भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c11.60
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.60
- Language
- Hindi
c11.60
अशोक के समय ऋ, ॠ, ऌ और ॡ की मात्राओं के चिह्न कैसे थे इसका पता नहीं लगता इतना ही नहीं, किंतु पिछले लेखों में भी ‘ॠ’ और ‘ॡ’ की मात्राओं के चिह्नों का कहीं पता नहीं है. ‘ऋ’ की मात्रा का चिह्न पहिले पहिल ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में मिलता है (देखो, लिपिपत्र ६ में मथुरा के लेखों के अक्षरों में ‘गृ’, ‘घृ’ और ‘वृ’; लिपिपत्र ७ में ‘कृ’ और ‘वृ’; और लिपिपत्र आठवें में ‘कृ’, ‘गृ’ और ‘वृ’ ). संयुक्त व्यंजनों में कितने एक स्थानों में पहिले उच्चारण होनेवाले को ऊपर और पीछे उच्चारण होनेवाले को उसके नीचे जोड़ा है (देखो, म्य, म्हि, र्व, स्ति, स्व) जो शुद्ध है, परंतु कहीं कहीं दूसरे को ऊपर और पहिले को नीचे लिखा है (देखो, त्र, त्या, व्यो, स्टा, स्ना) जो अशुद्ध है, और यह प्रकट करता है कि लेखक शुद्ध लिखना नहीं जानता था. हमने उन अक्षरों के ऊपर वर्तमान नागरी के शुद्ध अक्षर जान कर दिये हैं, जैसे खुदे हैं वैसा अक्षरांतर नहीं किया. ‘क्र’ में ‘र’ को अलग नहीं जोड़ा किंतु ‘क’ की खड़ी लकीर को ‘र’ का रूप देकर उसके साथ आड़ी लकीर जोड़ दी है. ऐसे ही ‘ब्र’ में ‘ब’ की बाईं तरफ़ की खड़ी लकीर की भीतर दबा कर उसमें कोण बना दिया है. ऐसे रूप अशोक के किसी दूसरे लेख में अथवा पिछले लेखों में कहीं नहीं मिलते.