भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c11.44
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.44
- Language
- Hindi
c11.44
५ जैनों के दृष्टिवाद में, जो लुप्त हो गया है, ब्राह्मी अक्षरों की संख्या ४६ मानी है, (वे; इं. स्ट, १६, २८१), जो अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ (या क्ष) होने चाहियें. हुएन्त्संग अक्षरों की संख्या ४७ बतलाता है (बी; बु. रे. वे. घ; जिल्द १, पृ. ७८), जो 'अ' से 'ह' तक के ४५ अक्षर तो ऊपर लिखे अनुसार और बाकी के दो अक्षर 'क्ष' और 'ज्ञ' होने चाहियें. बौद्ध और जैनों के प्राकृत ग्रंथों में ऋ, ऋ, लृ, लॄ इन चार स्वरों का प्रयोग नहीं है. प्राकृत साहित्य में इनकी आवश्यकता ही नहीं रहती. जहां संस्कृत शब्द के प्रारंभ में 'ऋ' होता है वहां प्राकृत में 'रि' हो जाता है (ऋषभ=रिखभ, ऋक्ष=रिच्छ या रिक्ख), और जहां व्यंजन के साथ 'ऋ' की मात्रा लगी होती है वहां 'ऋ' के स्थान में 'अ', 'इ' या 'उ' हो जाता है (मृग=मग, तृषा=तिसा, सुवर्ण=सुहंग; निभृत=निहुअ ). ये चारों वर्ण (ऋ, ॠ, लृ, लॄ) अब भी साधारण लोगों के व्यवहार में नहीं आते और प्रारंभिक पढ़ने वालों की 'बारहखड़ी' (द्वादशाक्षरी) में भी इनको स्थान नहीं मिलता. यह प्रारंभिक पठनशैली आधुनिक नहीं है; किंतु अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में भी ऐसी ही थी, क्योंकि बुद्धगया के अशोक के समय के बने हुए महाबोधी मंदिर के पास बुद्ध के चंक्रम अर्थात् भ्रमणस्थान में दोनों ओर ११, ११ स्तंभों की दो पंक्तियां हैं उन स्तंभों की कुंभियों (आधार) पर शिल्पियों ने एक एक करके 'अ' को छोड़ कर 'क' से 'ह' तक के अक्षर खोदे हैं. उनमें भी ये चारों स्वर नहीं है. यद्यपि सामान्य लोगों के व्यवहार में ये चार वर्ण नहीं आते थे तो भी वर्णमाला में उनको स्थान अवश्य मिलता था, क्योंकि जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध मठ में रक्खी हुई ई. स. की छठी शताब्दी की 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई बौद्ध पुस्तक के अंत में जिस लेखक ने वह पुस्तक लिखी है उसीके हाथ की लिखी हुई उस समय की पूरी वर्णमाला है जिसमें इन चार वर्णों को स्थान दिया गया है (देखो, लिपिपत्र १६). ऐसे ही हन्नाकोल से मिले हुए ई. स. की १२ वीं शताब्दी के बौद्ध तांत्रिक शिलालेख में प्रत्येक वर्ण पर अनुस्वार लगा कर पूरी वर्णमाला के बीज बनाए हैं जिनमें भी ये चारों वर्ण हैं (लिपिपत्र ३५) और उदयादित्य के समय के उज्जैन के शिलालेख के अंत में खुदी हुई पूरी वर्णमाला में भी ये चारों वर्ण दिये हुए हैं (देखो लिपिपत्र २५).