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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c13.22

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c13.22

Language
Hindi

c13.22

१४ प्रतिहार राजा नागभट का बुचकला का लेख वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) का (एं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास प्लेट); बाउक का जोधपुर का वि. सं. ८९४ (ई. सं. ८३७) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६४ पृ. ४); कक्कुक का घटिआले का वि. सं. ९१४ (ई. स. ८६१) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५ पृ. ५१६); भोजदेव (प्रथम) का वि. सं. ६०० का दानपत्र (एं. इं; जि. ५ पृ. २११-२); और ५ शिला लेख; जिन में से देवगढ़ का वि. सं. ९१६ (ई. स. ८६२) का (एं. इं; जि. ४, पृ. ३१०), ग्वालियर से मिले हुए तीन लेखों में से एक वि. सं. ६३२ (ई. स. ८७५) का (एं. इं; जि. १, पृ. १५६-७), दूसरा वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७७) का (एं. इं; जि. १; पृ. १६० के पास का प्लेट) और तीसरा बिना संवत का (आ. स. इं; ई. स. १६०३-४, प्लेट ७२), और पहोवा से मिला हुआ हर्ष संवत २७६ (ई. स. ८८२) का लेख (एं. इं; जि १, पृ. १८६-८). प्रतिहार वंशी राजा भोज के लेखों तथा उसके पीछे के महेन्द्रपाल (प्रथम), महीपाल, आदि के लेखों की लिपियों में कोई स्पष्ट अंतर नहीं है तो भी लिपियों के विभागों के कतिपय समय के अनुसार भोजदेव (प्रथम) तक के लेखों की लिपि की गणना कुटिललिपि में करनी पड़ी है.