भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c12: ६—गुप्तलिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c12
- Language
- Hindi
६—गुप्तलिपि
c12.1
ई. स. की चौथी और पांचवीं शताब्दी ( लिपिपत्र १५-१७ ).
c12.2
गुप्तों के राज्य के समय सारे उत्तरी भारत में ब्राह्मी लिपि का जो परिवर्तित रूप प्रचलित था उसका कल्पित१ नाम 'गुप्तलिपि' रक्खा गया है. यह लिपि गुप्तवंशी राजाओं के, जो उत्तरी भारत के बड़े हिस्से के स्वामी थे, लेखों में, एवं उनके समकालीन परिव्राजक और राजर्षितुल्य वंशियों तथा उच्चकल्प के महाराजाओं के दानपत्रादि में, जो अधिकतर मध्यभारत से और कुछ मध्यप्रदेश से मिले हैं, पाई जाती है. ऐसे ही उक्त समय के अन्य राजवंशियों तथा साधारण पुरुषों के लेखादि में भी मिलती है. राजपूताना,२ मध्यभारत३ तथा मध्यप्रदेश४ में गुप्तकाल में भी कहीं कहीं दक्षिणी शैली की ( पश्चिमी ) लिपि भी मिल आती है, जिसका एक कारण यह भी है कि लेख को लिखने के लिये बहुधा सुंदर अक्षर लिखनेवाला पसंद किया जाता है और वह जिस शैली की लिपि का ज्ञाता होता है उसीमें लिखता है. देशभेद और समय के साथ भी अक्षरों की आकृति में कुछ अंतर पड़ ही जाता है और उसीके अनुसार लिपियों के उपविभाग भी किये जा सकते हैं परंतु हम उनकी आवश्यकता नहीं समझते.
c12.3
१ गुप्तलिपि का ही नहीं परंतु पृ. ४२-४४ में ब्राह्मीलिपि के विभागों के जो नाम रक्खे गये हैं वे बहुधा सब ही कल्पित हैं और अक्षरों की आकृति, देश या उन लिपियों से निकली हुई वर्तमान लिपियों के नामों से ही उनके नामों की कल्पना की गई है. इसी तरह उनके लिये जो समय माना गया है वह भी अनुमानिक ही है क्योंकि कई अक्षरों के वे ही रूप अनुमान किये हुए समय से पहिले और पीछे भी मिलते हैं.
c12.4
२ राजपूताने में बहुधा लेख उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु गंगधार ( झालावाड़ राज्य में ) से मिला हुआ वि. सं. ४८० ( ई. स. ४२३ ) का लेख ( फ्ली; गु. इं ; लेखसंख्या १७ ), जो विश्ववर्मन् का है, दक्षिणी शैली की लिपि का है और बयाने ( भरतपुरराज्य में ) के क़िले ( विजयगढ़ ) में विष्णुवर्द्धन के पुंडरीक यज्ञ के यूप ( = स्तंभ ) पर खुदे हुए लेख ( फ्ली ; गु. इं ; लेखसंख्या ५६ ) में, जो वि. सं. ४२८ ( ई. स. ३७२ ) का है, दक्षिणी शैली का कुछ मिश्रण पाया जाता है.
c12.5
३ मध्यभारत में भी गुप्तकाल के लेख बहुधा उत्तरी शैली के ही मिलते हैं परंतु कहीं कहीं दक्षिणी शैली के भी मिल आते हैं; जैसे कि चंद्रगुप्त ( दूसरे ) का सांची का लेख ( फ्ली ; गु. इं ; लेखसंख्या ५ ); नरवर्मन् का मंदसोर से मिला हुआ मालव ( विक्रम ) सं. ४६१ का ( ऐ. इं ; जि. १२, पृ. ३२०-२१ ) और कुमारगुप्त के समय का मालव ( विक्रम ) सं. ५२६ का (फ्ली ; गु. इं ; लेखसंख्या १८) लेख. उदयगिरि से मिला हुआ चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख ( फ्ली; गु. इं ; लेख-संख्या ६ ) उत्तरी शैली की लिपि का है, परंतु वहीं से मिला हुआ उसी राजा के समय का दूसरा लेख ( फ्ली ; गु. इं ; लेख-संख्या ३ ) दक्षिणी शैली का है और वहीं से मिले हुए तीसरे लेख की ( फ्ली ; गु. इं ; लेखसंख्या ६१ ), जो गुप्त संवत् १०६ ( ई. स. ४२५-६ ) का है, लिपि उत्तरी शैली की होने पर भी उसमें दक्षिणी शैली का कुछ कुछ मिश्रण पाया जाता है. इस प्रकार एक ही स्थान के लेखों में भिन्न शैली की लिपियों का मिलना यही बतलाता है कि उनके लेखक भिन्न लिपियों के ज्ञाता थे न कि देशभेद ही इस अंतर का कारण था.
c12.6
४ मध्यप्रदेश में भी गुप्तों के समय उत्तरी शैली की लिपि का प्रचार था परंतु कोई कोई लेख दक्षिणी शैली के भी मिल आते हैं; जैसा कि एरन से मिला हुआ समुद्रगुप्त के समय का लेख ( फ्ली ; गु. इं ; लेखसंख्या २ ), परंतु वहीं से मिले हुए बुधगुप्त और गोपराज के लेख उत्तरी शैली के हैं ( फ्ली ; गु. इं ; लेखसंख्या १६ और २० ).
c12.7
गुप्तों के समय में कई अक्षरों की आकृतियां नागरी से कुछ कुछ मिलती हुई होने लगीं. सिरों के चिह्न जो पहिले बहुत छोटे थे बढ़ कर कुछ लंबे बनने लगे और स्वरों की मात्राओं के प्राचीन चिह्न लुप्त हो कर नये रूपों में परिणत हो गये हैं.
c12.8
लिपिपत्र १६ वां.
c12.9
यह लिपिपत्र गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के इलाहाबाद के स्तंभ के लेख१ से तय्यार किया गया है. इसमें 'इ' का चिह्न दो बिंदियों के आगे एक खड़ी लकीर है. 'उ' की खड़ी लकीर में वक्रता है और नीचे की आड़ी लकीर गोलाई के साथ दाहिनी तरफ़ ऊपर की ओर मुड़ी है, जैसा कि दक्षिणी शैली की लिपियों में पाया जाता है. ड, ढ, त, द, प, भ, म और 'ष' (पहिले) के रूप नागरी से कुछ मिलने लगे हैं. 'ष' (दूसरे) और 'स' के रूपों की आकृतियां कुछ विलक्षण हैं.
c12.10
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c12.11
महाराजश्रीगुप्तप्रपौत्रस्य महाराजश्रीघटोत्कचपौत्रस्य महाराजा-
धिराजश्रीचन्द्रगुप्तपुत्रस्य लिच्छविदौहित्रस्य महादेब्यां कुमारदे-
व्यामुत्प(त्प)न्नस्य महाराजाधिराजश्रीसमुद्रगुप्तस्य सब्व्वपृथिवीविजय-
जनितोदयव्याप्तनिखिलावनितलां कीर्त्तिमितस्त्रिदशपतिभवनगमनावा-
प्तलब्धि(डि=लि)तसुखविचरणामाचक्षाण इव भुवो बाहुरयमुच्छ्रितः
स्तम्भः यस्य। प्रदानभुजविक्रमप्रशमशास्त्रवाक्योदयैरुपर्युपरिस-
ञ्चयोच्छ्रितमनेकमार्गं यशः पुनाति भुवनत्रयं पशुपतेर्जंटान्तर्गहा-
c12.12
लिपिपत्र १७ वां.
c12.13
१ फ्ली; गु. इं; प्लेट १.
c12.14
यह लिपिपत्र गुप्तों के राजत्वकाल के उदयगिरि२, मिहरौली३, बिलसद्४, करंडांडा५ और कुड़ा६ के शिलालेखों तथा महाराज लक्ष्मण और जयनाथ के दानपत्रों७ से तय्यार किया गया है और इसमें केवल मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं. उदयगिरि के लेख में पहिले पहिल जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के चिह्न मिलते हैं, जो क्रमशः 'क' और 'पा' के ऊपर उक्त अक्षरों से जुड़े हुए लगे हैं. मिहरौली के लेख में कितने एक अक्षर समकोणवाले हैं. 'स्थि' और 'स्थे' में 'स' की आकृति कुछ विलक्षण हो गई है. ऐसे ही 'स्थि' में 'थ' अक्षर का रूप 'छ' से मिलता हुआ है न कि 'थ' से. बिलसद् के लेख में स्वरों की उन मात्राओं में, जो अक्षरों के ऊपर लगती हैं, अधिक विकास पाया जाता है और उन्हीं के परिवर्तन से कुटिल लिपि में उनके विलक्षण लंबे रूप बने हैं. करंडांडा के लेख में 'म' की आकृति विलक्षण बनाई है. महाराज लक्ष्मण के पाली गांव के दानपत्र में कहीं कहीं सिरों तथा खड़ी, आड़ी या तिरछी लकीरों के अंतिम भाग को चीर दो हिस्से बनाकर अक्षरों में सुंदरता लाने का यत्न किया है. 'म' के नीचे के ग्रंथिवाले हिस्से को बाईं तरफ़ बढ़ा कर लंबी लकीर का रूप दिया है और 'न्र' में 'र' को नागरी की 'उ' की मात्रा के समान ग्रंथित बनाया है. जयनाथ के दानपत्र में 'इ' की तीन बिंदियों में से ऊपर की बिंदी के स्थान में आड़ी लकीर बनाई है. 'इ' के इसी रूप के परिवर्तन से पीछे से नागरी की 'इ' बनी है (देखो लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). तोरमाण के कुड़ा के लेख के अक्षरों में 'ग' की बाईं तरफ़ की खड़ी लकीर को बांईं ओर ऊपर की तरफ़ मोड़ा है जिससे उक्त अक्षर का रूप वर्तमान नागरी के 'ग' से मिलता हुआ बन गया है, केवल सिर की आड़ी लकीर का ही अभाव है.
c12.15
२ फ्ली; गु. इं; प्लेट ४ (A).
c12.16
३ फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ (A).
c12.17
४ फ्ली; गु. इं; प्लेट ५.
c12.18
५ ऐ. इं; जि. १०, पृ. ७१ के पास का प्लेट.
c12.19
६ ऐ. इं; जि. १, पृ. २४० के पास का प्लेट.
c12.20
७ लक्ष्मण का दानपत्र-ऐ. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास का प्लेट; और जयनाथ का दानपत्र-फ्ली; गु. इं; प्लेट १६.
c12.21
लिपिपत्र १७ वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—
c12.22
ओं स्वस्ति जयपुरात्परममाहेश्वरः श्रीममहाराजलक्ष्म-
णः कुशली फेलापर्व्वतिकाग्रामे ब्राह्मणादीन्प्रतिवासिकु-
टुम्बिनः समाज्ञापयति विदितं वोस्तु यथैष ग्रा-
मो मया मतापित्रोरात्मनश्च पुण्याभिवृद्धये कौत्सस-