भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c13: ७—कुटिल लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c13
- Language
- Hindi
७—कुटिल लिपि
c13.1
ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी ( लिपिपत्र १८ से २३ ).
c13.2
१ ये मूल पंक्तियां पाली गांव से मिले हुए महाराज लक्ष्मण के दानपत्र (एं. इं; जि. २, पृ. ३६४ के पास के प्लेट ) से उद्धृत की गई हैं.
c13.3
ई. स. की छठी से नवीं शताब्दी तक की बहुधा सारे उत्तरी भारतवर्ष की लिपि का, जो गुप्तलिपि का परिवर्तित रूप है, नाम 'कुटिललिपि' कल्पना किया गया है. 'कुटिलाक्षर' नाम का प्राचीन प्रयोग२ भी मिलता है परंतु वह भी उसके वर्षों और विशेष कर मात्राओं की कुटिल आकृतियों के कारण रक्खा गया हो ऐसा अनुमान होता है३. इस लिपि के अक्षरों के सिर बहुधा ऐसे होते हैं परंतु कभी कभी छोटी सी आड़ी लकीर से भी वे बनाये जाते हैं. य, आ, घ, प, म, य, ष और 'स' का ऊपर का अंश दो विभागवाला होता है और बहुधा प्रत्येक विभाग पर सिर का चिह्न जोड़ा जाता है.
c13.4
२ देवल (युक्तप्रदेश में पीलीभीत से २० मील पर) गांव से मिली हुई वि. सं. १०४६ (ई. स. ६६२) की प्रशस्ति में 'कुटिलाक्षराणि' (विष्णुरेनमनंगने च लिखिता गौडेन करणिकेनैषा। कुटिलाक्षराणि विदुषा तच्चादित्याभिधानेन ॥ ऍ. इं; जि. १, पृ. ८१) और विक्रमांकदेवचरित में 'कुटिललिपिशिः' (नौ कायस्थैः कुटिललिपिमिनों विटैश्चाटदग्धेः १८, ४२) लिखा मिलता है. उनमें 'कुटिल' शब्द क्रमशः अक्षरों तथा लिपि का विशेषण है, परंतु उनमें उस समय की नागरी की, जो कुटिल से मिलती हुई थी, 'कुटिल' संज्ञा मानी है. मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय की वि. सं. ७१८ (ई. सं. ६६१) की प्रशस्ति के अक्षरों को 'विकटाक्षर' कहा है (यशोभटेन पूज्यमुतकीयैषां विकटाक्षरा ॥ ऍ. इं; जि. ४, पृ. ३२), और अस्पद के लेख में (फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ४२) 'विकटाक्षराणि' लिखा मिलता है. 'विकट' और 'कुटिल' दोनों पर्याय हैं और अक्षरों की आकृति के सूचक हैं.
c13.5
३ कुटिललिपि में अक्षरों की खड़ी रेखाएं नीचे की तरफ बाईं ओर मुड़ी हुई होती हैं और स्वरों की मात्राएं अधिक टेढ़ी मेढ़ी तथा लंबी होती हैं इसी से उसका नाम कुटिल पड़ा.
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यह लिपि मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्म्मन् के लेखों४, महानामन् के बुद्धगया के लेखों५, मौखरियों के लेख और मुद्रा१, वर्मलात के समय के वसंतगढ़ के लेख२, राजा हर्ष के दानपत्रादि३, नेपाल के अंशुवर्मन् के लेखों४, मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य और अपराजित के लेखों५, मगध के गुप्तवंशी आदित्यसेन और जीवितगुप्त (दूसरे) के लेखों६, कुदारकोट के लेख७, झालरापाटन से मिले हुए राजा दुर्गगण के लेखों८, कोटा के निकट कणस्वा (कणवाश्रम) के मंदिर में लगी हुई राजा शिवगण की प्रशस्ति९, बनारस से मिले हुए पंथ के लेख१०, कामां (कामवन) से मिले हुए यादवों के लेख११, लाखामंडल की प्रशस्ति१२, चंबा राज्य से मिले हुए राजा मेरुवर्मन् के लेखों१३, राजपूताना और मालवे से मिले हुए प्रतिहार (पड़िहार) वंशियों के लेखादि१४
c13.7
४ राजा यशोधर्मन् के तीन लेख मंदसोर से मिले हैं जिनमें से एक मालव(विक्रम) सं. ५८६ (ई. स. ५३२) का है (फ्ली; गु. इं; प्लेट २१ B, C, और २२).
c13.8
५ महानामन नामवाले दो लेख बुद्धगया से मिले हैं (फ्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A और B) जिनमें से एक में संवत् २६६ है. यदि यह गुप्त संवत् माना जावे तो इसका समय ई. स. ५८८-६ होगा.
c13.9
१ मौखरी (मुखर)वंशी राजा ईशानवर्मन् का हड़ाहा का शिलालेख वि. सं ६११ (ई. स. ५५४) का है (सरस्वती, ई. स. १६१६, पृ. ८१-८३). आसीरगढ़ से मिली हुई ईशानवर्मन के पुत्र शर्ववर्मन् की मुद्रा में कोई संवत् नहीं है (फ्ली; गु. इं; सेट ३० A). अनंतवर्मन् के बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाओं के लेखों (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३० B, ३१ A और B) में भी संवत् नहीं मिलता परंतु उसका ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास होना अनुमान किया जा सकता है. जौनपुर का लेख भी, जिसका प्रारंभ का हिस्सा बचने नहीं पाया, संभवतः उपर्युक्त ईशानवर्मन् के समय का हो (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ A).
c13.10
२ यह लेख वि. सं. ६८२ (ई. स. ६२५-६) का है (एं. इं; जि. ९, पृ. १९० के पास का प्लेट).
c13.11
३ बैसवंशी राजा हर्ष का बांसखेड़ा का दानपत्र हर्ष संवत् २२ (वि. सं. ६८२-६) का (एं. इं; जि. ४, पृ. २१० के पास का प्लेट) और मधुवन से मिला हुआ दानपत्र हर्ष संवत् २५ (ई. स. ६३१) का है (एं. इं; जि. १, पृ. ७२-७३). सोनपत से मिली हुई उक्त राजा की मुद्रा (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३२ B) में संवत् नहीं है.
c13.12
४ अंशुवर्मन् के समय के लेखों में से एक में संवत् ३१६ (या ३१८?) है (इं. एं; जि. १४, पृ. ६८. बें; ज. ने; पृ. ७४) जिसको गुप्त संवत् माना जावे तो उसका समय ई. स. ६३५-६ (या ६३७-८?) होगा. उसके दूसरे लेखों में संवत् ३४, ३६, ४५ (?) और ४८ मिलते हैं (बं; ज. ने; पृ; ४. इं. एं; जि. ६, पृ. १७०-७१). यदि इन संवतों को हर्ष संवत् मानें तो इनका समय ई. सं. ६४० से ६५४ तक स्थिर होगा.
c13.13
५ मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा शीलादित्य (शील) के समय का एक शिला लेख वि. सं. ७०३ (ई. स. ६४६) का मेवाड़ के भोमट इलाके के सामोली गांव से मिला है जो मैंने राजपूताना म्युज़िअम (अजमेर) को भेट किया. यह लेख अभी तक छपा नहीं है. राजा अपराजित का लेख वि. सं. ७१८ (ई.स. ६६१) का है (एं. इं; जि. ४, पृ. ३० के पास का सेट).
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६ आदित्यसेन के समय के तीन लेखों में से दो में संवत् नहीं है (फ्ली; गु. इं; सेट २८, और पृ. २१२) परंतु तीसरा जो शाहपुर से मिली हुई सूर्य की मूर्ति के आसन पर खुदा है [हर्ष] संवत् ६६ (ई. स. ६७२) का है (फ्ली; गु. इं; सेट २६ A). आदित्यसेन के प्रपौत्र जीवितगुप्त (दूसरे) के समय का एक लेख देवबर्नाकं से मिला है वह भी बिना संवत् का है (फ्ली; गु. इं; सेट २६ B).
c13.15
७ कुदारकोट के लेख में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि आदि से उसका समय ई. स. की सातवीं शताब्दी अनुमान किया जा सकता है (एं. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का सेट).
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८ झालरापाटन से मिले हुए राजा दुर्गगण के दो लेख एक ही शिला पर दोनों ओर खुदे हैं जिनमें से एक वि. सं. ७४६ (ई. स. ६८६) का है (एं. एँ; जि. ५, पृ. १८१-८२ के बीच के प्लेट).
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९ शिवगण की कणस्वा की प्रशस्ति वि. सं. ७९५ (ई. स. ७३८) की है (इं. एँ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
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१० इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास की अनुमान की जा सकती है (एं. इं; जि. ६, पृ. ६० के पास का सेट).
c13.19
११ इस लेख में संवत् नहीं है परंतु इसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है (इं. एँ; जि. १०, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
c13.20
१२ मढ़ा के लखामंडल नामक मंदिर की प्रशस्ति में संवत् नहीं है परंतु उसकी लिपि ई. स. की आठवीं शताब्दी के आसपास की प्रतीत होती है (एं. इं; जि. १, पृ. १२ के पास का प्लेट).
c13.21
१३ मेरुवर्मन् के पांच लेखों में से एक शिला पर (बो; पॅ. चं. स्टे; प्लेट ११) और चार पित्तल की मूर्तियों के आस-नों पर खुदे हुए मिले हैं (वॊ; ऍ. चं. स्टे; प्लेट १०). उन सब में संवत् नहीं है परंतु लिपि के आधार पर उनका समय ई. स. की आठवीं शताब्दी माना जा सकता है.
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१४ प्रतिहार राजा नागभट का बुचकला का लेख वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) का (एं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास प्लेट); बाउक का जोधपुर का वि. सं. ८९४ (ई. सं. ८३७) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६४ पृ. ४); कक्कुक का घटिआले का वि. सं. ९१४ (ई. स. ८६१) का (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५ पृ. ५१६); भोजदेव (प्रथम) का वि. सं. ६०० का दानपत्र (एं. इं; जि. ५ पृ. २११-२); और ५ शिला लेख; जिन में से देवगढ़ का वि. सं. ९१६ (ई. स. ८६२) का (एं. इं; जि. ४, पृ. ३१०), ग्वालियर से मिले हुए तीन लेखों में से एक वि. सं. ६३२ (ई. स. ८७५) का (एं. इं; जि. १, पृ. १५६-७), दूसरा वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७७) का (एं. इं; जि. १; पृ. १६० के पास का प्लेट) और तीसरा बिना संवत का (आ. स. इं; ई. स. १६०३-४, प्लेट ७२), और पहोवा से मिला हुआ हर्ष संवत २७६ (ई. स. ८८२) का लेख (एं. इं; जि १, पृ. १८६-८). प्रतिहार वंशी राजा भोज के लेखों तथा उसके पीछे के महेन्द्रपाल (प्रथम), महीपाल, आदि के लेखों की लिपियों में कोई स्पष्ट अंतर नहीं है तो भी लिपियों के विभागों के कतिपय समय के अनुसार भोजदेव (प्रथम) तक के लेखों की लिपि की गणना कुटिललिपि में करनी पड़ी है.
c13.23
तथा कई अन्य लेखों में; एवं जापान के होर्यूज़ी नामक स्थान के बौद्ध मठ में रक्खी हुई 'प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र' और 'उष्णीषविजयधारणी'१ तथा मि. बावर की प्राप्त की हुई हस्त लिखित पुस्तकों२ में भी मिलती है.
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यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्म्मन् (विष्णुवर्द्धन) के मालव (विक्रम) सं. ५८६ (ई. स. ५३२) के शिलालेख३ से तय्यार किया गया है. इसमें 'अ' वर्त्तमान दक्षिणी शैली के नागरी 'अ' से मिलता हुआ है. 'औ' पहिले पहिल इसी लेख में मिलता है. 'उ, च, ड, ढ, त, द, न, प, भ, र, ल, ष, स और 'ह' अक्षरों के रूप वर्त्तमान नागरी के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. हलंत व्यंजनों को सिरों की पंक्ति से नीचे नहीं किंतु सस्वर व्यंजनों के साथ समान पंक्ति में ही लिखा है परंतु उनके सिर उनसे जुड़े हुए नहीं किंतु विलग ऊंचे धरे हैं और 'त्' के नीचे नागरी की 'उ' की मात्रा का सा चिह्न और बढ़ा दिया है. 'आ' की मात्रा तीन प्रकार की मिलती है जिनमें से एक रूप वर्त्तमान नागरी की 'आ' की मात्रा से मिलता हुआ है (देखो, ना, मा). 'इ' की मात्रा चार प्रकार से लगी है जिनमें से एक वर्त्तमान नागरी की 'इ' की मात्रा के समान है (देखो, 'कि'). 'ई' की मात्रा का जो रूप इस लेख में मिलता है उसका अंत नीचे की तरफ़ और बढ़ाने से वर्त्तमान नागरी की 'ई' की मात्रा बन जाती है (देखो, 'की'). 'उ' और 'ऋ' की मात्राएं नागरी के समान हो गई हैं (देखो, दु, रु, वृ, वृ,). 'ए' की मात्रा नागरी से मिलती हुई है परंतु अधिक लंबी और कुटिल आकृति की है. (देखो, 'ने'). 'ऐ' की मात्रा की कहीं नागरी की नाईं दो तिरछी, परंतु अधिक लंबी और कुटिल, रेखाएं मिलती हैं और कहीं एक वैसी रेखा और दूसरी व्यंजन के सिरे की बाईं तरफ़ नीचे को झुकी हुई छोटी सी रेखा है (देखो, 'मै'). 'ओ' की मात्रा कहीं कहीं नागरी से किसी प्रकार मिलती हुई है (देखो, तो, शो). 'ङ्' में 'क्' और 'ष', और 'ज्ञ' में 'ज' और 'ञ' स्पष्ट पहिचान में आते हैं.
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२ आ. स. इं; (इंपीरिअल सीरीज़) जि. २२ वीं.
c13.26
३ फ्ली; गु. इं; प्लेट २२.
c13.27
लिपिपत्र १८ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
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१ बॅ. ऑ; (आर्यन सीरीज़) जि. १, भाग ३ रा.
c13.29
अथ जयति जनेन्द्रः श्रीयशोधर्म्मनामा प्रमदवनमिवान्तः
शत्रु(त्तु)सैन्यं विगाह्य व्रणकिसलयभङ्गैर्योङ्गभूषां विधत्ते तरुणत-
रुलतावद्वीरकीर्त्तिर्व्वनाम्य ॥ आजौ जितौ विजयते जगतीम्पुनश्च
श्रीविष्णुवर्द्धननराधिपतिः स एव प्रख्यात औलिकरलाञ्छन आत्म-
वंशो(वंशे) येनोदितोदितपदं गमितो गरीयः ॥ प्राचो नृपान्सुबृहत्तश्च
बहूंनुदीचः साम्ना युधा च वशगान्प्रविधाय येन नामापरं
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जगति कान्तमहो दुरापं राजाधिराजपरमेश्वर इत्युदूढम् ॥
स्निग्धश्यामाम्बुदाभैः स्थगितदिनकृतो यज्जनामाज्यधूमैरम्भो मेध्यं
c13.31
लिपिपत्र १६ वां.
c13.32
यह लिपिपत्र 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई पुस्तक के अंत में दी हुई पूरी वर्णमाला१, मि. बावर के प्राप्त किये हुए प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों२, मौखरी शर्ववर्मन् की आसीरगढ़ से मिली हुई मुद्रा३, मौखरी अनंतवर्मन् के २ लेखों४ तथा महानामन् के बुद्धगया के लेख५ से तय्यार किया गया है. 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला के अक्षरों में अ, उ, ऋ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ट, ड, ढ, ण, त, थ, द, न, प, म, य, र, ल, व, श, ष, स और 'ह' नागरी के उन अक्षरों से बहुत कुछ मिलते हुए हैं और 'ब' तथा 'व' में भेद नहीं है. 'इ' की तीन बिंदियों में से नीचे की बिंदी को वर्तमान नागरी के 'उ' की मात्रा का सा रूप दिया है. 'इ' का यह रूप ई. स. की १३ वीं शताब्दी तक कहीं कहीं मिल आता है. 'ॠ', 'ॡ', 'लृ' और 'लॄ' पहिले पहिल इसी में मिलते हैं. वर्तमान नागरी के 'ऋ' और 'ॠ' इन्हीं से बने हैं परंतु वर्तमान 'लृ' और 'लॄ' के मूल संकेत नष्ट हो चुके हैं जिससे अब 'लृ' के साथ 'ऋ' और 'ॠ' की मात्राएं लगा कर काम चलाया जाता है. 'ओ' की आकृति नागरी के वर्तमान 'उ' से मिलती हुई है परंतु उसका सिर बाईं तरफ अधिक लंबा हो कर उसका बांया अंत नीचे को मुड़ा है. 'ओ' का यह रूप पिछले लेखों तथा प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों में भी मिलता है और कोई कोई लेखक अब तक 'ओं' लिखने में 'ऊ' के ऊपर रेफ तथा अनुस्वार लगा कर इस प्राचीन 'ओ' की स्मृति को जीवित रखते हैं. 'ङ', 'ज' और 'ट' के सिरों के दाहिनी तरफ़ के अंत में [Figure:] चिह्न लगाया है. वह अथवा उसका परिवर्तित रूप [Figure:] पिछले लेखों में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २१, २३, २४, २८, २६, ३०, ३१, ३२, ३३, ३४). वर्तमान नागरी के 'ङ' में, 'ड' की आकृति बना कर उसके आगे बिंदी लगाई जाती है जो इसी चिह्न का स्थानांतर् है और 'ङ' तथा 'ड' की आकृति एकसा बन जाने पर उन अक्षरों का भेद बतलाने के लिये ही लगाई जाने लगी है. 'ओं' का सांकेतिक चिह्न नागरी के ७ के अंक सा है जो वास्तविक 'ओं' नहीं किंतु कल्पित चिह्न है. यह कई रूपांतरों के साथ पिछले लेखों तथा प्राचीन जैन, बौद्ध और ब्राह्मणों के हस्तलिखित पुस्तकों के प्रारंभ में मिलता हैं.
c13.33
महानामन् के लेख में 'ऊ' को 'उ' के साथ [Figure:] चिह्न जोड़ कर बनाया है परंतु अन्यत्र बहुधा समकोणवाला नहीं किंतु गोलाईदार चिह्न मिलता है जिसका अग्रभाग नीचे की ओर झुका हुआ होता है (देखो, इसी लिपिपत्र में उष्णीषविजयधारणी के अंत की वर्णमाला का 'ऊ' और लिपिपत्र २४, २५, २८, ३१, ३४, ३५ में भी). 'त्' का रूप उपर्युक्त यशोधर्मन् के लेख (लिपिपत्र १८ में) के 'त्' का सा ही है परंतु इसमें सिर की आड़ी लकीर को दाहिनी ओर झुका कर बहुत नीचे बढ़ा लिया है संभव है कि नागरी का वर्तमान हलंत का चिह्न इसीसे निकला हो और व्यंजन के ऊपर लिखे जाने की अपेक्षा नीचे लिखा जाने लगा हो. 'र्थ', 'थ' से मिलता हुआ है और रेफ को पंक्ति से ऊपर नहीं किंतु सीध में लिखा है और 'र्थ' तथा 'थ' में भेद बतलाने के लिये ही 'थ' के नीचे के दाहिनी ओर के अंश को गोलाई के साथ ऊपर बढ़ाया है. ऐसा ही 'र्थ' अन्य लेखों में भी मिलता है (देखो, लिपिपत्र १७, २०, २१, २२, २८, २६).
c13.34
१ ऐं. आं; (आर्यन सीरीज़) जि. १, भाग ३, प्ले. १-४.
c13.35
२ आ. स. इं; (इंपीरिअल सीरीज़) जि. २२ वीं के कई प्लेट.
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३ फ़्ली; गु. इं; प्लेट ३० A.
c13.37
४ फ़्ली; गु. इं; सेट ३१ A और B.
c13.38
५ फ़्ली; गु. इं; प्लेट ४१ A.
c13.39
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c13.40
औं आसीत्सर्व्वमहीक्षितामनुरिव क्षत्त्रस्थितेर्द्देशिकः श्रीमान्मत्तगजे-
न्द्रखेलगमनः श्रीयज्ञवर्म्मा नृपः यस्याहूतसहस्रनेत्रविरहक्षामा
सदैवोध्वरैः पौलोमी चिरमश्रुपातमलिनं(नां) धत्ते कपोलश्रियं ॥
श्रीशार्दूलन्नृपात्मजः परहितः श्रीपौष्णः श्रूयते लोके चन्द्रम-
c13.41
लिपिपत्र २० वां.
c13.42
यह लिपिपत्र उदयपुर के विक्टोरिया हॉल में रक्खे हुए मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय के वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया गया है. इसके ‘थ’ और ‘श’ नागरी के ‘थ’ और ‘श’ से मिलते जुलते ही हैं केवल ऊपर की गांठें उलटी हैं. ‘य’ के प्राचीन और नवीन (नागरी के सदृश) दोनों रूप मिलते हैं. ‘आ’ की मात्रा चार प्रकार से बनाई है. ‘जा’ और ‘हा’ के ऊपर ‘आ’ की मात्रा [Figure:] ऐसी लगी है, जिसकी स्मृति अब तक कितने एक पुस्तकलेखकों को है क्योंकि जब वे भूल से कहीं ‘आ’ की मात्रा छोड़ जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसको लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उस के ऊपर [Figure:] चिह्न लगा देते हैं. इस लेख में अक्षरों तथा स्वरों की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न कर लेखक ने अपनी चित्रनिपुणता का परिचय दिया है (देखो, जा, टा, रा, धि, रि, हि, ही, ते, ले, नै, वै, यो, कौ, शौ, सौ, त्य, प्र, व्य, श्री).
c13.43
लिपिपत्र २० वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c13.44
राजा श्रीगुहिलान्त्रयामलयशोराशौ स्फुरद्दीधितिध्वस्तध्वान्तसमूहदुष्ट-
सकलव्यालावलेपान्तकृत् । श्रीमानित्यपराजितः क्षितिभृतामभ्यर्चितो
मूर्धभिः(भि)र्वृत्तस्वच्छतयेव कौस्तुभमणिर्जातो जगद्भूषणं ॥ शिवात्म-
जोखण्डितशक्तिसंपद्धुर्यः समाक्रान्तभुजङ्गशत्रु[ः]। तेनेन्द्रवत्स्कन्द इव
प्रणेता कृतो महाराजवराहसिंहः जनगृहीतमपि क्षयवर्जितं
धवलमप्यनुरञ्जितभूतलं स्थिरमपि प्रविकासि दिशो दश भ्रमति
c13.45
लिपिपत्र २१ वां.
c13.46
१ ये मूल पंक्तियां मौखरी (मुखर) वंशी राजा अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख से उद्धृत की गई हैं (फ्ली; गु. इं; प्लेट ३१ A.)
c13.47
यह लिपिपत्र बांसखेडा से मिले हुए राजा हर्ष (हर्षवर्द्धन) के दानपत्र२, नेपाल के राजा अंशुवर्मन् के लेख३, राजा दुर्गगण के झालरापाटन के लेख४, कुदारकोट के लेख५ तथा राजा शिवगण के कोटा के लेख६ से तय्यार किया गया है. हर्ष के दानपत्र से प्राचीन अक्षरों की पहिली पंक्ति के ‘ह’ से ‘प्र’ तक के अक्षर उद्धृत किये हैं और अंतिम पांच अक्षर (‘ध’ से ‘श्री’ तक) उक्त दानपत्र के अंत के हर्ष के हस्ताक्षरों से लिये गये हैं जो चित्रलिपि का नमूना होने के साथ ही साथ उक्त राजा की चित्रविद्या की निपुणता प्रकट करते हैं. झालरापाटन के लेख में विसर्ग की दोनों बिंदियों को [Figure:]
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२ ऐं. इं; जि. ४, पृ. २१० के पास का प्लेट.
c13.49
३ झालरापाटन (छावनी) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई दोनों ओर की छापों से.
c13.50
४ ऐं. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का प्लेट.
c13.51
५ इं. ऐं; जि. १०, पृ. १७० के पास का प्लेट.
c13.52
६ इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट.
c13.53
लिखा है. कुदारकोट के लेख में हलंत का चिह्न ऊपर से तथा वर्तमान चिह्न के समान नीचे से भी बनाया है. कोटा के लेख में ‘अ’ (पहिला) वर्तमान नागरी ‘अ’ से बहुत कुछ मिलता हुआ है और ‘त्’ को चलती कलम से लिख कर हलंत के चिह्न को मूल अक्षर से मिला दिया है जिससे उसका रूप कुदारकोट के लेख के ‘त्’ से भिन्न प्रतीत होता है.
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लिपिपत्र २१ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c13.55
ओं नमः शिवाय ओं नमः स्स(स)कलसंसारसागराे-
त्तारहेतवे । तमोगर्त्ताभिसंपातहस्तालंबाय शम्भवे ॥
श्वेतद्वीपानुकारा×क्वचिदपरिमितैर्रिन्दुपादैः पतद्भिनिर्त्यस्थै-
c13.56
लिपिपत्र २२ वां.
c13.57
यह लिपिपत्र चंबा के राजा मेरुवर्मा के ५ लेखों से तय्यार किया है. उक्त लेखों में से गूंगाह का लेख२ शिला पर खुदा है और बाकी के पित्तल की मूर्तियों पर३. मूर्तियों पर के लेखों से उद्धृत किये हुए अक्षरों में कितने एक अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं जिसका कारण यह है कि ये सब लेख एक ही लेखक के हाथ से लिखे नहीं गये और कुछ अक्षर कलम को उठाये बिना लिखे हों ऐसा प्रतीत होता है. ‘न’ का पहिला रूप नागरी के ‘म’ से मिलता हुआ है. उक्त अक्षर का ऐसा रूप अन्यत्र भी मिलता है (देखो लिपिपत्र २२ में बुचकला के लेख के अक्षरों में). ‘न’ के तीसरे रूप में बीच की ग्रंथि उलटी लगाई है, ‘र’ का दूसरा रूप उलटा लिखा गया है, ‘व’ को ‘ब’ के समान लिखा है और रेफ को पंक्ति के ऊपर नहीं किंतु पंक्ति की सीध में लिखा है.
c13.58
लिपिपत्र २२ वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
c13.59
ओं प्रासाद५ मेरुसदृशं हिमवन्तमूर्ध्निः६ कृत्वा स्वयं
प्रवरकर्म्मशुभैरनेकः तच्चन्द्रशाल७ रचितं८ नयनाभनाम९
प्राग्ग्रीवकैर्विविधमण्डपनैः कचित्तैः१० ॥ तस्याग्रतो वृषभ पी११-
नकपोलकायः संश्लिष्टवक्ष्ककुदोन्नतदेवयानः१२ औमेरु-
वर्म्मचतुरोदधिकीर्त्तिरेषाः१३ मातापित्रोः१४ सततमात्मफ-
c13.60
४ ये मूल पंक्तियां नंदी की मूर्ति के लेख से उद्धृत की गई हैं (फो; एँ. चं स्टे; प्लेट १०). इनमें अशुद्धियां बहुत हैं इस लिये उन्हें मूल के साथ ( ) चिह्न के भीतर नहीं किंतु टिप्पणों में शुद्ध किया है.
c13.61
९ नयनाभिरामा.
c13.62
१० विविधमण्डपैनैकै.
c13.63
११ षभः पी°.
c13.64
१२ वक्षःककुदुन्नतदेवयानं.
c13.65
१३ चतुरूदधिकीर्त्तिरेषा.
c13.66
१४ मातापित्रोः.
c13.67
लिपिपत्र २३ वां.
c13.68
२ फो; एँ. चं. स्टे; प्लेट ११.
c13.69
३ फो; एँ. चं. स्टे; प्लेट १०.
c13.70
यह लिपिपत्र प्रतिहार राजा नागभट के समय के बुचकला के लेख१५, प्रतिहार बाउक के जोधपुर के लेख१६ तथा प्रतिहार कक्कुक के घटिआले के लेख१७ से तय्यार किया गया है. बुचकला के लेख में ‘न’ नागरी के ‘म’ से मिलता हुआ है, ‘ह’ की आकृति नागरी के ‘ड’ के समान है और ‘स’ में ‘त’ उलटा जोड़ा है. जोधपुर के लेख के अधिकतर अक्षर नागरी के समान हो गये हैं.
c13.71
१ ये मूल पंक्तियां कोटा के लेख से हैं (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
c13.72
५ सादं.
c13.73
६ वन्मूर्ध्नि.
c13.74
७ शाला. [^८] : चिता.
c13.75
१५ एँ. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का प्लेट.
c13.76
१६ राजपूताना म्युजिअम् (अजमेर) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
c13.77
१७ प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता जोधपुर के मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.
c13.78
लिपिपत्र २३ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c13.79
ओं नमो विष्णवे ॥ यस्मिन्विशन्ति भूतानि यत- स्स्र्गस्थिती मते । स वः पायादृषीकेशो निर्ग्गुण- स्सगुणश्च यः ॥ गुणाः पूर्व्वपुरुषाणां कीर्त्यन्ते तेन पण्डितैः । गुणकीर्त्तिर्नश्यन्तौ स्वर्गवासकरौ यतः ॥ अतः श्रीबाउको धीमां(मान्) स्वप्रतीहारवड्शजां(वंशजान्) । प्रश-