Pramāṇa · Search · About · API

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.124

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.124

Language
Hindi

c11.124

यह लिपिपत्र कुशनवंशी राजाओं के समय के मथुरा१, सारनाथ२ और चारगांव३ से मिले हुए लेखों से तय्यार किया गया है. मथुरा के कई एक लेखों से अक्षर छांटे गये हैं, जिनमें कई अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं जो भिन्न भिन्न लेखकों की लेखन रुचि की भिन्नता प्रकट करते हैं. पहिली ‘इ’ में तीन बिंदियों के स्थान पर तीन आड़ी रेखाएं बना दी हैं और दूसरी ‘इ’ में दो आड़ी लकीरों के आगे दाहिनी ओर एक खड़ी लकीर बनाई है. ‘उ’ (पहिले) की दाहिनी ओर की आड़ी लकीर को नीचे की तरफ़ मोड़ा है. यही मोड़ बढ़ने पर नागरी का ‘उ’ बनता है (देखो, लिपिपत्र ८२ में नागरी ‘उ’ की उत्पत्ति). दूसरा व तीसरा ‘ए’ नागरी ‘ए’ से कुछ कुछ मिलने लगा है. ‘ए’ के पांचों रूप एक दूसरे से भिन्न हैं. ‘न’ के दूसरे रूप के मध्य में गांठ बनाई है जो क़लम को उठाये बिना पूरा अक्षर लिखने से ही बनी है. वैसा ही ‘न’ लिपिपत्र १२, १६, ३६, ३७, ३८, ३६ आदि में मिलता है. पहिले ‘प’, ‘ल’ और तीसरे ‘ष’ के रूप नागरी के ‘प’ ‘ल’ और ‘ष’ से किसी प्रकार मिलते हुए हैं. ‘वा’, ‘रा’ और ‘षा’ में ‘आ’ की मात्रा की आड़ी लकीर खड़ी या तिरछी हो गई है. ‘इ’ और ‘ई’ की मात्राओं के मूल चिह्न मिट कर उनके नये रूप बन गये हैं (देखो, णि, थि, वि, सी). ‘ए’ और ‘ऐ’ की मात्राएं नागरी के समान बन गई हैं. संयुक्ताक्षरों में दूसरे आने वाले ‘य’ का मूल रूप नष्ट हो कर नागरी के ‘द्य’ से मिलता जुलता रूप बन गया है, परंतु सारनाथ के लेख में उसका मूल रूप और चारगांव के लेख में दोनों रूप काम में लाये गये हैं.