भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c14.3
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.3
- Language
- Hindi
c14.3
जैसे वर्तमान काल में भारतवर्ष की आर्य लिपियों में नागरी का प्रचार सब से अधिक है और सारे देश में इसका आदर है वैसे ही ई. स. की १० वीं शताब्दी के प्रारंभ से लगा कर अब तक भारत के अधिकतर हिस्सों अर्थात् राजपूताना, गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, मध्यभारत, युक्तप्रदेश और मध्यप्रदेश में तो इसका अटल राज्य बना रहा है. बिहार और बंगाल में भी १० वीं शताब्दी तक तो यही लिपि रही जिसके पीछे इसीके कुछ कुछ परिवर्तित रूप अर्थात् बंगला लिपि का प्रचार रहा, जो इसकी पुत्री ही है. पंजाब और कश्मीर में इसकी बहिन शारदा का प्रचार १० वीं शताब्दी के आसपास से होने लगा. दक्षिण के भिन्न भिन्न विभागों में जहां तेलुगु-कनडी, ग्रंथ और तामिळ लिपियों का प्रचार रहा वहां भी उनके साथ साथ इसका आदर बना रहा. इसीसे उत्तरी और दक्षिणी कोंकण तथा कोल्हापुर के शिलारवंशी राजाओं के शिलालेखों और दानपत्रों१, दक्षिण (मान्यखेट) के राष्ट्रकूटों (राठौड़ों) के कई दानपत्रों२, गुजरात के राष्ट्रकूटों के कुछ दानपत्रों३, पश्चिमी चालुक्यों४ तथा सेउणदेश५ और देवगिरि६ के यादवों के शिलालेख और दानपत्रों एवं विजयनगर के तीनों राजवंशों के कई दानपत्रों७ में नागरी लिपि मिल आती है. विजयनगर के राजाओं के दानपत्रों की नागरी लिपि ‘नंदि नागरी’ कहलाती है और अब तक दक्षिण में संस्कृत पुस्तकों के लिखने में उसका प्रचार है.