भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.163
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.163
- Language
- Hindi
c11.163
भाजा के लेख में ‘ठ’ को त्वरा से लिखने के कारण उसकी आकृति वृत्त सी न बन कर उससे भिन्न बन गई है. महाड के लेख में ‘म’ की आकृति दो अलग अलग अंशों में विभक्त हो गई है. वास्तव में ये दोनों अंश जुड़ने चाहिये थे. कन्हेरी के लेख के ‘लो’ के साथ लगी हुई ‘ओ’ की मात्रा (कलम को उठाये बिना मात्रा सहित अक्षर लिखने के कारण) गांठवाली बन गई है और दक्षिणी शैली के पिछले कई लेखों में ऐसा ही ‘लो’ मिलता है (देखो लिपिपत्र ३६, ४३, ४४, ४६, ४७ आदि). यदि कलम को उठा कर मात्रा का चिह्न लगाया जाता तो ‘लो’ की आकृति लिपिपत्र छठे में मथुरा के लेखों से दी हुई ‘लो’ की आकृति से मिलती हुई होनी चाहिये थी. कार्ले के लेख में ‘न’ अक्षर की जो आकृति मिलती है वह भी कलम को उठाये बिना पूरा अक्षर लिखने से ही बनी है परंतु कलम को ऊपर की तरफ़ न बढ़ा नीचे की तरफ़ बढ़ाकर आड़ी लकीर खींची है जिससे ग्रंथिकावाला रूप (जैसा कि लिपिपत्र ६, ३६, ३७, ३८, ३६ आदि में है) न बन कर यह नया विलक्षण रूप बन गया है, जिसके परिवर्तित रूप लिपिपत्र १३ और १४ में मिलते हैं. जुन्नर के लेख में ‘मि’ में जो ‘म’ का रूप मिलता है उसीके परिवर्तित रूप से लिपिपत्र १३ और १४ में दिये हुए ‘म’ के विलक्षण रूप बने हैं, जो अन्य लेखों में नहीं मिलते. ‘व’ और ‘म’ के सिर त्रिकोण आकृति के (भीतर से खाली) बने हैं और कहीं ‘इ’ और ‘ई’ की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न करने से उनकी आकृतियां पहिले से अधिक विलक्षण हो गई हैं (देखो, रि, रि, लि, वी). ‘द्य’ में प्रथम ‘घ’ तो प्राचीन रूप का और दूसरा ‘घ’ नागरी से मिलता हुआ है जो कलम को उठाये बिना ही पूरा अक्षर लिखने से बना है. नासिक के लेखों के अक्षरों में ‘म्’ के साथ लगी हुई ‘ऊ’ की मात्रा के दोनों छोर एक दूसरे के साथ मिल गये हैं और ‘न्ये’ में ‘य’ को ‘न्’ की खड़ी लकीर के मध्य में जोड़ा है. कुड़ा के लेखों के