भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c11.40
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.40
- Language
- Hindi
c11.40
२ वर्गों के पहिले चार वर्षों का जब किसी वर्ग के पांचवें वर्ग से संयोग होता है तब उस अनुनासिक वर्ण के पहिले वैदिक काल में एक विलक्षण ध्वनि होती थी जिसे यम कहते थे, जैसे 'पत्नी' में 'त्' और 'न्' के बीच में. इस तरह बीस यम होने चाहियें, परंतु प्रातिशाख्यों में तथा शिक्षाओं में चार ही यम माने हैं और उनके नाम या संकेत 'कुं', 'खुं', 'गुं' और 'घुं' दिये हैं. इसका तात्पर्य यह है कि वर्गों के पहिले अक्षरों अर्थात् क, च, ट, त, प के संयोग से जो यम उत्पन्न होता था वह 'क्' कहलाता था, और उसके लिये एक चिह्न नियत था. इसी तरह ख, छ, ठ, थ, फ के संयोग से उत्पन्न होनेवाले यम के लिये 'ख्' प्रकृति का चिह्न, ग, ज, ड, द, व के संयोग से बने हुए यम के लिये 'ग्' प्रकृति का कोई तीसरा चिह्न, और घ, झ, ढ, ध, भ के संयोग से उद्धृत यम के लिये 'घ्' प्रकृति का कोई और चिह्न नियत था. ये चिह्न कैसे थे इसका पता न तो शिलालेखादि में और न पुस्तकों में मिलता है, किंतु व्याकरणवाले इन यमों को क, ख, ग, घ से बतलाते हैं, जैसे—