भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c13.42
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c13.42
- Language
- Hindi
c13.42
यह लिपिपत्र उदयपुर के विक्टोरिया हॉल में रक्खे हुए मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित के समय के वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया गया है. इसके ‘थ’ और ‘श’ नागरी के ‘थ’ और ‘श’ से मिलते जुलते ही हैं केवल ऊपर की गांठें उलटी हैं. ‘य’ के प्राचीन और नवीन (नागरी के सदृश) दोनों रूप मिलते हैं. ‘आ’ की मात्रा चार प्रकार से बनाई है. ‘जा’ और ‘हा’ के ऊपर ‘आ’ की मात्रा [Figure:] ऐसी लगी है, जिसकी स्मृति अब तक कितने एक पुस्तकलेखकों को है क्योंकि जब वे भूल से कहीं ‘आ’ की मात्रा छोड़ जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसको लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उस के ऊपर [Figure:] चिह्न लगा देते हैं. इस लेख में अक्षरों तथा स्वरों की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न कर लेखक ने अपनी चित्रनिपुणता का परिचय दिया है (देखो, जा, टा, रा, धि, रि, हि, ही, ते, ले, नै, वै, यो, कौ, शौ, सौ, त्य, प्र, व्य, श्री).