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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c14.40

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.40

Language
Hindi

c14.40

यह लिपिपत्र छिंदवंशी लल्ल के वि. सं. १०४६ (ई. स. ९९२) के देवल के लेख६ से, परमार राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो काव्यों से, जो धार से शिलाओं७ पर खुदे हुए मिले हैं, और परमार राजा उदयादित्य के समय के उदयपुर८ तथा उज्जैन९ के लेखों से, तय्यार किया गया है. देवल के लेख में 'अ' नागरी का सा बन गया है क्योंकि उसकी खड़ी लकीर के नीचे के अंत में बाईं ओर से तिरछी रेखा जोड़ी है. यही तिरछी रेखा कुछ काल के अनंतर ‘अ’ की बांईं तरफ़ की तीन तिरछी लकीरों में से तीसरी बन गई जो वास्तव में अक्षर में सुंदरता लाने के विचार से जोड़ी जाती थी. कूर्मशतक के अक्षरों में ‘इ’ और ‘ई’ में ऊपर की दो बिंदियों के बीच की वक्र रेखा, उन्हींके नीचे की तीसरी बिंदी के स्थानापन्न ७ चिह्न के अंत का बांईं तरफ़ से दाहिनी तरफ़ बढ़ा हुआ घुमाव, एवं ‘ऊ’ और ‘ओ’ के नीचे के भाग का वैसा ही घुमाव, केवल सुंदरता के विचार से ही हैं. उदयादित्य के उदयपुर के लेख में ‘इ’ की जो आकृति मिलती है वह तीन बिंदीवाले ‘इ’ का रूपांतर है और उसे सुंदर बनाने के विचार से ही इस विलक्षण रूप की उत्पत्ति हुई है. उदयादित्य के उज्जैन के लेख के अंत में उस समय की नागरी की पूरी वर्णमाला, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के चिह्नों सहित खुदी है, जिससे ई. स. की ११वीं शताब्दी में ऋ, ॠ, ऌ और ॡ के रूप कैसे थे यह पाया जाता है.