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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.51

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.51

Language
Hindi

c14.51

यह लिपिपत्र कन्नौज के गाहडवालवंशी राजा चंद्रदेव और मदनपाल के वि. सं. ११५४ (ई. स. १०६८) के दानपत्र२, हस्तलिखित पुस्तकों तथा हैहय(कलचुरि)वंशी राजा जाजल्लदेव के समय के शिलालेख४ से तय्यार किया गया है. चंद्रदेव के दानपत्र की 'इ' के परिवर्तित रूप से वर्तमान नागरी का 'इ' बना है (देखो, लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). 'धा' में 'आ' की मात्रा की खड़ी लकीर को 'ध' के मध्य से एक नई आड़ी लकीर खींच कर जोड़ा है, जिसका कारण यह है कि 'ध' और 'व' के रूप बहुधा एकसा बन गये थे जिससे उनका अंतर बतलाने के लिये 'ध' बहुधा बिना सिर के लिखा जाता था, यदि कोई कोई सिर की लकीर लगाते थे तो बहुत ही छोटी. ऐसी दशा में 'ध' के साथ 'आ' की मात्रा सिर की आड़ी लकीर के साथ जोड़ी नहीं जाती थी, क्योंकि ऐसा करने से 'धा' और 'वा' में अंतर नहीं रहता. इसी लिये 'धा' के साथ की 'आ' की मात्रा मध्य से जोड़ी जाती थी. चंद्रदेव के दानपत्र के अक्षरों की पंक्ति के अंत का 'म' उक्त दानपत्र से नहीं किंतु चंद्रदेव के वंशज गोविंदचंद्र के सोने के सिक्के पर के लेख से लिया गया है और इसीसे उसको अंत में अलग धरा है. जाजल्लदेव के लेख में हलंत और अवग्रह के चिह्न उनके वर्तमान चिह्नों के समान ही हैं. उक्त लेख के अक्षरों के अंत में 'इ' और 'ई' अलग दिये गये हैं जिनमें से 'इ' बीजोल्यां (मेवाड़ में) के पास के चटान पर खुदे हुए चाहमान (चौहान) वंशी राजा सोमेश्वर के समय के वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) के लेख से लिया गया है और 'ई' चौहान वंशी राजा पृथ्वीराज (तीसरे) के समय के वि. सं. १२४४ (ई. स. ११८७) के बीसलपुर (जयपुर राज्य में) के लेख से लिया गया है. उक्त दोनों अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र कहीं नहीं मिलते.