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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c13.24

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c13.24

Language
Hindi

c13.24

यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा यशोधर्म्मन् (विष्णुवर्द्धन) के मालव (विक्रम) सं. ५८६ (ई. स. ५३२) के शिलालेख३ से तय्यार किया गया है. इसमें 'अ' वर्त्तमान दक्षिणी शैली के नागरी 'अ' से मिलता हुआ है. 'औ' पहिले पहिल इसी लेख में मिलता है. 'उ, च, ड, ढ, त, द, न, प, भ, र, ल, ष, स और 'ह' अक्षरों के रूप वर्त्तमान नागरी के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. हलंत व्यंजनों को सिरों की पंक्ति से नीचे नहीं किंतु सस्वर व्यंजनों के साथ समान पंक्ति में ही लिखा है परंतु उनके सिर उनसे जुड़े हुए नहीं किंतु विलग ऊंचे धरे हैं और 'त्' के नीचे नागरी की 'उ' की मात्रा का सा चिह्न और बढ़ा दिया है. 'आ' की मात्रा तीन प्रकार की मिलती है जिनमें से एक रूप वर्त्तमान नागरी की 'आ' की मात्रा से मिलता हुआ है (देखो, ना, मा). 'इ' की मात्रा चार प्रकार से लगी है जिनमें से एक वर्त्तमान नागरी की 'इ' की मात्रा के समान है (देखो, 'कि'). 'ई' की मात्रा का जो रूप इस लेख में मिलता है उसका अंत नीचे की तरफ़ और बढ़ाने से वर्त्तमान नागरी की 'ई' की मात्रा बन जाती है (देखो, 'की'). 'उ' और 'ऋ' की मात्राएं नागरी के समान हो गई हैं (देखो, दु, रु, वृ, वृ,). 'ए' की मात्रा नागरी से मिलती हुई है परंतु अधिक लंबी और कुटिल आकृति की है. (देखो, 'ने'). 'ऐ' की मात्रा की कहीं नागरी की नाईं दो तिरछी, परंतु अधिक लंबी और कुटिल, रेखाएं मिलती हैं और कहीं एक वैसी रेखा और दूसरी व्यंजन के सिरे की बाईं तरफ़ नीचे को झुकी हुई छोटी सी रेखा है (देखो, 'मै'). 'ओ' की मात्रा कहीं कहीं नागरी से किसी प्रकार मिलती हुई है (देखो, तो, शो). 'ङ्' में 'क्' और 'ष', और 'ज्ञ' में 'ज' और 'ञ' स्पष्ट पहिचान में आते हैं.