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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.108

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.108

Language
Hindi

c11.108

यह लिपिपत्र भट्टिपोलु के स्तूप से निकले हुए पत्थर के ३ पात्रों के ढक्कनों पर खुदे हुए ६ लेखों से तथा स्फटिक के एक छोटे से टुकड़े पर, जो वहीं से मिला था, खुदे हुए लेख से तय्यार किया गया है.३ ‘अ’ से ‘सं’ तक के अक्षर उक्त नौ लेखों से और अंतिम ६ अक्षर (‘ग’ से ‘हि’ तक ) स्फटिक पर के लेख से लिये हैं, जिसकी लिपि पहिले तीन लिपिपत्रों की शैली की (ब्राह्मी) है. पाषाण के पात्रों पर खुदे हुए ६ लेखों की लिपि में ‘घ’, ‘द’, ‘भ’, ‘म’, ‘ल’, ‘ष’ और ‘ळ’ इन ७ अक्षरों में पहिले तीन लिपिपत्रों के अक्षरों से भिन्नता है (इन अक्षरों को लिपिपत्र १ से ३ तक के अक्षरों से मिलाकर देखो). दूसरा भेद यह है कि प्रत्येक व्यंजन जब स्वरों की मात्रा से रहित होता है तब उसके साथ दाहिनी ओर एक आड़ी लकीर लगाई गई है जैसे अशोक के लेखों में ‘आ’ की मात्रा लगाई जाती थी. यह लकीर बहुधा व्यंजन के अग्रभाग से सटी रहती है परंतु कभी कभी कुछ नीचे की तरफ़ और कभी मध्य में लगाई जाती है. ‘ज’ के साथ जब स्वर की कोई मात्रा नहीं होती तब वह अशोक के लेखों के ‘ज’ के समान होता है (बीच की आड़ी लकीर स्वरचिह्नरहित दशा की है); परंतु जब उसके साथ कोई स्वर की मात्रा लगी रहती है उस समय उसका रूप बहुधा [ मिलता है (देखो, जु, जू, जे, जं). इन भेदों से पाया जाता है कि उक्त लेखों की लिपि पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से नहीं निकली किंतु उस मूल लिपि से निकली होगी जिससे स्वयं पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि निकली है.४ संभवतः यह द्रविड (द्राविडी) लिपि हो.

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