भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c12.14
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c12.14
- Language
- Hindi
c12.14
यह लिपिपत्र गुप्तों के राजत्वकाल के उदयगिरि२, मिहरौली३, बिलसद्४, करंडांडा५ और कुड़ा६ के शिलालेखों तथा महाराज लक्ष्मण और जयनाथ के दानपत्रों७ से तय्यार किया गया है और इसमें केवल मुख्य मुख्य अक्षर ही उद्धृत किये गये हैं. उदयगिरि के लेख में पहिले पहिल जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के चिह्न मिलते हैं, जो क्रमशः 'क' और 'पा' के ऊपर उक्त अक्षरों से जुड़े हुए लगे हैं. मिहरौली के लेख में कितने एक अक्षर समकोणवाले हैं. 'स्थि' और 'स्थे' में 'स' की आकृति कुछ विलक्षण हो गई है. ऐसे ही 'स्थि' में 'थ' अक्षर का रूप 'छ' से मिलता हुआ है न कि 'थ' से. बिलसद् के लेख में स्वरों की उन मात्राओं में, जो अक्षरों के ऊपर लगती हैं, अधिक विकास पाया जाता है और उन्हीं के परिवर्तन से कुटिल लिपि में उनके विलक्षण लंबे रूप बने हैं. करंडांडा के लेख में 'म' की आकृति विलक्षण बनाई है. महाराज लक्ष्मण के पाली गांव के दानपत्र में कहीं कहीं सिरों तथा खड़ी, आड़ी या तिरछी लकीरों के अंतिम भाग को चीर दो हिस्से बनाकर अक्षरों में सुंदरता लाने का यत्न किया है. 'म' के नीचे के ग्रंथिवाले हिस्से को बाईं तरफ़ बढ़ा कर लंबी लकीर का रूप दिया है और 'न्र' में 'र' को नागरी की 'उ' की मात्रा के समान ग्रंथित बनाया है. जयनाथ के दानपत्र में 'इ' की तीन बिंदियों में से ऊपर की बिंदी के स्थान में आड़ी लकीर बनाई है. 'इ' के इसी रूप के परिवर्तन से पीछे से नागरी की 'इ' बनी है (देखो लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). तोरमाण के कुड़ा के लेख के अक्षरों में 'ग' की बाईं तरफ़ की खड़ी लकीर को बांईं ओर ऊपर की तरफ़ मोड़ा है जिससे उक्त अक्षर का रूप वर्तमान नागरी के 'ग' से मिलता हुआ बन गया है, केवल सिर की आड़ी लकीर का ही अभाव है.