो अक्षरों के ऊपर, बहुधा उनसे जुड़े हुए, होते हैं, और उनमें भी अक्षरों की नांई समय के साथ परिवर्तन होना पाया जाता है (देखो लिपिपत्र १७, २१, २२, २३, २८, २६ आदि). बोपदेव ने अपने व्याकरण में अनुस्वार को ‘बिंदु’, विसर्ग को ‘द्विबिंदु’, जिह्वामूलीय को ‘वज्राकृति’ और उपध्मानीय को ‘गजकुंभाकृति’ कह कर उनका स्वरूप बतलाया है.।
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३ ऋग्वेद में दो स्वरों के बीच के ‘ड’ का उच्चारण ‘ळ’ और वैसे ही आये हुए ‘ढ’ का उच्चारण ळ्ह होता है. इन दोनों के लिये भी पृथक् चिह्न हैं. ‘ळ’ का प्रचार राजपूताना, गुजरात, काठियावाड़ और सारे दक्षिण में अब भी है और उसका संकेत भी अलग ही है जो प्राचीन ‘ळ’ से ही निकला है. ‘ळ्ह’ को आज कल ‘ळ’ और ‘ह’ को मिला कर (ळ्ह) लिखते हैं, परंतु प्राचीन काल में उसके लिये भी कोई पृथक् चिह्न नियत होगा, क्योंकि प्राचीन तेलुगु-कनडी, ग्रंथ और तमिळ लिपियों के लेखों में ‘ळ’ के अतिरिक्त एक और ‘ऴ’ मिलता है; वैसा ही कोई चिह्न ‘ढ’ के स्थानापन्न ‘ळ्ह’ के लिये प्राचीन वैदिक पुस्तकों में होना चाहिये.
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| अन्तस्थ. | य | र | ल | व |
| ऊष्मन. | श | ष१ | स | ह |
| यम.२ | कुं | खुं | गुं | घुं |
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१ याज्ञवल्क्य के अनुसार उत्तर-भारत के यजुर्वेदी लोग संहितापाठ में टवर्ग के साथ के संयोग को छोड़ कर और सर्वत्र 'ष' को 'ख' बोलते हैं, जैसे षष्ठी=खष्ठी; इसीसे मिथिला, बंगाल, पंजाब आदि के संस्कृतज्ञ तथा अन्य लोग भी संस्कृत एवं 'भाखा' में बहुधा 'ष' को 'ख' बोलने लग गये. इसी वैदिक उच्चारण से प्राकृत में 'क्ष' के दो रूप छ (च्छ) और ख (क्ख) हो गये.
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२ वर्गों के पहिले चार वर्षों का जब किसी वर्ग के पांचवें वर्ग से संयोग होता है तब उस अनुनासिक वर्ण के पहिले वैदिक काल में एक विलक्षण ध्वनि होती थी जिसे यम कहते थे, जैसे 'पत्नी' में 'त्' और 'न्' के बीच में. इस तरह बीस यम होने चाहियें, परंतु प्रातिशाख्यों में तथा शिक्षाओं में चार ही यम माने हैं और उनके नाम या संकेत 'कुं', 'खुं', 'गुं' और 'घुं' दिये हैं. इसका तात्पर्य यह है कि वर्गों के पहिले अक्षरों अर्थात् क, च, ट, त, प के संयोग से जो यम उत्पन्न होता था वह 'क्' कहलाता था, और उसके लिये एक चिह्न नियत था. इसी तरह ख, छ, ठ, थ, फ के संयोग से उत्पन्न होनेवाले यम के लिये 'ख्' प्रकृति का चिह्न, ग, ज, ड, द, व के संयोग से बने हुए यम के लिये 'ग्' प्रकृति का कोई तीसरा चिह्न, और घ, झ, ढ, ध, भ के संयोग से उद्धृत यम के लिये 'घ्' प्रकृति का कोई और चिह्न नियत था. ये चिह्न कैसे थे इसका पता न तो शिलालेखादि में और न पुस्तकों में मिलता है, किंतु व्याकरणवाले इन यमों को क, ख, ग, घ से बतलाते हैं, जैसे—
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इस तरह वैदिक साहित्य में अधिक से अधिक ६४ (ऋग्वेद में ६४३ और यजुर्वेद में ६३४) ध्वनिसूचक संकेत अर्थात् वर्ण थे, परंतु पीछे से साधारण मनुष्यों एवं जैन और बौद्धों में, जिनका प्रारंभिक साहित्य प्राकृत में था, ४६ या ४७५ अक्षर व्यवहार में आते थे. ई. स. की चौथी
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३ ऋग्वेद में २१ स्वर ('लृ' के दीर्घ और प्लुत को छोड़ने से), ४ अयोगवाह (अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय), २७ स्पर्श वर्ण (पांचों वर्गों के २५ और 'ळ' तथा 'ळ्ह'), ४ अंतःस्थ, ४ ऊष्मन् और ४ यम, मिलकर ६४ वर्ण होते हैं.
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४ यजुर्वेद में वर्णसंख्या बहुधा ऋग्वेद के समान ही है, केवल 'ळ' और 'ळ्ह' का प्रयोग उसमें नहीं होता परंतु उसमें अनुस्वार का ॡ रूप अलग होता है. इसीसे उसमें ६३ वर्ण काम में आते हैं.
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५ जैनों के दृष्टिवाद में, जो लुप्त हो गया है, ब्राह्मी अक्षरों की संख्या ४६ मानी है, (वे; इं. स्ट, १६, २८१), जो अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ (या क्ष) होने चाहियें. हुएन्त्संग अक्षरों की संख्या ४७ बतलाता है (बी; बु. रे. वे. घ; जिल्द १, पृ. ७८), जो 'अ' से 'ह' तक के ४५ अक्षर तो ऊपर लिखे अनुसार और बाकी के दो अक्षर 'क्ष' और 'ज्ञ' होने चाहियें. बौद्ध और जैनों के प्राकृत ग्रंथों में ऋ, ऋ, लृ, लॄ इन चार स्वरों का प्रयोग नहीं है. प्राकृत साहित्य में इनकी आवश्यकता ही नहीं रहती. जहां संस्कृत शब्द के प्रारंभ में 'ऋ' होता है वहां प्राकृत में 'रि' हो जाता है (ऋषभ=रिखभ, ऋक्ष=रिच्छ या रिक्ख), और जहां व्यंजन के साथ 'ऋ' की मात्रा लगी होती है वहां 'ऋ' के स्थान में 'अ', 'इ' या 'उ' हो जाता है (मृग=मग, तृषा=तिसा, सुवर्ण=सुहंग; निभृत=निहुअ ). ये चारों वर्ण (ऋ, ॠ, लृ, लॄ) अब भी साधारण लोगों के व्यवहार में नहीं आते और प्रारंभिक पढ़ने वालों की 'बारहखड़ी' (द्वादशाक्षरी) में भी इनको स्थान नहीं मिलता. यह प्रारंभिक पठनशैली आधुनिक नहीं है; किंतु अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में भी ऐसी ही थी, क्योंकि बुद्धगया के अशोक के समय के बने हुए महाबोधी मंदिर के पास बुद्ध के चंक्रम अर्थात् भ्रमणस्थान में दोनों ओर ११, ११ स्तंभों की दो पंक्तियां हैं उन स्तंभों की कुंभियों (आधार) पर शिल्पियों ने एक एक करके 'अ' को छोड़ कर 'क' से 'ह' तक के अक्षर खोदे हैं. उनमें भी ये चारों स्वर नहीं है. यद्यपि सामान्य लोगों के व्यवहार में ये चार वर्ण नहीं आते थे तो भी वर्णमाला में उनको स्थान अवश्य मिलता था, क्योंकि जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध मठ में रक्खी हुई ई. स. की छठी शताब्दी की 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई बौद्ध पुस्तक के अंत में जिस लेखक ने वह पुस्तक लिखी है उसीके हाथ की लिखी हुई उस समय की पूरी वर्णमाला है जिसमें इन चार वर्णों को स्थान दिया गया है (देखो, लिपिपत्र १६). ऐसे ही हन्नाकोल से मिले हुए ई. स. की १२ वीं शताब्दी के बौद्ध तांत्रिक शिलालेख में प्रत्येक वर्ण पर अनुस्वार लगा कर पूरी वर्णमाला के बीज बनाए हैं जिनमें भी ये चारों वर्ण हैं (लिपिपत्र ३५) और उदयादित्य के समय के उज्जैन के शिलालेख के अंत में खुदी हुई पूरी वर्णमाला में भी ये चारों वर्ण दिये हुए हैं (देखो लिपिपत्र २५).
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पत्नी= पत् (मूल व्यंजन) क् (यम) नी= पत्कूनी
सक्थ्ना= सक्थ् (,, ,,) ख् (,,) ना= सक्थ्ख्ना
अग्नि= अग् (,, ,,) ग् (,,) नि= अग्ग्नि
यज्ञ= *यज् (,, ,,) ग् (,,) ञ= यज्ञ्गुञ
गृभ्णामि= गृभ् (,, ,,) घ् (,,) णामि= गृभ्घ्णामि.
c11.46
शताब्दी के पीछे, लेखनशैली में अक्षरों के रूपों में परिवर्तन होते होते संयुक्ताक्षर ‘क्ष’ में ‘क्’ और ‘ष’ के मूल रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण ही रूप ‘क्ष’ बन गया तब बौद्धों ने ‘क्ष’ को भी वर्णों अर्थात् मातृकाओं (सिद्धमातृकाओं) में स्थान दिया. इसी तरह पीछे से संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ के ‘ज्’ और ‘ञ’ के रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण रूप ‘ज्ञ’ बन गया तब उसको भी लोगों ने वर्णों में स्थान दिया. तंत्रग्रंथों में ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ की वर्णों अर्थात् मातृकाओं में संज्ञा की गई है परंतु ये दोनों सर्वथा वर्ण नहीं किंतु संयुक्तवर्ण हैं और उनके घटक दो दो अक्षरों के मूलरूप न रहने पर एक ही विलक्षण नया संकेत बन जाने से ही उनकी वर्णों में गणना हुई है जैसे कि वर्तमान काल में नागरी की वर्णमाला में ‘त्र’ की भी१.
c11.47
१ वर्तमान ‘त्र’ में मूल घटक दोनों अक्षरों में से एक अर्थात् ‘र’ का चिह्न तो पहिचाना जाता है, परंतु ‘त्’ का नहीं, किंतु ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ में दोनों ही के मूल अक्षरों का पता नहीं रहा. इतना ही नहीं, ‘ज्ञ’ में तो वास्तविक उच्चारण भी नष्ट हो गया. दक्षिणी लोग कोई कोई इसे ‘द्न’ बोलते हैं (देखो बंबई के अंगरेजी पत्र ज्ञानप्रकाश का अंगरेज़ी अक्षरांतर Dnan Prakash) और उत्तर में ‘ज्ञ’ का स्पष्ट ‘ग्य’ उच्चारण है, केवल कुछ संस्कृतज्ञ ‘न्ग्य’ के सदृश उच्चारण करते हैं. ऐसी दशा में जब इन संकेतों से मूल अक्षरों का भान नहीं होता तब उच्चारण और वर्णज्ञान की शुद्धि के लिये इन्हें ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ लिखना और छापना ही उचित है.
c11.48
लिपिपत्र पहिला.
c11.49
यह लिपिपत्र गिरनार पर्वत के पास के चट्टान पर खुदे हुए मौर्यवंशी राजा अशोक के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छापों से बनाया गया है. यह लेख मौर्यराज्य के पश्चिमी विभाग का होने से वहां की ब्राह्मी लिपि को प्रकट करता है. इसमें स्वरों की मात्राओं के चिह्न इस प्रकार मिलते हैं—
c11.50
‘आ’ की मात्रा एक छोटीसी आड़ी लकीर (–) है जो व्यंजन की दाहिनी तरफ़ बहुधा अक्षर के ऊपर की ओर (देखो, खा, रा) परंतु कभी कभी मध्य में भी, (देखो, जा, मा, बा) लगाई जाती है. ‘ज’ के साथ ‘आ’ की मात्रा का योग केवल ‘ज’ के मध्य की लकीर को कुछ अधिक लंबी कर के बतलाया है जिससे कभी कभी ‘ज’ और ‘जा’ में भ्रम हो जाता है.
c11.51
‘इ’ की मात्रा का नियत चिह्न _| है जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ लगता है (देखो, नि), परंतु कहीं कहीं समकोण के स्थान पर गोलाईदार या तिरछी लकीर भी मिलती है (देखो, टि, लि).
c11.52
‘ई’ की मात्रा का नियत चिह्न _|| है, जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ जोड़ा जाता है (देखो, टी, ठी), परंतु कहीं कहीं आड़ी सीधी लकीर को तिरछा कर दिया है, और समकोण के स्थान में गोलाई मिलती है (देखो, पी, मी); ‘थी’ बनाने में ‘थ’ के साथ केवल दो तिरछी लकीरें ही लगा दी गई हैं.
c11.53
अशोक के पूर्व के बर्ली गांव के लेख में ‘वीराय’ के ‘वी’ [Figure:] अक्षर के साथ ‘ई’ की मात्रा का चिह्न (है, जो अशोक के समय में लुप्त हो चुका था और उसके स्थान में ऊपर लिखा हुआ नया चिह्न बर्ताव में आने लग गया था (देखो, ऊपर पृष्ठ ३ और वहीं का टिप्पण २).
c11.54
‘उ’, और ‘ऊ’ के चिह्न क्रमशः एक और दो आड़ी ( - = ) या खड़ी ( । ।। ) लकीरें हैं जो व्यंजन के नीचे को लगाई जाती हैं. . जिन व्यंजनों का नीचे का हिस्सा गोल या आड़ी लकीरवाला होता है उनके साथ खड़ी, और जिनका खड़ी लकीरवाला होता है उनके साथ आड़ी (दाहिनी ओर) लगाई जाती हैं (देखो, तु, धु, नु, सु, कू, जू,).
c11.55
‘ए’ और ‘ऐ’ के चिह्न क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें ( - = ) हैं जो बहुधा व्यंजन की बाईं ओर ऊपर की तरफ़ परंतु कभी कभी मध्य में भी लगाई जाती हैं, (देखो, के, टे, ऐ, थै ).
c11.56
‘ओ’ का चिह्न दो आड़ी लकीरें हैं ( - - ) जिनमें से एक व्यंजन की दाहिनी ओर को ‘आ’ की मात्रा की नांईं, और दूसरी बाईं ओर को ‘ए’ की मात्रा के समान लगाई जाती है (देखो, जो, नो).
c11.57
‘औ’ का चिह्न इस लेख में नहीं है किंतु उसमें ‘ओ’ के चिह्न से इतनी ही विशेषता है कि बाईं ओर को एक के स्थान में दो आड़ी लकीरें ( = ) होती हैं जैसे कि लिपिपत्र आठवें में ‘पौ’ में.
c11.58
अनुस्वार का चिह्न एक बिंदु ( ˙ ) है जो बहुधा अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ रक्खा जाता है (देखो, अं ).
c11.59
विसर्ग का चिह्न इस लेख में तथा अशोक के दूसरे लेखों में भी कहीं नहीं मिलता, परंतु ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में वह मिलता है जो वर्तमान विसर्ग के चिह्न के सदृश ही है और वैसे ही अक्षर के पास आगे लगता है (देखो, लिपिपत्र ७, मूल की पहिली पंक्ति में ‘राज्ञ:’.)
c11.60
अशोक के समय ऋ, ॠ, ऌ और ॡ की मात्राओं के चिह्न कैसे थे इसका पता नहीं लगता इतना ही नहीं, किंतु पिछले लेखों में भी ‘ॠ’ और ‘ॡ’ की मात्राओं के चिह्नों का कहीं पता नहीं है. ‘ऋ’ की मात्रा का चिह्न पहिले पहिल ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में मिलता है (देखो, लिपिपत्र ६ में मथुरा के लेखों के अक्षरों में ‘गृ’, ‘घृ’ और ‘वृ’; लिपिपत्र ७ में ‘कृ’ और ‘वृ’; और लिपिपत्र आठवें में ‘कृ’, ‘गृ’ और ‘वृ’ ). संयुक्त व्यंजनों में कितने एक स्थानों में पहिले उच्चारण होनेवाले को ऊपर और पीछे उच्चारण होनेवाले को उसके नीचे जोड़ा है (देखो, म्य, म्हि, र्व, स्ति, स्व) जो शुद्ध है, परंतु कहीं कहीं दूसरे को ऊपर और पहिले को नीचे लिखा है (देखो, त्र, त्या, व्यो, स्टा, स्ना) जो अशुद्ध है, और यह प्रकट करता है कि लेखक शुद्ध लिखना नहीं जानता था. हमने उन अक्षरों के ऊपर वर्तमान नागरी के शुद्ध अक्षर जान कर दिये हैं, जैसे खुदे हैं वैसा अक्षरांतर नहीं किया. ‘क्र’ में ‘र’ को अलग नहीं जोड़ा किंतु ‘क’ की खड़ी लकीर को ‘र’ का रूप देकर उसके साथ आड़ी लकीर जोड़ दी है. ऐसे ही ‘ब्र’ में ‘ब’ की बाईं तरफ़ की खड़ी लकीर की भीतर दबा कर उसमें कोण बना दिया है. ऐसे रूप अशोक के किसी दूसरे लेख में अथवा पिछले लेखों में कहीं नहीं मिलते.
c11.61
संयुक्त व्यंजनों में पहिले आनेवाले ‘र्’ (रेफ) तथा पीछे आनेवाले ‘र’ का भेद तो इस लेख का लेखक जानता ही न था जिससे उसने संयुक्त व्यंजनों में जहां जहां ‘र’ आया उसको सर्वत्र पहिले ही लिखा है और उसको (चिह्न से बतलाया है जो उसके लिखे हुए ‘र’ का अग्रभाग है (देखो, त्र और र्व).
c11.62
इस लेख में ‘ई’, ‘ऊ’, ‘ऐ’, ‘औ’, ‘ङ’, ‘ढ’, ‘श’, और ‘ष’ अक्षर नहीं है. ‘ई’ का रूप [Figure:] होना चाहिये, जिससे मिलता हुआ रूप क्षत्रपों के सिक्कों में (देखो, लिपिपत्र १०); अमरावती के लेख में (देखो, लिपिपत्र १२) और कई पिछले लेखों में मिलता है. ‘ऊ’, ह्रस्व ‘उ’ के नीचे दाहिनी ओर एक और आडी लकीर जोड़ने से बनता था जैसा कि भरहुत स्तूप के लेखों से उद्धृत किये हुए
c11.63
अक्षरों में (लिपिपत्र ३) दिया गया है. ‘ऐ’, ‘ए’ के अग्रभाग के साथ बाईं ओर एक आड़ी लकीर जोड़ने से बनता था जैसा कि हाथीगुंफा के लेख में मिलता है (देखो, लिपिपत्र ३). ‘औ’ का प्राचीन रूप अशोक के लेखों में अथवा गुप्तों के समय के पूर्व के किसी लेख में नहीं मिलता. उसका अशोक के समय का रूप [Figure:] होना चाहिये. ‘ङ’ बुद्धगया के उपर्युक्त मंदिर के स्तंभ पर मिलता है जिसकी आकृति [Figure:] है. ‘ठ’ का रूप बिलकुल वृत्त [Figure:] है और वह, देहली के सवालक स्तंभ पर के अशोक के लेख में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २). ‘श’ और ‘ष’ अशोक के खालसी के लेख में मिलते हैं (देखो, लिपिपत्र २).
c11.64
इस लेख में बहुतेरे अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं. संभव है कि कुछ तो उस समय भिन्न भिन्न रूप से लिखे जाते हों परंतु यह भी हो सकता है कि उक्त लेख का लेखक जैसे शुद्ध लिखना नहीं जानता था वैसे ही बहुत सुंदर अक्षर लिखनेवाला भी न था; क्योंकि इस लेख की लिपि वैसी सुंदर नहीं है जैसी कि अशोक के देहली के सवालक स्तंभ और पंडेरिया (रुंमिंदेई) के स्तंभ के लेखों की है, और जैसे उनमें अक्षर तथा स्वरों की मात्राओं के चिह्न एकसा मिलते हैं वैसे इस लेख में नहीं हैं. यह भी संभव है कि लेखक सिद्धहस्त न हो और त्वरा से लिखता हो जिससे अक्षर एकसा नहीं लिख सका. इसीसे कहीं सीधी खड़ी लकीर को तिरछा (देखो, उ, झ, न और प के दूसरे रूप) या गोलाईदार (देखो, ग और फ के दूसरे रूप) कर दिया है और कहीं गोलाईदार को तिरछा (देखो, ‘अ’ का चौथा रूप और ‘थ’ का तीसरा रूप) बना दिया है.
c11.65
लिपिपत्र पहिले की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.66
इयं धंमलिपी देवानं प्रियेन प्रियदसिना राजा लेखा-
पिता इध न किंचि जीवं आरभित्पा प्रज्हितव्यं न
च समाजो कतव्यो बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति
देवानं प्रियो प्रियदसि राजा अस्ति पि तु एकचा समा-
जा साधुमंता देवानं पियस प्रियदसिनो राज्ञो पुरा महा-
नसम्हि देवानं पियस प्रियदसिनो राज्ञो अनुदिवसं ब-
c11.67
लिपिपत्र दूसरा.
c11.68
यह लिपिपत्र देहली के सवालक स्तंभ१, खालसी२, जोगड३ और सिद्धापुर४ के चटानों तथा राधिया५, सारनाथ६ और सांची७ के स्तंभों पर खुदे हुए अशोक के लेखों के फोटों से बनाया गया है और इसमें बहुधा वे ही अक्षर लिये गये हैं जिनमें लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से या तो कुछ भिन्नता पाई जाती है या जो लिपिपत्र पहिले में नहीं मिले. यह भिन्नता कुछ तो देशभेद से है और कुछ लेखक की रुचि और त्वरा से हुई है.
c11.69
१ ई. ऍ; जि. १३; पृ. ३०६-१० के बीच के सेट.
c11.70
२ ऍ. इं; जि. २, पृ. ४५०-६० के बीच के सेट.
c11.71
३ आ. स. स. इं; जि. १, सेट ६७-६६.
c11.72
४ ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३८-४० के बीच के सेट.
c11.73
५ ऍ. इं; जि. २, पृ. २४८-४६ के बीच के सेट.
c11.74
६ ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६८ के पास का प्लेट.
c11.75
७ ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६६ के पास का प्लेट.
c11.76
देहली के सवालक स्तंभ के लेख की लिपि बड़ी सुंदर और जमी हुई है और वह सारा लेख सावधानी के साथ लिखा गया है. उसमें ‘आ’ में ‘आ’ की मात्रा का चिह्न ऊपर नहीं किंतु मध्य में लगा
c11.77
है. ‘द’ का मध्य भाग कहीं कहीं गोलाईदार नहीं किंतु समकोणवाला है. ‘घ’ को कहीं कहीं उलटा भी लिखा है१. ‘ज’ के मध्य की दाहिनी तरफ़ की आड़ी लकीर को कुछ अधिक लंबा कर ‘जा’ बनाने से ‘ज’ और ‘जा’ में भ्रम होने की संभावना रहती थी जिसको स्पष्ट करने के लिये ही लेखक ने ‘ज’ के मध्य की लकीर के अंत में बिंदी बनाकर फिर ‘आ’ की मात्रा का चिह्न लगाया है. जिन अक्षरों का ऊपर का भाग खड़ी लकीरवाला है उनके साथ ‘ई’ की मात्रा गिरनार के लेख की ‘इ’ की मात्रा के समान लगाई है परंतु कुछ नीचे की तरफ़ से, जिससे ‘ई’ की मात्रा का रूप बन जाता है (देखो, ‘पिं’ और ‘ली’ में ‘इ’ और ‘ई’ की मात्राओं का भेद). अनुस्वार का चिह्न कहीं अक्षर के ऊपर परंतु विशेष कर आगे ही धरा है (देखो, ‘पिं’ और ‘भ्युं’)
c11.78
१ देखो ऊपर पृ. २७ का टिप्पण ६.
२. ये मूल पंक्तियां देहली के सप्वालक स्तंभ के लेख से हैं.
c11.79
खालसी के चट्टान के लेख की लिपि भद्दी है और त्वरा से लिखी हुई प्रतीत होती है जिससे अक्षर सर्वत्र सम नहीं मिलते और स्वरों की मात्राओं में कहीं कहीं अंतर पड़ गया है (देखो, ‘ता’, ‘शा’, ‘तु’, ‘खे’, ‘गे’ और ‘ले’). एक स्थान में ‘ए’ का रूप ‘ठ’ से मिल गया है. ‘घ’ और ‘ल’ का नीचे का भाग कहीं कहीं गोल नहीं किंतु समकोणवाला बना दिया है (देखो, ‘घ’, और ‘ल’ का दूसरा रूप). ‘छ’ के ऊपरी भाग में < आकृति का सिर बना दिया है जिससे अनुमान होता है कि उस समय किसी किसी लिपि में अक्षरों के सिर भी बनते हों, जिसका कुछ आभास भट्टिप्रोलु के लेखों में स्वरों की मात्रारहित व्यंजनों में होता है. ‘छ’ का नीचे का भाग कलम को उठाये बिना ही (चलती कलम से) लिखा है. ऐसे ही ‘ज’ को भी कहीं कहीं लिखा है जिससे बीच की आड़ी लकीर के स्थान में ग्रंथि हो गई है. अशोक के लेखों में केवल एक यही लेख ऐसा है कि जिसमें ‘श’ और ‘ष’ के रूप मिलते हैं.
c11.80
जोगड़ के लेख में ‘ओ’ उलटा लिखा है और एक स्थान में ‘स’ को चलती कलम से लिख दिया है जिससे मध्य में गांठ बन गई है (जोगड के लेख के इस ‘स’ को गिरनार, सप्पालक स्तंभ और खालसी के लेखों के ‘स’ से मिलाकर देखो).
c11.81
सिद्धापुर के लेख में कहीं कहीं ‘अ’, ‘फ’, ‘म’ और ‘र’ की आकृतियां कुछ विलक्षण बनी हैं.
c11.82
रधिया के लेख में ‘ड’ के नीचे बिंदी बनाई है.
c11.83
गिरनार के लेख और अशोक के अन्य लेखों के अक्षरों में कहां कहां अंतर है यह लिपिपत्र दूसरे में दिये हुए अक्षरों को लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से मिलाने से स्पष्ट हो जायगा. प्रत्येक अक्षर की भिन्नता का विवेचन करने की आवश्यकता नहीं.
c11.84
लिपिपत्र दूसरे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.85
देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आहा सडुवीसति वस
अभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता हिदतपालते
दुसंपादये अंनत अगाय धंमकामताया अगाय
पलीखाया अगाय सुसूषाया अगेन भयेना अगेन उसा-
हेना एस चु खो मम अनुसथिया धंमापेखा धंमका-
मता चा सुवे सुवे वढिता वढीसति चेवा पुलिसा पि
च मे उकसा चा गेवया चा मकिमा चा अनुविधियंती
c11.86
लिपिपत्र तीसरा.
c11.87
यह लिपिपत्र रामगढ़१, घोसुंडी२, बेसनगर३ (विदिशा), नागार्जुनी गुफा४, नानाघाट५, भरहुत६ और सांची७ के स्तूपों और हाथीगुंफा८ के लेखों से तय्यार किया गया है और मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. उक्त लेखों मे से पहिले ७ में कोई संवत् नहीं है, केवल हाथीगुंफा के लेख में मुरिय काल९ (मौर्य संवत्) १६४ (गत) दिया है, अतएव इस लिपिपन का समय अनुमान के आधार पर ही दिया गया है.
c11.88
२ उदयपुर के विक्टोरिआ हॉल में रक्खे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
c11.89
३ आ. स. इं; ई. स. १६०८-६, प्लेट ४६ वां.
c11.90
४ इं. ऐं; जि. २०, पृ. ३६४-५ के पास के प्लेट.
c11.91
५ आ. स. वे. इं; जि. ५; प्लेट ५१, लेख सं. १-२.
c11.92
६ इं. ऐं; जि. १४; पृ. १३६.
c11.93
७ बू; इं. पे; प्लेट २, पंक्ति १८, अक्षर संख्या ४१.
c11.94
८ बू; इं. पे; प्लेट २; पंक्ति २१-२२; और पं. भगवानलाल इंद्रजी संपादित ‘हाथीगुंफा अँड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स्’ के साथ का प्लेट, लेख संख्या १.
c11.95
९ यदि मौर्य संवत् का प्रारंभ मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त के राज्याभिषेक अर्थात् ई. स. पूर्व ३२१ से माना जावे तो उक्त लेख का समय (३२१-१६४=) ई. स. पूर्व १५७ होगा.
c11.96
घोसुंडी के लेख में ‘ले’ में ‘त्’ के साथ ‘र्’ को जोडने में ‘त’ के नीचे की दाहिनी ओर की तिरछी लकीर को कुछ लंबा कर दिया है (इसी तरह बेसनगर के लेख के ‘त्रे’ में भी). ‘प्रा’ में ‘र्’ नीचे की तरफ जोडा गया है और ‘ष्रे’ में ‘ष’ के प्रारंभ की सीधी खड़ी लकीर को अधिक लंबा कर ‘र्’ का रूप उसीमें बता दिया है.
c11.97
बेसनगर (विदिशा) के लेख में ‘त्रा’ और ‘द्र’ में ‘र्’ को अधिक लंबी वक्र रेखा का रूप देकर नीचे की तरफ जोडा है.
c11.98
नानाघाट के लेख में ‘इं’ [Figure:] १० बनाया है जिसमें तीन बिंदी तो ‘इ’ की हैं और चौथी अनुस्वार की है. ‘थो’ में ‘ओ’ की मात्रा की दोनों तरफ की आड़ी लकीरों को जोड़ कर एक ही लकीर बना दी है जो ‘थ’ से ऊपर अलग ही लगाई है परंतु ‘लो’ में ‘ओ’ की मात्रा की दोनों लकीरों को जोड़ कर एक कर दिया है और उसे ‘ल’ के अग्रभाग के साथ ही ठीक ठीक जोडा है. ‘प्र’, ‘ब्र’ और ‘त्र’ में ‘र्’ को नीचे की तरफ जोड़ा है जो ‘उ’ की मात्रा का भ्रम उत्पन्न कराता है.
c11.99
१ आ. स. इं; ई. स. १६०३-४; प्लेट ४३ वां (B).
c11.100
१० डॉ. बूलर ने इस चिह्न [Figure:] को ‘ई’ माना है (बू; इं. पे; पृ. ३४) और कोई कोई युरोपियन् विद्वान् इसे बूलर के कथनानुसार ही पढ़ते हैं (ऍ. इं; जि. ८, पृ. ६०) परंतु वास्तव में यह ‘इं’ ही है. ‘इ’ की तीन बिंदियों के साथ अनुस्वार की चौथी बिंदी लगने ही ऐसा रूप बनता है और चार बिंदी होने से ही उनको समान रेखा में लिखा है. अब तक केवल निम्न लिखित ५ लेखों में ही यह चिह्न मिला है जहां सर्वत्र ‘इं’ पढ़ना ही युक्त है— नानाघाट के लेख में—‘नमो इंदस’ (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, पंक्ति पहिली). बुद्धगया के २ लेखों में—‘इंदागिनिमित्रास’ (क; भ. बो; प्लेट १०, संख्या ६-१०). मथुरा के लेख में—‘गोतिपुत्रस इंद्रपा[ल...’] (ऍ. इं; जि. २, पृ. २०१ के पास का प्लेट, लेख संख्या ६). नासिक के लेख में—‘धंमदेवपुतस इंद्रअग्निदतस’ (ऍ. इं; जि. ८, पृ. १०). इन पांचों लेखों में यह चिह्न ‘इंद्र’ शब्द के प्राकृत रूप ‘इंद’ में प्रयुक्त हुआ है जहां ‘ईद’ पढ़ना ठीक नहीं हो सकता. नानाघाट के लेख का कर्ता जहां प्राकृत में अनुस्वार की आवश्यकता नहीं थी वहां भी अनुस्वार लगाता है (नमो संकंसन-बासुदेवानं......चतुनं चं लोकपालानं) तो वह ‘इंद्र’ के प्राकृत रूप को ‘इद’ न लिख कर ‘ईद’ लिखे यह संभव ही नहीं.
c11.101
भरहुत के लेख में ‘वि’ के साथ की ‘इ’ की मात्रा के अग्र भाग को दाहिनी तरफ बढ़ा कर उसमें सुंदरता लाने का यत्न किया है और ‘गी’ के साथ की ‘ई’ की मात्रा की दोनों खड़ी लकीरों को कुछ बाईं ओर झुकाया है.
c11.102
सांची के लेख के ‘ळी’ में ‘ई’ की मात्रा की दोनों खड़ी लकीरों को दाहिनी ओर झुकाया है.
c11.103
हाथीगुंफा के लेख में अक्षरों के सिर बनाने का यत्न पाया जाता है परंतु वे वर्तमान नागरी अक्षरों के सिरों जैसे लंबे नहीं किंतु बहुत छोटे हैं. ये सिरे पहिले पहिल इसी लेख में मिलते हैं. ‘भि’ और और ‘लिं’ में ‘इ’ की मात्रा भरहुत स्तूप के उपर्युक्त ‘वि’ के साथ लगी हुई ‘इ’ की मात्रा के सदृश है और ‘दी’ में ‘ई’ की मात्रा की दाहिनी ओर की खड़ी लकीर को भी वैसा ही रूप दिया है. ‘ले’ में ‘ल’ के अग्रभाग को दाहिनी ओर नीचे को झुकाया है और ‘गो’ में ‘ओ’ की मात्रा नानाघाट के लेख के ‘थो’ के साथ की ‘ओ’ की मात्रा की नांई व्यंजन के ऊपर उसे स्पर्श किये बिना एक ही आडी लकीर के रूप में धरी है.
c11.104
लिपिपत्र तीसरे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.105
१सुगनं रजे रञो गोगीपुतस विसदेवस पौतेण गोति-
पुतस आगरजुस पुतेण वाछिपुतेन धनभूतिन
कारितं तोरनां(णं) सिलाकंमंता च उपंण.
२धंमस नमो इंदस नमो संकंसनवासुदेवानं चं-
दस्स......मा...तानं चतुनं चं लोकपालानं यमवरुन-
कुबेरवासवानं नमो कुमारवरस वेदिमिरिस र...
c11.106
२ यहां से तीन पंक्तियां नानाघाट के लेख से हैं (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, लेख संख्या १).
c11.107
लिपिपत्र चौथा.
c11.108
यह लिपिपत्र भट्टिपोलु के स्तूप से निकले हुए पत्थर के ३ पात्रों के ढक्कनों पर खुदे हुए ६ लेखों से तथा स्फटिक के एक छोटे से टुकड़े पर, जो वहीं से मिला था, खुदे हुए लेख से तय्यार किया गया है.३ ‘अ’ से ‘सं’ तक के अक्षर उक्त नौ लेखों से और अंतिम ६ अक्षर (‘ग’ से ‘हि’ तक ) स्फटिक पर के लेख से लिये हैं, जिसकी लिपि पहिले तीन लिपिपत्रों की शैली की (ब्राह्मी) है. पाषाण के पात्रों पर खुदे हुए ६ लेखों की लिपि में ‘घ’, ‘द’, ‘भ’, ‘म’, ‘ल’, ‘ष’ और ‘ळ’ इन ७ अक्षरों में पहिले तीन लिपिपत्रों के अक्षरों से भिन्नता है (इन अक्षरों को लिपिपत्र १ से ३ तक के अक्षरों से मिलाकर देखो). दूसरा भेद यह है कि प्रत्येक व्यंजन जब स्वरों की मात्रा से रहित होता है तब उसके साथ दाहिनी ओर एक आड़ी लकीर लगाई गई है जैसे अशोक के लेखों में ‘आ’ की मात्रा लगाई जाती थी. यह लकीर बहुधा व्यंजन के अग्रभाग से सटी रहती है परंतु कभी कभी कुछ नीचे की तरफ़ और कभी मध्य में लगाई जाती है. ‘ज’ के साथ जब स्वर की कोई मात्रा नहीं होती तब वह अशोक के लेखों के ‘ज’ के समान होता है (बीच की आड़ी लकीर स्वरचिह्नरहित दशा की है); परंतु जब उसके साथ कोई स्वर की मात्रा लगी रहती है उस समय उसका रूप बहुधा [ मिलता है (देखो, जु, जू, जे, जं). इन भेदों से पाया जाता है कि उक्त लेखों की लिपि पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से नहीं निकली किंतु उस मूल लिपि से निकली होगी जिससे स्वयं पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि निकली है.४ संभवतः यह द्रविड (द्राविडी) लिपि हो.
c11.109
१ ये पहिली तीन पंक्तियां भरहुत के स्तूप के लेख से हैं (इं. ऐं; जि. २१, पृ. २२६).
c11.110
३ पं. इं; जि. २, पृ. ३२८-२६ के बीच के प्लेट.
c11.111
४ देखो ऊपर पृ. ४२. भट्टिप्रोलु के उक्त ६ लेखों के अतिरिक्त इस शैली की लिपि (द्राविडी) का और कोई शिलालेख अब तक नहीं मिला, परंतु आंध्रवंशी राजा गौतमीपुत्र श्रीयज्ञशातकर्णि के एक प्रकार के सिक्के पर एक तरफ ‘रञो गोतमिपुतस सिरियञ'… सातकणिस’ और दूसरी ओर ‘……गोतम(मि)पुतष हिरुयणहातंसिष’ लेख है (रा; कँ. कॉ. आं; पृ ७५). इन दोनों लेखों की लिपियों में स्पष्ट अंतर है. पहिले लेख की लिपि आंध्रों के लेख और सिक्कों की ही लिपि है और दूसरी तरफ के लेख की लिपि संभव है कि भट्टिप्रोलु के लेखों की द्राविड़ी लिपि का परिवर्तित रूप हो (देखो, क; कॉ. ए. इं; प्लेट १२, सिक्का संख्या ८; रा; इं; कॉ; प्लेट ३, सिक्का संख्या ५).
c11.112
इस लिपि में ‘आ’ की मात्रा का चिह्न बहुधा [Figure:] है परंतु कहीं कहीं-कोण के स्थान में गोलाई भी मिलती है (देखो, का, खा, ता). ‘ऊ’ की मात्रा में भी अशोक के लेखों से भिन्नता है (देखो, जू, धू, भू) परंतु बाकी की मात्राओं में विशेष अंतर नहीं है. केवल कहीं कहीं सीधी लकीर को तिरछा या गोलाईदार बना दिया है.
c11.113
लिपिपत्र चौथे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.114
१कुणपितुने च कुणमातु च कुणच च सिवका च स-
जुसं पशति फाल्लिग यमुन च बुधसरिगनं निखेतु.
३बलवपुतस कुणष षापितुकष मजुम. ४उतारे पि-
गहपुतो काणीठो. ५अरहदिनानं गोठिया मजु-
स च पणगो च तंन कम येन कुबिरको राजा
अंक. ६नेगमा वले चद्यो जेतो जंघो तिसो रेतो
अचिनो प.भिका अखधो केलो केसो महे। सेटो छदि-
c11.115
लिपिपत्र पांचवां.
c11.116
यह लिपिपत्र पभोसा के २ लेखों१, मथुरा के छोटे छोटे ४ जैन लेखों२ तथा महाक्षत्रप शोडास के मथुरा के लेख३ से तय्यार किया गया है. पभोसा के लेखों के अक्षरों में ‘आ’ की दाहिनी तरफ़ की खड़ी लकीर को नीचे के छोर से बाईं तरफ़ मोड़कर ऊपर की ओर कुछ बढ़ा लिया है, जैसे कि ई. स. की दूसरी शताब्दी से दक्षिण के लेखों में मिलता है. ‘री’ में ‘ई’ की मात्रा और ‘पू’ में ‘ऊ’ की मात्रा में पहिले के लिपिपत्रों से भिन्नता है (देखो, ‘री’ और ‘पू’). मथुरा के लेखों में ‘ख’ और ‘म’ के नीचे के भाग में त्रिकोण बनाया है. तीसरे ‘व’ का सिर त्रिकोण आकृति का (भीतर से खाली) बनाया है जिससे उसकी आकृति विलक्षण हो गई है. ‘ळ’ की आकृति सांची के ‘ळ’ से कुछ विलक्षण है जिसका कारण कलम को उठाये बिना पूरा अक्षर लिखना ही होना चाहिये. महाक्षत्रप शोडास के लेख में ‘ड’ का रूप नागरी के ‘ड’ से किसी प्रकार मिलता हुआ है.
c11.117
१ ऍ. इं; जि. २, पृ. ३२८ के पास का प्लेट, लेख संख्या १ (A).
c11.118
२ ऍ. इं; जि. २, पृ. ३२८ के पास का प्लेट, लेख संख्या १ (B). ” ” ” ” २. ” ” ” तीसरा, लेख संख्या ६. ” ” ” ” ८. ” ” पृ. २४२, २४३ के पास के २ प्लेट.
c11.119
३ ऍ. इं; जि. १, पृ. ३६७ के पास का प्लेट, लेख, ३३; जि. २ पृ. २०० के पास का प्लेट, लेख, १, ५ और ६.
८. ऍ. इं; जि. २, पृ. २०० के पास का प्लेट, लेख संख्या २. ९. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३६७ के पास का प्लेट, लेख, ३३.
c11.120
लिपिपत्र पांचवें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.121
नमो अरहतो वर्धमानस्य गोतिपुत्रस पोठयश कालवा-
ळस……कोशिकिये शिमिचाये आयागपटो प…………
c11.122
१समनस माहरखितास अंतेवासिस वछीपुचस सावकास
उतरदासकस पसादो तोरन. २अधिक्रताया राज्ञो शोन-
डायनपूत्रस्य वंगपालस्य पुत्रस्य र(रा)जो) तेवणीपुत्रस्य
भागवतस्य पुत्रेण वैहिदरीपुत्रेण अ(आषाढसेनेन कारितं.
c11.123
लिपिपत्र छठा.
c11.124
यह लिपिपत्र कुशनवंशी राजाओं के समय के मथुरा१, सारनाथ२ और चारगांव३ से मिले हुए लेखों से तय्यार किया गया है. मथुरा के कई एक लेखों से अक्षर छांटे गये हैं, जिनमें कई अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं जो भिन्न भिन्न लेखकों की लेखन रुचि की भिन्नता प्रकट करते हैं. पहिली ‘इ’ में तीन बिंदियों के स्थान पर तीन आड़ी रेखाएं बना दी हैं और दूसरी ‘इ’ में दो आड़ी लकीरों के आगे दाहिनी ओर एक खड़ी लकीर बनाई है. ‘उ’ (पहिले) की दाहिनी ओर की आड़ी लकीर को नीचे की तरफ़ मोड़ा है. यही मोड़ बढ़ने पर नागरी का ‘उ’ बनता है (देखो, लिपिपत्र ८२ में नागरी ‘उ’ की उत्पत्ति). दूसरा व तीसरा ‘ए’ नागरी ‘ए’ से कुछ कुछ मिलने लगा है. ‘ए’ के पांचों रूप एक दूसरे से भिन्न हैं. ‘न’ के दूसरे रूप के मध्य में गांठ बनाई है जो क़लम को उठाये बिना पूरा अक्षर लिखने से ही बनी है. वैसा ही ‘न’ लिपिपत्र १२, १६, ३६, ३७, ३८, ३६ आदि में मिलता है. पहिले ‘प’, ‘ल’ और तीसरे ‘ष’ के रूप नागरी के ‘प’ ‘ल’ और ‘ष’ से किसी प्रकार मिलते हुए हैं. ‘वा’, ‘रा’ और ‘षा’ में ‘आ’ की मात्रा की आड़ी लकीर खड़ी या तिरछी हो गई है. ‘इ’ और ‘ई’ की मात्राओं के मूल चिह्न मिट कर उनके नये रूप बन गये हैं (देखो, णि, थि, वि, सी). ‘ए’ और ‘ऐ’ की मात्राएं नागरी के समान बन गई हैं. संयुक्ताक्षरों में दूसरे आने वाले ‘य’ का मूल रूप नष्ट हो कर नागरी के ‘द्य’ से मिलता जुलता रूप बन गया है, परंतु सारनाथ के लेख में उसका मूल रूप और चारगांव के लेख में दोनों रूप काम में लाये गये हैं.
c11.125
२ ऐपि. इंडि; जि. ८, पृ. १७३ के पास का प्लेट.
c11.126
३ ऐपि. इंडि; जि. १, पृ. ३८८ से ३९७ के बीच के प्लेट; और जि. २, पृ. २२० स २०६ के बीच के प्लेटों के कई लेखों से.
c11.127
लिपिपत्र छठे की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर-
c11.128
महारा[जस्य राजातिरा[ज]स्य देवपुत्रस्य षाढिकणिष्कस्य सं५
७ हे६ १ दि७ १० ५८ एतस्य पूर्व्व(र्वा) यां९ आर्य्यदेहिकिया-
तो गणातो आर्य्यनागभुतिकियातो कुलातो गणिअ आर्य्य-
बुद्धशिरिस्य शिष्यो वाचको आर्य्यसनिकस्य भगिनि आर्य्यज-
c11.129
५ आ. स. इं; ई. स. १८७८-६, प्लेट ५६.
c11.130
६ ये मूल पंक्तियां पं. इं; जि.१, मथुरा के लेख, १६ से हैं.
c11.131
७ सं = संवत्सर = संवत्.
c11.132
८ हे = हेमंत.
c11.133
९ दि = दिवसे.
c11.134
लिपिपत्र सातवां.
c11.135
यह लिपिपत्र महाक्षत्रप नहपान के जामाता शक उषवदात (ऋषभदत्त) और उसकी स्त्री दक्षमित्र्रा के नासिक के पास की गुफ़ाओं (पांडव गुफ़ाओं) के ४ लेखों१० से तय्यार किया गया है.
c11.136
१ ऐपि. इंडि; जि. २, पृ. २०० के पास का प्लेट, लेख, १.
c11.137
४ ऐपि. इंडि; जि. ८, पृ. १७६ के पास का प्लेट, लेख, ३ (A).
c11.138
१० ५ = १५. ये अंक प्राचीन शैली के हैं, जिसमें शून्य ० का व्यवहार न था. उसमें १० से ६० तक के लिये ६ चिह्न दहाइयों के नियत थे (देखो, आगे अंकों का विवेचन). ऐपि. इंडि; जि. ८, प्लेट ४ लेख संख्या १०; प्लेट ७, संख्या १२; प्लेट ५, सं. १२; प्लेट ८, सं. १३. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५२, लेख संख्या ५, ७, ८ और १० (A) (नासिक).
c11.139
इसी लिपिपत्र के आधारभूत एक लेख में हलंत व्यंजन पहिले पहिल मिलता है, जिसको सिरों की पंक्ति से नीचे लिखा है. इसके अतिरिक्त हलंत और स्वर व्यंजन में कोई अंतर नहीं है. ‘सू’ के साथ की ‘ऊ’ की मात्रा नागरी की ‘ऊ’ की मात्रा से मिलती हुई है, ‘र्णा’ में ‘आ’ की मात्रा रेफ के साथ लगाई है. और स्वरों की संधियां बहुधा नहीं की हैं.
c11.140
लिपिपत्र सातवें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर-
c11.141
सिद्धम् राज्ञः क्षहरातस्य क्षत्रपस्य नहपानस्य जामा-
त्रा दीनीकपुत्रेण उषवदातेन त्रिगोशतसहस्रदेन न-
द्या(द्यां) बाणासायां सुवर्णदानतीर्थकरेण देवताभ्यः ब्राह्मणे-
भ्यश्च षोडशग्रामदेन अनुवर्षं ब्राह्मणशतसहस्री-
भोजापयित्रा प्रभासे पुण्यतीर्थे ब्राह्मणेभ्यः अष्टभार्याप्रदेन
भरुकच्छे दशपुरे गोवर्धने शोर्पारगे च चतुश्शालाsetsध-
प्रतिश्रयप्रदेन आराम तडागउदपानकरेण इबापारदामण-
तापीकरबेणादाहनुकानावापुण्यतरकरेण एतासां च नद्यो-
c11.142
लिपिपत्र आठवां.
c11.143
यह लिपिपत्र उपर्युक्त अशोक के लेखवाले गिरनार के पास के चट्टान की पिछली तरफ़ खुदे हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया गया है. यह लेख शक संवत् ७२ (ई. स. १५०) से कुछ पीछे का है. इस लेख में ‘पौ’ के साथ जो ‘औ’ की मात्रा जुड़ी है वह तो अशोक के लेखों की शैली से ही है और ‘यौ’ के साथ की मात्रा उसीका परिवर्तित रूप है जो पिछले लेखों में भी कुछ परिवर्तन के साथ मिल आता है, परंतु ‘नौ’ और ‘मौ’ के साथ जो ‘औ’ की मात्रा जुड़ी है वह न तो अशोक के लेखों में और न उनसे पिछले किसी लेख में मिलती है अतएव संभव है कि वह चिह्न अशोक से पूर्व का हो२. हलंत व्यंजन इसमें भी पंक्ति से नीचे लिखा है.
c11.144
लिपिपत्र आठवें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
c11.145
परमलक्षणव्यंजनैरुपेतकान्तमूर्त्तिना स्वयमधिगतमहाक्षत्रप-
नाम्ना नरेंद्रकन्यास्वयंवर | नेकमाल्यप्राप्तदाम्ना महाक्षत्रपेण
रुद्रदाम्ना वर्षसहस्राय गोब्रा......त्थं धर्म्मकीर्त्तिवृद्ध्यर्थं
च अपीडयित्वा करविष्टिप्रणयक्रियाभिः पौरजानपदं जनं
स्वस्मात्कोषा[त्] महता धनौघेन अनतिमहता च कालेन
त्रिगुणदृढ़तरविस्तारायाम
c11.146
लिपिपत्र नवां.
c11.147
यह लिपिपत्र वासिष्टीपुत्र पुळुमायि आदि आंध्रवंशी राजाओं के नासिक के पास की गुफ़ाओं के ७ लेखों१ से तैयार किया गया है. वासिष्टीपुत्र पुळुमायि के लेख में ‘नु’ के साथ की ‘उ’ की मात्रा के अंत में एक आड़ी लकीर और लगी हुई है और ‘ह्य’ में ‘य्’ को ऊपर और ‘ह’ को नीचे लिखा है जो लेखकदोष है. गौतमीपुत्र यज्ञशातकर्णि के लेख में पहिले ‘न’ को बिना कलम उठाये ही पूरा लिखा है जिससे उसकी आकृति मथुरा के लेखों के दूसरे ‘न’ (लिपिपत्र ६) से ठीक मिलती हुई है. यह दोष अन्यत्र भी पाया जाता है.
c11.148
˚लिपिपत्र नवें की मूलपंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.149
सिद्धं (द्ध) रञो वासिठिपुतस सिरिपुळुमायिस संवछरे एकु-
नबीसे १९ गिम्हाणं पखे वितीये २ दिवसे तेरसे
१० ३ राजरञो गोतमीपुतस हिमवतमेरुमंदरपवतस-
मसारस असिकअसकमुलक सुरठकुकुरापरांत अनूपविद-
भआकरावंतिराजस विंझछवतपारिचातसह्यकण्हगिरिमच-
c11.150
१ वासिष्टीपुत्र पुळुमायि के ४ लेखों से—ऍ. इं; जि. ८, नासिक के लेख, प्लेट १, संख्या २; प्लेट २, संख्या ३; प्लेट ६, संख्या २५; प्लेट ३, संख्या १. आ. स. वे. इं; जि. ४. प्लेट ५२, नासिक की लेख संख्या १३, १५; प्लेट ५४, संख्या १२, १३. गौतमीपुत्र स्वामिश्रीयज्ञशातकर्णि नामवाले एक लेख से—ऍ. इं; जि. ८, नासिक के लेख, प्लेट १, संख्या २४. आ. स. वे. इं; जि. ४ प्लेट ५४, (नासिक के लेख) संख्या १६. गौतमीपुत्र शातकर्णि के २ लेखों से—ऍ. इं; जि. ८, नासिक के लेख, प्लेट २, संख्या ४, ५. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५३, नासिक की लेख संख्या १३, १४. यदि गौतमीपुत्र स्वामिश्रीयज्ञशातकर्णि, गौतमीपुत्र शातकर्णि से भिन्न और पुराणों में दी हुई आंध्रवंशी राजाओं की नामावली का २७ वां राजा यज्ञश्रीशातकर्णि हो तो उसके लेख का समय ई. स. की दूसरी नहीं किंतु तीसरी शताब्दी होना चाहिये.
c11.151
लिपिपत्र दसवां.
c11.152
यह लिपिपत्र पश्चिमी क्षत्रप२, त्रैकूटक३ तथा आंध्रवंशी४ राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से तैयार किया गया है. क्षत्रपों के छोटे सिक्कों पर लंबा लेख होने से कितने एक सिक्कों पर के कोई कोई अक्षर अधिक सिकुड़ गये हैं जिससे उनकी आकृति स्पष्ट नहीं रही (देखो ‘य’ का तीसरा रूप; ‘स’ का दूसरा रूप; ‘ह’ का तीसरा, चौथा और पांचवां रूप; ‘त्त’ का पांचवां रूप; ‘ज्ञ’ का दूसरा रूप), और कहीं कहीं स्वरों की मात्राएं भी अस्पष्ट होगई हैं. त्रैकूटकों के सिक्कों में ‘न, व’, ‘ह’, ‘त्त’, ‘त्र’, ‘ड्य’ और ‘ष्ण’ के रूप विलक्षण मिलते हैं. आंध्रों के सिक्कों के अक्षरों में से अंतिम तीन अक्षर (ष, हा, हि) उपर्युक्त गौतमीपुत्र
c11.153
२ ये मूल पंक्तियां वासिष्टीपुत्र पुळुमायि के नासिक के लेख से उद्धृत की गई हैं (ऍ. इं; जि. ८, नासिक के लेखों की प्लेट १, संख्या २. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५२, नासिक की लेख सं. १४).
c11.154
३ बांसवाड़ा राज्य के सरवानियां गांव से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के २४०० सिक्कों, राजपूताना म्युझिअम (अजमेर) में रक्खे हुए १०० से अधिक सिक्कों तथा प्रो. रापसन् संपादित ब्रिटिश म्युझिअम में रक्खे हुए आंध्र, क्षत्रप और त्रैकूटक वंशों के सिक्कों की सूची की पुस्तक के प्लेट ६-१७ से.
c11.155
४ राजपूताना म्युझिअम में रक्खे हुए त्रैकूटक वंशी राजाओं के सिक्कों तथा प्रो. रापसन् की उपर्युक्त पुस्तक के प्लेट १८ से.
c11.156
५ प्रो. रापसन की उपर्युक्त पुस्तक के प्लेट १—८ से.
c11.157
श्रीयाज्ञशातकर्णि के द्राविडी लिपिवाले लेख से लिये हैं और दूसरों से भिन्न होने के कारण अंत में अलग दिये हैं.
c11.158
लिपिपत्र १० वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.159
राज्ञो क्षहरातस नहपानस . राज्ञो महाक्षत्रपस घसमोतिकपुत्र-
स चष्टनस . राज्ञो महाक्षत्रपस ईश्वरदत्तस वर्षे प्रथमे .
राज्ञो महाक्षत्रपस दामसेनसब पुत्रस राज्ञः क्षत्रपस यशोदाम्नः . राज्ञो
महाक्षत्रपस दामसेनपुत्रस राज्ञो महाक्षत्रपस दामजदश्रियः . राज्ञो महाक्ष-
त्रपस रुद्रसेनपुत्रस राज्ञो महाक्षत्रपस भर्तृदाम्नः . राज्ञ क्षत्रपस रुद्र-
सेनपुत्रस राज्ञ क्षत्रपस यशोदाम्नः . राज्ञ महाक्षत्रपसस्वामि(रुद्र(दा)मपुत्रस
c11.160
लिपिपत्र ११ वां.
c11.161
इस लिपिपत्र में भाजा, पित्तलखोरा, महाड आदि दक्षिण की भिन्न भिन्न गुफाओं के कई लेखों२ से मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं.
c11.162
२ भाजा-आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४४, लेखसंख्या ७. पित्तलखोरा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४४, लेख-सं. ६. महाड—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४६, लेखसं. २, ३, ४. सेलारवाडी—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४८, लेखसंख्या १६. बेडसा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४७, लेखसंख्या ३. कन्हेरी—आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, लेखसंख्या २, ३, ४, ५, १४, १५. कार्ले—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४७, ४८, ५१, ५४, लेखसंख्या ३, ५, ६, ११, १३, १७, १६, २०, २१, २२. जुन्नर—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ४८-५१, लेखसंख्या २--६, १०, १४, १५, २०, २४, २५, २८. नासिक—पें. इं; जि. ८, नासिक के लेखों का प्लेट ५, लेखसंख्या १८; प्लेट ३, सं. ६; प्लेट ८, सं. ८; प्लेट ५, सं. २३. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५५, लेख-संख्या १६, २२, २४, २५ (नासिक). कुडा—आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ३५--३६ लेखसंख्या १, ५, ६, ११, १३, २०, २४.
c11.163
भाजा के लेख में ‘ठ’ को त्वरा से लिखने के कारण उसकी आकृति वृत्त सी न बन कर उससे भिन्न बन गई है. महाड के लेख में ‘म’ की आकृति दो अलग अलग अंशों में विभक्त हो गई है. वास्तव में ये दोनों अंश जुड़ने चाहिये थे. कन्हेरी के लेख के ‘लो’ के साथ लगी हुई ‘ओ’ की मात्रा (कलम को उठाये बिना मात्रा सहित अक्षर लिखने के कारण) गांठवाली बन गई है और दक्षिणी शैली के पिछले कई लेखों में ऐसा ही ‘लो’ मिलता है (देखो लिपिपत्र ३६, ४३, ४४, ४६, ४७ आदि). यदि कलम को उठा कर मात्रा का चिह्न लगाया जाता तो ‘लो’ की आकृति लिपिपत्र छठे में मथुरा के लेखों से दी हुई ‘लो’ की आकृति से मिलती हुई होनी चाहिये थी. कार्ले के लेख में ‘न’ अक्षर की जो आकृति मिलती है वह भी कलम को उठाये बिना पूरा अक्षर लिखने से ही बनी है परंतु कलम को ऊपर की तरफ़ न बढ़ा नीचे की तरफ़ बढ़ाकर आड़ी लकीर खींची है जिससे ग्रंथिकावाला रूप (जैसा कि लिपिपत्र ६, ३६, ३७, ३८, ३६ आदि में है) न बन कर यह नया विलक्षण रूप बन गया है, जिसके परिवर्तित रूप लिपिपत्र १३ और १४ में मिलते हैं. जुन्नर के लेख में ‘मि’ में जो ‘म’ का रूप मिलता है उसीके परिवर्तित रूप से लिपिपत्र १३ और १४ में दिये हुए ‘म’ के विलक्षण रूप बने हैं, जो अन्य लेखों में नहीं मिलते. ‘व’ और ‘म’ के सिर त्रिकोण आकृति के (भीतर से खाली) बने हैं और कहीं ‘इ’ और ‘ई’ की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न करने से उनकी आकृतियां पहिले से अधिक विलक्षण हो गई हैं (देखो, रि, रि, लि, वी). ‘द्य’ में प्रथम ‘घ’ तो प्राचीन रूप का और दूसरा ‘घ’ नागरी से मिलता हुआ है जो कलम को उठाये बिना ही पूरा अक्षर लिखने से बना है. नासिक के लेखों के अक्षरों में ‘म्’ के साथ लगी हुई ‘ऊ’ की मात्रा के दोनों छोर एक दूसरे के साथ मिल गये हैं और ‘न्ये’ में ‘य’ को ‘न्’ की खड़ी लकीर के मध्य में जोड़ा है. कुड़ा के लेखों के
c11.164
१ ये मूल पंक्तियां क्षत्रपों के सिक्कों पर के लेखों से हैं.
c11.165
अक्षरों में ‘अ’, ‘क’, ‘र’१ आदि खड़ी लकीर वाले अक्षरों की तथा ‘पु’ में ‘उ’ की मात्रा की खड़ी लकीर को लंबा कर नीचे के भाग में बाईं ओर ग्रंथि सी बना कर अक्षर में अधिक सुंदरता लाने का यत्न स्पष्ट पाया जाता है.
c11.166
लिपिपत्र ११ वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—
c11.167
सिधं ओतराहस दांतामितियकस योणकस धंमदेवपुतस
इंद्राग्निदतस धंमात्मना इमं लेणं पवते तिरंण्हम्हि खा-
नितं अभंतरं च लेणस चेतियघरो पोढियो च माता-
पितरो उदिस इम लेण कारितं सवबुधपुजाय चातुदि-
शस भिखुसंघस नियातितं सह पुतेन धंमरखितेन.
c11.168
लिपिपत्र १२ वां.
c11.169
यह लिपिपत्र अमरावती के कई एक लेखों२ तथा जग्गयपेट के ३ लेखों३ से तय्यार किया गया है. अमरावती के लेखों के अक्षरों में ‘इ’ की तीन बिंदियों के स्थान में तीन आड़ी लकीरें बनाई हैं इतना नहीं किंतु उनको वक्र भी बनाया है और ‘जा’ में ‘आ’ की मात्रा को नीचे की ओर झुकाया है. जग्गयपेट के लेखों में ‘अ’, ‘क’, ‘ञ’ आदि अक्षरों की खड़ी लकीरों को नीचे की ओर बहुत बढ़ा कर उनमें बाईं ओर घुमाव डाला है. और ‘ल’ की खड़ी लकीर को ऊपर की ओर बढ़ाकर घुमाया है, ऐसे ही ‘इ’, ‘ई’ को और कहीं ‘उ’ की मात्राओं को भी; ‘इ’ के चिह्न की तीन बिंदियों के स्थान में अधिक मुड़ी हुई लकीरें बनाई हैं. ‘इ’ के पहिले रूप की इन तीनों लकीरों को चलती कलम से जोड़ कर लिखने से वर्तमान तामिळ लिपि के ‘इ’ का पूर्वरूप बन जाता है (देखो, लिपिपत्र ८४ में तामिळ लिपि की उत्पत्ति में ‘इ’ का तीसरा रूप).
c11.170
लिपिपत्र १२ वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
c11.171
४ ये मूल पंक्तियां आ. स. स. इं; प्लेट ६३, लेखसंख्या ३ से हैं.
c11.172
सिधं। रञे(ज्ञो) माढरिपुतस इखाकुना(णां) सिरिविरपुरिसदतस सं-
वछर २० वासापखं ६ दिवसं १० कम्माकरथे णडतुरे
आवेनिस नाकचंदस पूतो गामे महाकांडरुरे आवेसनि
सिधथो आपणो मातरं नागिलनिं पुरतो कातुनं घरनिं
c11.173
२ आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ५६, लेखसंख्या १, १३, १६, १७, १८, ३०, ३१, ३८, ४०, ४१, ४५, ५३.
c11.174
लिपिपत्र १३ वां.
c11.175
१ ये मूल पंक्तियां इंद्राग्निदत्त के लेख से हैं (पॅ. इं; जि. ८, नासिक के लेखों का प्लेट ५, लेखसंख्या १८.)
c11.176
३ आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ६२, ६३, लेखसंख्या १-३.
c11.177
यह लिपिपत्र मयिडवोलु से मिले हुए पल्लववंशी शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र५ से तय्यार किया गया है. इसमें ‘ए’, ‘ज’, ‘त’, ‘न’, ‘म’ और ‘स’ अक्षर विलक्षण हैं. ‘ए’ की त्रिकोण आकृति मिटकर नया रूप बना है जो त्वरा से लिखने के कारण ऐसा हुआ है. कलम उठाये बिना ही ‘त’ को पूरा लिखने से उसके बीच में ग्रंथि बन गई है६. ‘न’ कार्ले के लेख में मिलनेवाले
c11.178
५ पॅ. इं; जि. ६, पृ. ८४ से ८८ के बीच के ४ प्लेटों से.
c11.179
६ ‘त’ का ऐसा ही रूप कन्हेरी के एक लेख में भी मिलता है (देखो, लिपिपत्र ११ में).
c11.180
उक्त अक्षर का कुछ परिवर्तित रूप है१. 'म' जुन्नर के लेख के 'मि' में जो 'म' अक्षर है उसका विकार मात्र है२. 'स' की बाईं तरफ़ लगनेवाली वक्र रेखा को अक्षर के मुख्य अंश से अलग कर उसको दाहिनी तरफ़ अधिक ऊपर बढ़ाने से यह विलक्षण 'स' बना है.
c11.181
२ देखो, लिपिपत्र ११ में जुन्नर के लेखों का 'मि'.
c11.182
...३चौपुरातो युवमहाराजा भारदायसगोत्तो प-
ल्लवानं सिवखंदवम्मो धंञकडे वापतं आन-
पयति अम्हेहि दानि अम्ह वेजयिके धंमा-
युबलवधनिंके य बम्हनानं अगिवेससगो-
c11.183
लिपिपत्र १४ वां.
c11.184
यह लिपिपत्र कौंडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र४ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ई' की खड़ी लकीर को तिरछा कर दिया है. 'ड' और 'न' में स्पष्ट अंतर नहीं है. 'ज', 'न', 'म' और 'स' अक्षर लिपिपत्र १३ के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं इतना ही नहीं किंतु इस दानपत्र की लिपि बहुधा वैसी ही है जैसी कि लिपिपत्र १३ वें की है.
c11.185
३ पहिला अक्षर 'कां' है परंतु मूल में स्पष्ट नहीं है.
c11.186
लिपिपत्र १४ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c11.187
४ ऍ. इं; जि. ६, पृ. ३१६ से ३१९ के बीच के ४ प्लेटों से.
c11.188
विजयखंधावारा नगरा कूटूरातो महेस्वरपादप-
रिगहिते बृहत्फलायनसगोत्तो राजा सिरिजय-
वंमो आनपयति कूटूरे वापतं अम्हे दानि
अम्हवेजयिके आयुवर्धनिके च बम्हनानं
गोतमसगोत्तजायापरस सवगुत्तजस ट तानवस
c11.189
लिपिपत्र १५ वां.
c11.190
यह लिपिपत्र हीरहडगल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र५ से तय्यार किया गया है. इसमें 'इ' और 'थ' की बिंदियों के स्थान में + चिह्न लगाये हैं. 'ए' की आकृति नागरी के 'व' (बिना सिर के) से कुछ कुछ मिलती हुई बन गई है. 'ब' की बांई तरफ़ की खड़ी लकीर को भीतर की ओर अधिक दबा कर बीच में गोलाई दी है. 'ब' का यह रूप दक्षिण की शैली की पिछली लिपियों में बराबर मिलता है. 'म्' को पंक्ति से नीचे लिखा है और उसके ऊपर के दोनों शृंगों के साथ सिर की छोटी लकीरें नहीं जोड़ी जो सस्वर 'म' के साथ जुड़ी हुई मिलती हैं. 'गा' के साथ 'आ' की मात्रा नीचे की तरफ़ से लगाई है.
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- Śuklayajurvedaprātiśākhya
- Diṭṭhivāya — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
- Uṣṇīṣavijayādhāraṇī — Sanskrit
- Sārnāth
- Piprahwa
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- Sāñcī
- Bharhut
- Nāsik
- Pitalkhora
- Jaugada
- Bhattiprolu
- Nasik Caves
- Junnar
- Saráhan
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- Girnar
- Bhâjâ
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- Nānāghāṭ
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- Bhattiprolu Stupa
- Mugdhabodha — Vopadeva, Sanskrit
- Amarāvatī inscription (No. 22) — Prakrit