भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c14.11
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.11
- Language
- Hindi
c14.11
उत्तरी भारत में नागरी का प्रयोग ई. स. की १०वीं शताब्दी के प्रारंभ के आसपास से मिलता है और यह पहिले पहिल कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल (प्रथम) के दिघवाद-बौली से मिले हुए वि. सं. ९५५ के दानपत्र१ में मिलती है. तदनंतर उसी वंश के अन्य राजाओं२; मेवाड़, वागड़ आदि के गुहिलवंशियों३; सांभर, अजमेर, नाडौल, जालौर, चंद्रावती (आबू) आदि के चाहमान (चौहान)वंशियों; कन्नौज के गाहड़वालों४; हथुंडी, धनोप, बदाऊं आदि के राष्ट्रकूटों५; काठियावाड़, लाट और गुजरात (अणहिलवाड़ा) के चौलुक्यों६ (सोलंकियों); आबू और मालवा आदि के परमारों७; ग्वालियर, दूबकुंड, नरवर आदि के कच्छपघात८ (कछवाहा) वंशियों; जेजाकभुक्ति (जझौती=बुंदेलखंड) के चंद्रात्रेय(चंदेल)वंशियों९; त्रिपुरी (तेवर), रत्नपुर आदि के हैहय (कलचुरि) वंशियों१० आदि अनेक राजवंशियों के शिलालेखों और दानपत्रों में एवं साधारण पुरुषों के लेखों में अबतक बराबर मिलती है.